सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73

दीक्षाविधिः ३१
२. शाम्भवी दीक्षा चरण विन्यास द्वारा दी जाती है। चरण विन्यास एक
आध्यात्मिक भावन है। कामेश्वरी और कामेश्वर के रक्त और शुक्ल वर्ण के अरुण
चरण का शिष्य के शिर पर गुरु द्वारा भावन किया जाता है। शिष्य यह ध्यान
करता है कि, वे चरण उसके उत्तमाङ्ग से सारे शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का
संचार कर रहे हैं। इस अनुभूति से वह कृतार्थ हो जाता है।
३. मान्त्री दीक्षा मन्त्र के उपदेश से पूरी होती है। गुरु मन्त्र का उच्चारण
करते हैं। शिष्य ध्यान से सुनकर उस नाद सुधा का अनुसन्धान करता है।
जहाँ तक एककाल सम्बन्ध की बात है, इसे सूत्र में प्रयुक्त 'च' अव्यय
से वृत्तिकार ने आविष्कृत किया है। एककालिकता सम्प्रदाय और परम्परा पर
निर्भर करती है। यदि सूत्र क्रम को उत्तरोत्तर उत्कृष्ट माना जाय, तो गुरु पहले
शिष्य पर शक्तिपात करें। तब शाम्भवी का भावन करावें और तदुपरान्त
मन्त्रोपदेश देकर शिष्य को कृतार्थ करें। ये सारी क्रियायें एक दिन में ही पूरी
करें, यह क्रम उपयुक्त लगता है। अन्य विद्वद्वर्ग की दृष्टि से 'च' का तीनों
भेदों का स्पष्ट उल्लेख कर उनका यथावसर शिष्य की परीक्षा के उपरान्त
अनुपालन करना चाहिये, यही वास्तविक अर्थ है। जो हो, परम्परा का प्राधान्य
सर्वमान्य है। आणव, शाक्त और शाम्भवोपाय-क्रम के अनुसार सर्वप्रथम मान्त्री
दीक्षा, पुनः शाक्ती दीक्षा और अन्त में प्रतिबोध को सिद्ध करने के लिये शाम्भवी
दीक्षा दी जानी चाहिये। सूत्र में प्रयुक्त क्रम, विशिष्ट साम्प्रदायिक क्रम का द्योतक
है। इस पर श्रीविद्या के उपासकों को विचारपूर्ण निर्णय लेना चाहिये।।३२।।
परेषां मतमाह
एकैकां वेत्येके ।।३३।।
वीप्सया त्रयाणां समुच्चयः। काल-भेदमात्रमिति ज्ञापितम्। 'वा'कारेण
मध्ये चिरकालव्यवधानं कार्यम्, न तु दिवसत्रय इति सूचितम्।।३३।।
सूत्र-संख्या ३२ के हिन्दी अर्थ में इसी पक्ष का समर्थन किया गया है।
भेद सिद्ध है, तो काल-क्रम भी सिद्ध है। अन्यथा एक ही क्रिया की ये तीन
प्रक्रियायें मान ली जायेंगी। वस्तुतः ये स्वतन्त्र प्रक्रियायें हैं, और असामान्य रूप
से अपनाने योग्य हैं। दीक्षा जीवन के उत्कर्ष की विधायिका और परमपुरुषार्थ
की साधयित्री है। अतः इसमें सावधानी की अपेक्षा की जाती है।।३३।।