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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 320 में से

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पृष्ठ 84

४२ परशुरामकल्पसूत्रम्
मुख-बन्ध से मुक्त कर दिया गया, जिससे वह खुली आँखों से पारमेश्वरी सर्जना
का शैव स्वरूप ध्यान में ला सके।
उसके हाथ में प्रथम सिक्त अर्थात् पहले से ही सिक्त होने के लिये
रखे गये थे और गुरु द्वारा शिष्य को देने के लिये रखे गये दूसरे भाग को
देकर तत्त्व मन्त्रों से (ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा) (क्लीं विद्यातत्त्वं
शोधयामि नमः स्वाहा) (सौः शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहाः) उसे खिलाना
चाहिये। यह ध्यातव्य है कि, उस खण्ड को चन्दन से भी सिक्त करना
चाहिये।
उसके बाद उसके दाहिने कान में त्र्यक्षरी बाला मन्त्र का उपदेश करना
चाहिये। त्र्यक्षरी बाला “ऐं क्लीं सौः” मन्त्रमयी मानी जाती है। इस मन्त्र का
उपदेश मन्त्र बोलकर होना चाहिये, जिसे शिष्य ग्रहण कर सके। इसके बाद
इष्ट मन्त्र का कथन भी करना चाहिये। इष्ट मन्त्र गुरु पर निर्भर है।।३९।।
गुरुकर्त्तृकं कर्मशेषं वदति
ततस्तस्य शिरसि स्वचरणं निक्षिप्य सर्वान् मन्त्रान् सकृद्वा
क्रमेण वा यथाधिकारमुपदिश्य स्वाङ्गेषु कमप्यङ्गं शिष्यं स्पर्शयित्वा
तदङ्गमातृकावर्णादि द्व्यक्षरं त्र्यक्षरं चतुरक्षरं वा आनन्दनाथशब्दान्तं
तस्य नाम दिशेत् ।।४०।।
तत इत्यनेन वक्ष्यमाणधर्माणाम् उत्तराङ्गत्वं सूचितम्। स्वस्य गुरोः
चरणम् “अनादेशे दक्षिणं प्रतीयात्” इति परिभाषया दक्षिणचरणमेव
न्यसेत्। सर्वान् मन्त्रान् श्रीविद्याङ्गभूतान् गणपति-श्यामा-वार्त्ताली-परा-पञ्चदशी
नित्या-रश्मिमाला-मन्त्रादीन् सर्वान् सकृद्वा इत्यत्र वाकार एवकारार्थः। क्रमेण
वा तत्तदुपासनवेलायां वा यथाधिकारम् उपदिश्य स्वाङ्गेषु किमप्यङ्गं शिष्यं
स्पर्शयित्वा 'कस्यापि ममाङ्गस्य स्पर्शं कुरु' इत्यादिश्य। ततः शिष्यो
यमवयवं स्पृशेत् तत्र मातृकान्यासे यो वर्णः स आदिर्यस्मिन् ईदृशम्। यथा
शिरःस्पर्शे तत्र मातृका-वर्णः अकारः स आदिर्यस्य अमृतानन्दनाथ इति।
द्व्यक्षरं वेत्यादि स्पष्टार्थः। आनन्दनाथशब्दान्तं स्पष्टम्। तस्य शिष्यस्य नाम
दिशेत् ।।४०।।