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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 320 में से

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पृष्ठ 79

दीक्षाविधिः ३७
प्राणशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म रूप से कई पड़ावों को पार कर सहस्रदल कमल तक
पहुँच कर परतत्त्व में समाहित होती है।
इन दोनों अर्थात् मूलाधार और ब्रह्मबिल के मध्य में संविद् तत्त्व की
प्रकाश-लहरी अनुभूति का विषय है। वह प्रत्येक जीव की जीवनी शक्ति है।
शिष्य साधना के बल पर इसे और जागृत कर लेता है। गुरु से शिष्य का
परिष्कृत रूप छिपा नहीं रहता। वह उसमें अपनी ऊर्जा का अमृत उड़ेल कर
जाज्वल्यमान उद्दीप्त अग्नि के समान समिद्ध कर शिष्य के पाप-पाशों को दग्ध
कर देता है। सूत्र में दाहक्रिया का प्रयोग पूर्वकालिक क्रिया के रूप में किया
गया है।
पूर्वकालिक क्रिया के बाद मुख्य क्रिया होती है। वही मुख्य क्रिया शाक्ती
दीक्षा है। एक दूसरी बात भी यहाँ ध्यातव्य है। ध्यान तो अग्नि का हुआ।
यह ध्यान गुरु करता है। इसे शिष्य को भी भावित करना चाहिये। अग्नि दाह
करता है। केवल दाह का ही ध्यान यहाँ नहीं, वरन् पापराशि के जलने का
भी ध्यान है। ये आन्तर आनुभूतिक प्रक्रियायें साधना से ही सम्पन्न होती हैं।
इस सन्दर्भ में एक और बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है, सूत्र का
पाठक्रम। पहले शाम्भवी दीक्षा की बात कही गयी है फिर शाक्ती दीक्षा देने
का उल्लेख है। वास्तविक क्रम क्या है? यह जिज्ञासा यहाँ शेष रह जाती है।
दीक्षा का विभाग करते समय सर्वप्रथम शाक्ती का क्रम परम्पराप्राप्त है। तदन्तर
शाम्भवी दीक्षा दी जाती है। इनसे ऊर्जस्वल शिष्य को मान्त्री दीक्षा देकर गुरुदेव
उसे मन्त्रात्मिका चेतना की चिन्मयता से समन्वित करते हैं।
उपक्रम और उपसंहार दो स्थितियों पर ध्यान देकर उस विषय में विचार
करना चाहिये। इसमें प्रमाण वेदोपक्रमाधिकरण की व्यवस्था है। यह एक न्याय
अर्थात् नियम है कि, उपक्रम का स्वरूप क्या है। यहाँ उपक्रम शांभवी से किया
गया है। शाक्ती बीच में है किन्तु उपसंहार अन्यथा घटित है। पापदाह तो कर
दिया गया। पापदाह में भी यह ध्यातव्य है कि, शरीर में रहने वाला मल ही
जलता है। दूरीकृत मल नहीं। शरीरस्थ मल जब भस्म बनकर शरीर में ही
रह जाय, यह भी ठीक नहीं। इसीलिये उस शिष्य के शिर पर चरणनिर्गत
अमृतवारि से उसका प्रक्षालन करते हैं। इस प्रकार क्रमवत्ता की पूर्ति भी होती
है, और मान्त्री दीक्षा से दीक्षा का उपसंहार भी हो जाता है॥३६॥