परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
अमुकानन्दनाथ श्रीपादुकां पूजयामीति।।४१।।
उपर्युक्त क्रम में द्वितीय खण्ड के ग्रास का वर्णन किया गया है। उसके
बाद और बालामन्त्रोपदेश के पहले गुरु अपनी पादुका का मन्त्र शिष्य को
बतलाये। गुरु की दीक्षा के समय परमगुरु ने उन्हें जो मन्त्र दिया होता है,
उस नाम को लगा कर कहना चाहिये कि, “अमुकानन्दनाथ श्रीपादुकां पूजयामि'।
इस मन्त्रात्मक वाक्य के पहले वाग्भवबीज, पराबीज, श्रीबीज, कालीबीज,
भुवनेशीबीज और मन्मथबीज रूप छः देवी प्रणवों का उच्चारण करना चाहिये।
गुरुपादुकामन्त्र परमेष्ठिगुरु, परमगुरु और दीक्षागुरु के क्रम से कुछ पृथक् से
प्रयुक्त किये जाते हैं।।४१।।
आचारानुशासनादिः
आचाराननुशिष्य हार्द-चैतन्यमामृश्य विद्यात्रयेण तदङ्गं त्रिः
परिमृज्य परिरभ्य मूर्धन्यवघ्राय स्वात्मरूपं कुर्यात् ।।४२।।
आचारान् दशम-खण्डे वक्ष्यमाणान् अनुशिष्य शिक्षयित्वा हार्दं
हृदयाकाशसम्बन्धि चैतन्यं तं शिष्यमामृश्य ध्यात्वा स्वहृदयस्थचैतन्याभिन्नं
शिष्यं भावयेदित्यर्थः। विद्यात्रयेण श्री-श्यामावार्त्तालीविद्याभिः तदङ्गं त्रिः
स्वहस्तेन शिष्यस्य सर्वशरीरं संस्पृश्य परिरभ्य आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय
स्वात्मरूपं कुर्यात्। स्वस्य यथा आत्मा मोक्षप्रतिबन्धकपौरुषमलरहितस्तथा तं
कुर्यात् ।।४२।।
दशवें खण्ड में निर्दिष्ट आचारों की शिक्षा शिष्य के लिये गुरु दे।
हृदयाकाश में प्रकाशमान चैतन्य गुरु के हृदय में जैसे है, उसी प्रकार के चैतन्य
को शिष्य के हृदयाकाश में ध्यान द्वारा उल्लसित और अभिन्न रूप से उद्रिक्त
कर दे। श्री, श्यामा और वार्त्ताली विद्याओं के उच्चारणपूर्वक पारम्परिक रूप
से शिष्य के सारे शरीर का स्पर्श करे। शिष्य को अपने हृदय से लगा ले।
शिर को सूँघकर उसे स्वात्म रूप में आत्मसात् कर ले। जैसे मोक्ष के प्रतिबन्धक
पौरुष मल से स्वयम् उन्मुक्त हैं, उसी तरह उसे भी निर्मल बनाकर मोक्ष मार्ग
में अग्रसर कर दे। यह दीक्षागुरु का उत्तरदायित्व है।।४२।।