परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ परशुरामकल्पसूत्रम्
विभागवेलायां शाक्ती शाम्भवी मान्त्री चेति चोक्तत्वाद् उपक्रमानुसारेण
उपसंहारोऽन्यथा नेयः, वेदोपक्रमाधिकरणन्यायेन। अत एव तत्पाशदाहानन्तरं
तद्भस्मरूपमलस्य सत्त्वात् चरणनिर्गतजलेन तत्क्षालनरूपार्थवत्त्वादर्थक्रमोऽ-
प्युपपन्नः। तथा चादौ शाक्तीं दीक्षां सम्पाद्य पश्चाच्छाम्भवीं कुर्यादिति
सिद्धम् ।।३६।।
शिष्य के मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र के परिवेशपर्यन्त निरन्तर जलने वाली
प्रकाश लहरी के जाज्वल्यमान अग्निपुञ्ज की ज्वालामयी लपटों से उद्दीप्त अनुभव
कर उसी ध्यान में समाहित होकर उसकी पापमयी पाशराशि को जलाकर शिष्य
को निष्पाप कर देना शाक्ती दीक्षा का एक स्वरूप है।
उस शिष्य में मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सुषुम्ना के माध्यम
से उद्दीप्त संवित्ति का गुरुदेव सर्वप्रथम आकलन करें। मूलाधार चक्र कहाँ है,
टीकाकार आचार्य रामेश्वर के अनुसार यह पायु और उपस्थ के मध्य में है।
वास्तव में उस स्थान को कन्द कहते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, सारे
चक्र मेरुदण्ड से सम्बद्ध हैं। मेरुदण्ड की निचली और नुकीली अस्थि जहाँ
समाप्त होती है, कुण्डलिनी वहीं साढ़े तीन आवृत्ति में लिपटी होती है। उसे
जागृत करने के लिये अश्विनी मुद्रा और ह्रस्व कूर्च बीज का आन्तर उच्चार
आवश्यक है। यह क्रिया कन्द में नहीं अपनायी जा सकती। चतुर्दल कमलवाली
उक्ति सर्वमान्य है। इस प्रसङ्ग में एक बात और भी ध्यान देने योग्य है। मेरुदण्ड
में अवस्थित चक्रों के आगे के मानव देह की संरचना में कोई न कोई अंग
सामने पड़ता है, जैसे— मूल के समक्ष कन्द, स्वाधिष्ठान के समक्ष लिङ्गमूल,
मणिपूर के समक्ष नाभि, अनाहत के समक्ष स्तनमध्य, विशुद्ध के समक्ष गले
की हँसुलियों का मध्य और आज्ञा के समक्ष भ्रूमध्य। इस विवरण से यह सिद्ध
होता है कि, कन्द मूलाधार चक्र का प्रतिष्ठान है, स्थान नहीं। यह शरीर के
स्वः, भुवः और भू-खण्डों में से भूखण्ड के चक्रों का अन्तिम स्थान रूप
मूलाधार है। भूखण्ड में ही स्वाधिष्ठान चक्र भी आता है।
भुवः खण्ड में मणिपूर, अनाहत एवं विशुद्ध ये तीन खण्ड आते हैं।
स्वः खण्ड में आज्ञा और सहस्रार ये दो चक्र ही आते हैं। आज्ञाचक्र के पीछे
तालुरन्ध्र और इसके ऊपर ब्रह्मरन्ध्र है। इसमें सुषुम्ना समाप्त हो जाती है।