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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 320 में से

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पृष्ठ 74

३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
इतःपरं गुरुकर्त्तृकां क्रियामाह
सद्गुरुः क्रमं प्रवर्त्य साङ्गं हुत्वा तरुणोल्लासवान् शिष्यमाहूय
वाससा मुखं बद्ध्वा गणपति-ललिता-श्यामा-वार्त्ताली-परा-पात्र-
बिन्दुभिरस्तमवोक्ष्य सिद्धान्तं श्रावयित्वा।।३४।।
साङ्गम् अङ्गैः सहितं क्रमं प्रधानदेवतापूजां प्रवर्त्य कृत्वा। अत्र अङ्गानि
गणपति-ललिता-श्यामा-वार्त्ताली-पराः। प्रधानं च ललिता अत्र अङ्गपदेन
अङ्गक्रमोपलक्ष्यते। अङ्गक्रमसहितं प्रधानक्रमम् इत्यर्थः। द्वितीयखण्डारम्भे
“इत्थं सद्गुरोराहितदीक्षो महाविद्याराधनप्रत्यूहापोहाय गाणनायकीं पद्धति-
मामृशेत्” इत्यत्र विघ्नापोहाय यत्क्रियते तत्प्रधानम् अङ्गं लोके दृष्टम्।
एवं तृतीयखण्डारम्भे “एवं गणपतिमिष्ट्वा नायिकायाः श्रीललितायाः
क्रममारभेत” इति क्त्वाप्रत्ययेनापि ललितोपास्त्यङ्गत्वं स्पष्टम्।
श्यामोपास्तिखण्डे तस्याः प्रधानसचिवपदं श्यामा। अन्यास्तस्मादिमा
अङ्गदेवताः।
शिष्यमाहूय इत्यनेन तावत्पर्यन्तं शिष्यस्यान्तः प्रवेशो नास्ति इति
ज्ञापितम्। अत्र पात्रपदेन विशेषार्घ्यपात्रं ग्राह्यम्। सिद्धान्तं सिद्धान्तप्रतिपादक-
वाक्यसमूहं श्रावयित्वा।।३४।।
ये सूत्र गुरुकर्तृक प्रक्रिया का प्रवर्त्तन कर रहे हैं। सद्गुरु शब्द गुरु के
सर्वातिशायी पारदृश्वा स्तर के स्वरूप का संकेत कर रहे हैं। ऐसे ज्ञानवान् गुरुदेव
दीक्षा क्रम का प्रवर्त्तन करते हुए आङ्गिक शक्तियों के क्रमानुसार हवन करने
की व्यवस्था करें। उनमें सम्प्रदाय की आस्था का ओज है, श्रद्धा का उल्लास
है और विश्वास का तारुण्य है। इन उच्च गुणों से गौरवास्पद गुरुदेव शिष्य
को वहाँ आहूत करें। अब तक शिष्य वहाँ नहीं था। गुरुदेव ने इन प्रक्रियाओं
को पूरा करने के उपरान्त शिष्य को बुलाया है। शिष्य वहाँ आया। आज्ञा लेकर
वहीं बैठ गया। गुरुदेव ने सबसे पहले कपड़े से उसके पूरे मुख को ढक कर
बाँध दिया। मुख बाँधने की क्रिया ऐकाग्र्य के उद्देश्य से करनी पड़ती है।
गुरुदेव ने अब तक सारा उपक्रम पूरा कर लिया है। दीक्षा देने के अवसर
पर समस्त करने योग्य विधियाँ पूरी कर ली गयी हैं। इस सूत्र के सन्दर्भ में