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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 320 में से

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पृष्ठ 72

३० परशुरामकल्पसूत्रम्
दीक्षास्तिस्रः, शाक्ती, शाम्भवी मान्त्री चेति। तत्र शाक्ती
शक्तिप्रवेशनात्, शाम्भवी चरणविन्यासात्, मान्त्री मन्त्रोपदिष्ट्या
सर्वाश्च कुर्यात् ॥३२॥
चेतीत्यन्तेन विभागं कृत्वा तासां नामकथनम्। तत्र तासु मध्ये
शाक्तीत्यस्यार्थं विवृणोति— शक्तिप्रवेशनात्। जातेति शेषः। यद्वा
शक्तिप्रवेशनाद् इति हेतौ पञ्चमी। शक्तिप्रवेशनाद् या दीक्षा शक्तिप्रवेश-
हेतुकीत्यर्थः। एवमेवाग्रेऽपि। प्रवेशनादिति स्वार्थे ल्युट्। शक्तिप्रवेशनं नाम
अग्रे 'तदमृतक्षालितम्' इत्यारभ्य पाशान् दग्ध्वा' इत्यन्तं प्रतिपादिता क्रिया।
चरणविन्यासो नाम शिष्यशिरसि गुरुकर्त्तृकं कामेश्वरी-कामेश्वरयो
रक्तशुक्लचरणभावनम्। मन्त्रोपदेशस्तु स्पष्टः। शिष्यमात्रश्रावणविषय-
गुरुकर्त्तृकशब्दोच्चारणरूपः। सर्वाः पूर्वोक्ताः। तिस्रश्चेत्यनेन एककालसम्बन्धः
तासु बोध्यते। च-शब्दः साहित्यवाची। साहित्यं च एककालसम्बद्धत्वरूपम्।
तथा च सर्वा दीक्षाः सह कुर्यादिति फलितोऽर्थः।
दीक्षात्रय
प्रथम सूत्र में यह प्रतिज्ञा की गयी है कि, दीक्षा की व्याख्या करने जा
रहा हूँ। उसके बाद उपासना के स्वरूप और उपासकों के धर्मों एवं गुणों की
चर्चा की गयी। पुनः शास्त्र-शैली के प्रसङ्ग में विद्या की अत्यन्त गोपनीयता
का वर्णन सूत्र ३० तक कर दिया गया है। सूत्र ३१ में दीक्षा की आज्ञा प्रदान
कर दी गयी। इस बत्तीसवें सूत्र में दीक्षा के भेद और इनके एककालिक संबन्ध
का विधान करने के लिये सूत्र का प्रवर्त्तन कर रहे हैं—
दीक्षायें तीन प्रकार की होती हैं— १. शाक्ती दीक्षा, २. शाम्भवी और
३. मान्त्री।
१. शक्ति प्रवेशन के माध्यम से दी जाने वाली दीक्षा शाक्ती कहलाती
है। हेतु अर्थ में 'प्रवेशनात्' में प्रयुक्त पंचमी विभक्ति शक्ति-प्रवेश के द्वारा दी
जाती है, यह अर्थ अभीप्सित है। स्वार्थ में ल्युट् का प्रयोग किया गया है।
शक्ति प्रवेशन की प्रक्रिया का वर्णन इसी क्रम के सूत्र ३५ और ३६ में किया
गया है।