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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 320 में से

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पृष्ठ 77

दीक्षाविधिः ३५
श्यामारहस्य नामक साधना उपासना के महान् ग्रन्थ में रक्त और शुक्ल
दोनों चरणों के विषय में इस प्रकार लिखा गया है—
"परमोपास्या माँ के चरण लाली से ललित और आकर्षक हैं। यह लालिमा
रजोरूपता की प्रतीक है, ऐसा शास्त्र कहते हैं। कामेश्वर के चरण शुक्लता से
ललाम लगते हैं। इसका कारण परमेश्वर की पारमार्थिक सात्त्विकता है।
सूत्र में चरण शब्द के एकवचन का कारण व्याकरण शास्त्र का वह नियम
है, जिसके अनुसार प्राणियों के अङ्ग प्रयोग में एकवचनत्व हो जाता है।
ऐसे चरण शिष्य के शिरोभाग पर अमृत उड़ेल रहे हैं। चरणों से गङ्गा-
रूप ब्रह्मद्रव की परिकल्पना कितनी हृदयावर्जक है। यहाँ सूत्रकार के अनुसार
उनसे अमृत बरस रहा है। शिष्य के सारे पाप-ताप धुल गये हैं। अब वह
पातकरहित तप्तदिव्यकाञ्चनवत् निर्मल हो गया है। उसका सारा शरीर पावनता
का प्रतीक बन गया है। उसे गुरुदेव अपने अनुग्रह से अलङ्कृत करते हैं।
सूत्रकार ने गुरु के लिये यहाँ विधिलिङ् परस्मैपद प्रयोग द्वारा यह निर्देश दिया
है कि, उसे ऐसा करना चाहिये। वृत्तिकार द्वारा गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार द्वारा
अलङ्कृत करने की बात व्यावहारिक नहीं लगती। यहाँ अलंकरण का तात्पर्य
सारे शरीर को सजाने से नहीं वरन् अनुगृहीत कर पुलकायमान करने मात्र
से है।।३५।।
शाक्तीं दीक्षामाह
तस्यामूलब्रह्मविलं प्रज्वलन्तीं प्रकाशलहरीं ज्वलदनलनिभां
ध्यात्वा तद्रश्मिभिस्तस्य पापपाशान् दग्ध्वा ।।३६।।
तस्य शिष्यस्य मूलं पायूपस्थमध्यवर्त्ति-चतुर्दलकमलाधारदेशः, तन्म-
र्यदेति आमूलम्। एवम् अधोमर्यादामुक्त्वा ऊर्ध्वमर्यादामाह ब्रह्मबिलं सहस्र-
दलकमलाधारभूतं मर्यादा अस्येति आब्रह्मबिलं प्रज्वलन्तीम्, अत एव प्रकाशानां
लहर्य ऊर्मयो यस्यां तादृशीम्, अत एव ज्वालायुक्तो योऽनलोऽग्निस्तन्निभां
तदुपमां ध्यात्वा संविदमिति शेषः। ज्वलदनलनिभत्वादेव पापपाशदाहकत्वमुप-
पन्नम्। पापपाशस्य दाह एव न भावनम् अत एव दग्ध्वेति। यद्यप्यत्रत्यपाठ-
क्रममनुसृत्य आदौ शाम्भवी, ततः शाक्तीति प्रतिभाति, तथाप्युपक्रमे दीक्षा-