परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ परशुरामकल्पसूत्रम्
को रीति भी कहते हैं। किन्तु शैली रीति से महत्त्वपूर्ण होती है। अभिव्यक्ति
के विशिष्ट प्रकार को शैली कहते हैं। वहीं रीति एक अनुकरणीय पद्धति मात्र
होती है। शास्त्र का शील पाँच आम्नायों में अभिव्यक्त है। उसे पूर्व, दक्षिण,
उत्तर, पश्चिम और ऊर्ध्वाम्नाय रूपों में जाना जाता है।।२९।।
एतादृशं शास्त्रं श्रोतॄप्रवृत्तये प्रशंसति
वेश्या इव प्रकटा वेदादिविद्याः ।
सर्वेषु दर्शनेषु गुप्तेयं विद्या ।।३०।।
वेश्या इव प्रकटाः सुलभा वेदादि-विद्याः। आदिना स्मृत्यादिः।
वेश्योपभोगो द्रव्यादिव्ययेन यथा सुलभः, एवं वेदादि-विद्यालाभो द्रव्यादिदानेन
सुलभ इत्यर्थः। अध्ययनस्य लोभमूलता शास्त्रेणैव प्रतिपादिता। “षष्णां तु
कर्मणां मध्ये त्रीणि कर्माणि जीविका”। इति।
अस्याः मोक्षसाधनीभूतब्रह्मविद्यायास्तु न कोटिकनकव्ययेनापि लाभः
किन्तु गुरुकृपैकलभ्यत्वम्।।३०।।
सारी वेद आदि विद्यायें जो प्रकट हैं अर्थात् सर्वसुलभ हैं, उनका
परमपुरुषार्थ लाभ की दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं है। वे रहस्य विद्यायें नहीं हैं।
वेद आदि शब्द में आदि शब्द से स्मृति आदि का ग्रहण होता है।वे भी प्रकट
विद्यायें हैं। ये सारी विद्यायें सूत्रकार की दृष्टि से वेश्याओं के समान हैं।
वेश्याओं का उपभोग द्रव्य आदि के व्यय से सभी लोग कर सकते हैं।
वेद आदि विद्याओं के स्वाध्याय का अभिलाष मन में और पास में द्रव्य का
प्रबन्ध हो तो, अध्यापक को घर पर बुला कर भी पढ़ा जा सकता है। सूत्रकार
के समकालीन पैसा लेकर पढाने वालों पर यह एक कटाक्ष की तरह प्रतीत
होता है। यह सत्य है कि, इन प्रकटविद्याओं का उपभोग उसी तरह सर्वसुलभ
है जैसे वेश्या वर्ग का उपभोग।
अध्ययन की लोभमूलकता की चर्चा शास्त्रों में भी की गयी है। एक
स्थान पर कहा गया है कि,
“ब्राह्मणों के छः कर्म (पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना और दान देना
एवं लेना) निर्धारित हैं। इनमें से तीन कर्म (पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना)
तो जीविकार्थ ही स्वीकृत हैं।”