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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

दीक्षाविधिः २९
जीविका के प्रति लोभ स्वाभाविक है। इन तीनों से द्रव्योपार्जन होता है।
अर्थ के अभाव से जीवन कष्टसाध्य हो जाता है। पर इस कष्ट को प्राचीन ब्राह्मण
वर्ग सहर्ष स्वीकार करता था।
जहाँ तक परमपुरुषार्थसाधनीभूत ब्रह्मविद्या का प्रश्न है, यह रहस्य विद्या
है। करोड़ों द्रव्य व्यय कर भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह एकमात्र गुरुकृपा
और उनके अनुग्रह पर निर्भर है। इसलिये यह सर्वातिशायिनी ब्रह्मविद्या है ।।३०।।
एतावत्पर्यन्तं शास्त्रमनूद्य उपासकेन प्रथमां कर्त्तव्यां क्रियामाह
तत्र सर्वथा मतिमान् दीक्षेत ।।३१।।
सप्तमी षष्ठ्यर्थे, प्रकृत्यर्थः श्रीविद्योपास्तिः। षष्ठ्यर्थः सम्बन्धः
तदव्यवहितपूर्ववृत्तित्वम्। तस्य दीक्षापदार्थे आश्रयतया अन्वयः। तस्य
करणत्वसम्बन्धेन भावनायामन्वयः। तथा च श्रीविद्योपासनाऽव्यवहितपूर्ववृत्ति
दीक्षया इष्टं भावयेद् इति विशिष्टबोधः। अत एवोत्पत्तिविधिः। सर्वथा अवश्यं
मतिमान् पूर्वोक्तभूमिकामारूढः। एतत्पदस्वारस्यादेव अयमधिकारविधिरपि।
तादृशभूमिकामारूढस्यैव अधिकारो नान्यस्येति सिद्धम्।।३१।।
तत्र शब्द में सप्तमी विभक्ति का अर्थ सम्बन्ध का द्योतक है। प्रकृत
प्रक्रान्त तत्त्व यहाँ श्रीविद्या है। सम्बन्ध अव्यवहितपूर्व वस्तु से होता है।
श्रीविद्योपासना के अव्यवहितपूर्व दीक्षा होनी चाहिये। श्रीविद्योपासना दीक्षा पर
ही आश्रित है। दीक्षा में करण कारक का अन्तर्भाव है अर्थात् दीक्षा के ग्राह्य
सिद्धान्तों के द्वारा उपासना करे। इसे इस तरह कह सकते हैं कि, श्रीविद्योपासना
के अव्यवहितपूर्व दीक्षा द्वारा इष्ट का भावन करना चाहिये। यह विशिष्ट बोध
उत्पन्न होता है। इस आधार पर इस सूत्र को उत्पत्तिविधि भी कह सकते हैं।
पूर्व भूमिका में आरूढ व्यक्ति ही मतिमान् कहा जाता है। उपासना में मति
है। अत एव वह मतिमान् है। ऐसे मतिमान् को ही दीक्षा में अधिकार है।
इसलिये इस सूत्र को अधिकारविधि सूत्र भी कह सकते हैं ।।३१।।
दीक्षात्रयम्
एवं दीक्षां विधाय तत्र अवान्तरभेदवतीषु तासु एककालसम्बन्धं
विधातुम् आदौ तां विभज्य विभागप्रयोजकं धर्मं च प्रदर्श्य तासु तिसृष्वपि
एककालसम्बन्धरूपं गुणं विधत्ते—