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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
उपासकधर्मः भावनादार्ढ्यम्। 'अहमिदं जानामि' इत्येतादृशवृत्तिषु इदं
पदार्थपेक्षया अहंतया भासमानं श्रेष्ठमिति विवेचनम्-सर्ववृत्तिषु इदमेव भावना-
पदार्थः। तस्य दार्ढ्यम् अशैथिलता। अनेन आज्ञासिद्धिः, निग्रहानुग्रहसामर्थ्यं
भवतीति शेषः। भावनादार्ढ्यस्तुत्या सर्वदा ईदृशभावनाविधिरुन्नेयः॥१३॥
उपासक का सबसे बड़ा धर्म है, भावना की दृढ़ता। भावना क्या है,
इसे समझाते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि, जब कोई 'मैं यह जानता हूँ' इस वाक्य
का प्रयोग करता है, तो इस प्रयोग में 'यह' कर्म पदार्थ प्रधान नहीं होता वरन्
ज्ञानवान् 'मैं' की ही प्रधानता होती है। सारे व्यवहार जगत् में गौणत्व और
प्रधानत्व का बोध ही भावना है। भावना एक प्रकार से वास्तविक विवेचना ही
होती है। शैथिल्य के लिये इसमें स्थान नहीं होता। इससे निग्रह और अनुग्रह
की शक्तिरूपी आज्ञा की सिद्धि होती है। भावना की दृढ़ता सर्वत्र अपनानी
चाहिये॥१३॥
उपासकस्य नियमान्तरमाह
सर्वदर्शनानिन्दा ॥१४॥
इतरदेवतोपासनाविधायकानि यानि दर्शनानि शास्त्राणि तेषां निन्दा न
कर्त्तव्येत्यर्थः। तन्निन्दने तदधिकारिणां संशयोत्पत्त्या स्वावलम्बितदर्शनेष्व-
नाश्वासः। अस्मिन् शास्त्रे अनधिकाराद् उभयभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्येत्।
इममेवार्थं श्रीकृष्णोऽप्याह—
'न बुद्धि-भेदं जनयेदज्ञानां कर्म-सङ्गिनाम्' ।
'लोकान्न निन्द्यात्' इति श्रुतिरपि ॥१४॥
संसार में जितने दर्शन हैं, किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिये। बहुत
से ऐसे दर्शन हैं और शास्त्र हैं, जो अन्यान्य देवोपासना का विधान करते हैं।
यद्यपि वे स्वात्मस्वीकृत मान्यता के विपरीत होते हैं, फिर भी उनकी निन्दा
कदापि नहीं करनी चाहिये। निन्दा से उसके अनुयायियों के विश्वास में भेद उत्पन्न
होने की सम्भावना होती है। आस्था-शैथिल्य बड़ा भारी दोष है। इससे जैसे
बिखरे बादल नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह स्व और पर दोनों में विश्वास की
कमी से उपासक उभयतः भ्रष्ट हो जाता है।

दीक्षाविधिः १७
श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं— “कर्म में आसक्त अज्ञ पुरुषों में बुद्धि-
भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये।”
भगवती श्रुति भी यही निर्देश देती है कि, लोक अर्थात् लोगों या लोक-
प्रचलित मान्यताओं की निन्दा नहीं करनी चाहिये।।१४।।
तृतीयं धर्ममाह
अगणनं कस्यापि ।।१५।।
स्वशास्त्रविरुद्धं यदि गीर्वाणगुरुर्वदेत्तर्हि स गुरुरिति गणनं न कर्तव्यम्।
अत एव श्रुतिरपि—“न गणयेत् कमपि” इति।।१५।।
स्वात्म स्वीकृत दर्शन, उपासना अथ च शास्त्र के प्रति आस्था की दृढता
को यह सूत्र कट्टरता तक ले जाने का आदेश दे रहा है। यह कहता है कि,
हमारे दर्शन, हमारी उपासना पद्धति, हमारे सम्प्रदाय और शास्त्र के सामने सारी
मान्यतायें नगण्य हैं। हमारे शास्त्र के विरुद्ध यदि देवगुरु बृहस्पति भी कुछ
कहते हैं, तो हम उसे मानने के लिये तैयार नहीं। स्वात्मोपासना पद्धति के
विरुद्ध प्रतिवाद करने वाला कथमपि गुरु नहीं कहा जा सकता। यह हमारा दृढ
सिद्धान्त है।।१५।।
चतुर्थमाह
सच्छिष्ये रहस्यकथनम् ।।१६।।
कर्तव्यमिति शेषः। परिसंख्याविधिरियम्। ‘आत्मरहस्यं न वदेत्’ इति
निषेधस्यापवादोऽयम्। न तु गुप्त्याऽर्चनं इत्यस्यापवादः। तथा सति
शिष्यातिरिक्तेषु (सामयिकेषु) (पूजाप्राकट्यानापत्तेः। अतः इदम्)।
आत्मरहस्यं स्वसिद्धान्तरूपं सामयिकेषु शिष्यभिन्नेषु न कथयेत्। सच्छिष्ये
कथयेदित्यर्थः ।।१६।।
योग्य शिष्य यदि सम्प्रदाय निकष पर खरा उतर रहा हो, तो उसे
सम्प्रदाय-सिद्ध रहस्य का बोध कराने के उद्देश्य से गोपनीय बातों का भी उसको
बताना आवश्यक माना जाता है। सूत्र का यह विधान परिसंख्या विधि के
अनुसार किया गया है। परिसंख्या विधि मीमांसा दर्शन स्वीकृत विधि है। जब

१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
आत्यन्तिक अप्राप्ति हो, उस समरा कोई नियम बना दिया जाय, उसे विधि
कहते हैं। रहस्य कथन का निषेध है। इस स्थिति में नियम बनाया गया कि,
सच्छिष्य में कथन होना चाहिये। यह विधि है। परिसंख्या पक्ष में होती है। जैसे
मन्त्र गोपन का निषेध है अथवा 'अपना रहस्य नहीं बताना चाहिये, इस निषेध
का अपवाद उक्त नियम है। अर्चन में भी गोपन प्राप्त है। रहस्य कथन में भी
गोपन प्राप्त है। मन्त्र प्रदान में भी गोपन प्राप्त है किन्तु सच्छिष्य में यह विधि
बन गया है। इसलिये यह परिसंख्या विधि है। साहित्य में परिसंख्यालङ्कार भी
इससे मिलता-जुलता है। इसलिये स्वात्मस्वीकृत रहस्य को जिसे व्यक्ति अपना
सम्प्रदायनिष्ठ सिद्धान्त मानता है, उसे समय पालन में संलग्न सामयिक शिष्यों
को प्रदान करने में कोई विप्रतिपत्ति नहीं होनी चाहिये किन्तु शिष्य के अतिरिक्त
अन्य के प्रति कभी भी किसी अवस्था में भी इसे प्रदान नहीं करना चाहिये,
यह शास्त्रकार का मन्तव्य है॥१६॥
पञ्चमधर्ममाह
सदा विद्यानुसंहतिः ।।१७।।
सदा सर्वकालं पूजादिविहितनित्य-कर्मानुष्ठान-कालव्यतिरिक्ते सर्वदेत्यर्थः।
विद्यायाः स्वोपास्य-देवतावाचक-मन्त्रस्य अनुसंहतिस्तत्प्रतिपादितार्थस्य
अनुसन्धानं, कर्तव्यमिति शेषः।
यद्वा अनुसंहतिर्मनसा जपः कार्य इत्यर्थः। न च आसनादि-
नियमरहितस्य जपो युक्त इति शङ्कनीयम्, मानसे कस्यापि नियमस्याभावात्।
तदुक्तं परमानन्दतन्त्रे—
मानसेऽनन्तगुणितं नियमस्तत्र नैव तु।
गच्छन् शयान आसीनो मुक्तो वा यत्र कुत्रचित्।
अस्नातश्चापवित्रश्च न दोषस्तत्र विद्यते॥१७॥
यहाँ सदा शब्द शाश्वत और अजस्र अर्थ में प्रयुक्त नहीं है। समय के
उस काल खण्ड में जिसमें दैनन्दिन नित्य कर्मों का अनुष्ठान उपासक करता
है, उसकी गणना इस सदा के परिवेश में नहीं की जाती। उस काल को छोड़
कर जो समय बचता है, स्वप्न और सुषुप्ति से जो समय बचता है, उसमें
'सदा' अव्यय का प्रयोग किया गया है।

द्वितीय एवं तृतीय खण्ड: गणपति एवं श्यामला (मातङ्गी) क्रम

दीक्षाविधिः १९
जहाँ तक विद्या शब्दार्थ का प्रश्न है, यह अपने उपास्य इष्ट देवता के
वाचक मन्त्र के लिये ही प्रयुक्त है। इसी इष्टमन्त्र की जिसे गुरुमन्त्र भी कहते
हैं, उसकी अनुसंहति होनी चाहिये। 'अनुसंहति' शब्द अनुसन्धान अर्थ में प्रयुक्त
है। अनुसन्धान मन्त्रों में प्रतिष्ठित दिव्य रहस्यार्थों का ही किया जाता है।
अनुसंहति शब्द का एक अन्य अर्थ भी लगाया जा सकता है। वस्तुतत्व
का अनुसन्धान सदा मानसिक होता है। अतः सदा अनुसंहति शब्द मानस जप
की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत होता है, आसन आदि नियमों से रहित जप
नहीं हो सकता, इस प्रकार की आशङ्का मानस जप में नहीं करनी चाहिये।
परमानन्दतन्त्र में स्पष्ट लिखा हुआ है कि,
“मानस जप का अनन्तगुना फल होता है। इसमें किसी प्रकार के नियम
की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह चलते-फिरते सोते-जागते, उठते-बैठते,
खाते-पीते किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। इसमें स्नान भी आवश्यक
नहीं होता। कभी अपवित्रता का अवसर भले आ जाय, उसमें भी इसे करना
चाहिये।”
इस सूत्र में प्रयुक्त सदा, विद्या और अनुसंहति शब्द अपने वैशिष्ट्य का
पूरा ख्यापन कर रहे हैं।।१७।।
षष्ठं धर्ममाह
सततं शिवतासमावेशः ।।१८।।
'सततम्' अस्याप्यर्थः पूर्वसूत्रस्थ-सदा-शब्दवत्। शिवतायाः समावेशः
आविर्भावः कर्त्तव्य इति शेषः। नित्यकर्मानुष्ठानव्यतिरिक्तकाले शिवोऽहमस्मीति
भावयेद् इति तात्पर्यम्।
वस्तुतस्तु पूर्वधर्मेण सहायं विकल्प्यते। अन्यथा उभयोर्भावनयो-
र्युगपत्सम्पादनासम्भवात्। पूजादि-व्यतिरिक्तकाले अन्यतरस्यानुष्ठानमिति भावः।
यद्वा— पूर्वधर्मो मन्दाधिकारिणः। अयं मुख्याधिकारिणः।।१८।।
पूर्वसूत्र 'सदा विद्यानुसंहतिः' में सदा शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त कर
रहा है, उसी अर्थ में इस सूत्र में प्रयुक्त 'सतत' शब्द का भी व्यवहार किया
गया है। शिवतासमावेश में षष्ठी तत्पुरुष है। शिव का धर्मानुगुण्य ही शिवत्व

२० परशुरामकल्पसूत्रम्
है। उसका समावेश अर्थात् आविर्भाव। शिवत्व का अविर्भाव करना चाहिये।
नित्यकर्मों का अनुष्ठान करने के बाद यह भावन करना चाहिये कि, 'मैं स्वयं
शिव हूँ'। इस सूत्र का यही तात्पर्य है।
वास्तविकता यह है कि, शिवत्व का भावन एक वैकल्पिक कर्त्तव्य है।
पहले नित्य कर्म का विकल्प। पुनः शिवत्व भावन का विकल्प। दोनों भावों
का युगपद् सम्पादन असम्भव है। पूजादि के बाद इसका अनुष्ठान ही होना
चाहिये।
इसका एक अन्य अर्थ भी विचारणीय है। पूर्वधर्म मन्द अधिकारी का
धर्म है और यह मुख्य अधिकारी का धर्म है।
वस्तुतः मेरे विचार से इस सूत्र का ऊपर प्रतिपादित अर्थ आगमिक
परम्परा के पूर्णतः प्रतिकूल है। समावेश भावना नहीं एक दशा है। भावन में
भावना अर्थात् मानस अनुसन्धान होता है। समावेश अकिञ्चित् चिन्तन की
निर्विकल्प दशा की रूढि है। समावेश में गुरु द्वारा कृत शक्तिपातजन्य प्रतिबोध
का उल्लास करना नहीं पड़ता, वरन् वह स्वयं स्पन्दमान रहता है। इसका सतत
शब्दार्थ पूर्वसूत्रवत् नहीं है। इसके सातत्य का अर्थ उस दशा से शाश्वत अप्रच्याव
है। शिवता समावेश का षष्ठ्यर्थ सप्तम्यर्थ गर्भ है। पहले अणु था। पार्थक्य
प्रथा से प्रथित था। अब वह स्वयं शिव है। शिवत्व से शिवत्व में समाहित
है। तत्त्वेन प्रवेष्टुं प्रयत्नशील नहीं है, वरन् समा चुका है। वह शिव हो चुका
है। यह समावेश दशा है। शिवतासमावेश शाम्भव समावेश है। यह श्रीचक्र
साधक का सर्वातिशायी धर्म है। इसका मुख्याधिकारी वाला विकल्प आगमिकता
के अनुकूल है।।१८।।
सप्तममाह
काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्याविहित-हिंसा-स्तेय-
लोक-विद्विष्टवर्जनम्।।१९।।
कामो वैषयिकी इच्छा। इदं मे भूयादित्याकारिका क्रोधस्तमस उद्रेकेण
जनितोऽसौ अन्तःकरणधर्मः। लोभो द्रव्यादिनिष्ठस्वत्वत्यागप्रतिबन्ध-
कोऽत्यन्तमनुरागविशेषः। मोहः, कार्याकार्याविचारणम्। मदो गर्वः। मात्सर्यं

दीक्षाविधिः २१
द्वेषजनितो गुणिनि दोषारोपः। अविहितहिंसा, रागेण भक्षणार्थं पश्वादिवधः।
स्तेयं, पराननुमत्या परद्रव्यहरणम्, लोकविद्विष्टं, मातृबुद्ध्याऽपि एकान्ते
परस्त्रीसंलापादि। एतेषां वर्जनं त्यागः कर्त्तव्य इति शेषः॥१९॥
वैषयिकी इच्छा को काम कहते हैं। 'मुझे यह वस्तु मिल जाय' इस विषय
सम्बन्धी इच्छा को काम मानते हैं। क्रोध में तामसिकता का उद्रेक होता है।
यह अन्तःकरण का धर्म है। द्रव्य में अधिकारी का स्वत्व होता है। इस स्वत्व
के त्याग के साथ द्रव्य दूसरे को साधिकार देना दान है किन्तु इसका प्रतिबन्धक
आत्यन्तिक अनुराग पूर्व लिप्सा ही लोभ है। मोह में कार्य और अकार्य का
विचार नहीं होता क्योंकि इसमें चेतना अपना काम नहीं कर पाती। मद
मूर्खतापूर्ण गर्व होता है। मात्सर्य में द्वेषभाव से अच्छे पुरुष में दोष दिखायी
पड़ने लगते हैं। हिंसा दो प्रकार की होती है— १. विहित और २. अविहित।
वैदिकी हिंसा विहित मानी जाती है। मांस खाने की तामसी इच्छा से पशुवध
अविहित हिंसा मानी जाती है। स्तेय विना स्वामी की अनुमति के उसका द्रव्य-
हरण करना कहलाता है। यद्यपि ये सारी क्रियायें और आचरण लोकविरुद्ध हैं,
फिर भी कुछ ऐसे कार्य होते हैं, जो प्रत्यक्षतः लोकविद्वेष के कारण बन जाते
हैं। जैसे मातृ-भावन अपनाकर दूसरी स्त्री से एकान्त में बातें करना आदि। इन
सब का वर्जन आवश्यक है।
भगवान् परशुराम श्रीविद्या के उपासक को आदर्श चरित पुरुष के रूप में
देखना चाहते हैं। यह आशा स्वाभाविक है कि, उपासक सर्वगुणसम्पन्न हो। यह
भी सच्चाई है कि, इन दुर्गुणों का त्याग सामान्य स्तर के व्यक्ति के लिये असम्भव
है। इस सूत्र में जिस पुरुष का प्रकल्पन किया गया है, वह साधना के सोपानों
को पार कर पारमेश्वर शक्तिपात का अधिकारी हो जाता है। केवल कथन से यह
सम्भव नहीं। आयास-साध्य उपासकधर्म अपनाना आवश्यव है॥१९॥
अष्टमं धर्ममाह
एकगुरूपास्तिरसंशयः॥२०॥
न विद्यते संशयो यत्रेति विग्रहेण असंशय इत्येकगुरूपास्ति-
विशेषणम्, भिन्नलिङ्गत्वमार्षम्।

२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
अयं भावः—अनेकगुरूपास्तौ पूर्वगुरूक्तविरुद्धं यदि वदेत् तर्हि संशयो
भवेदेव।
एकगुरूपास्तौ न संशयो भवेत्। अत एकगुरूपास्तिः कार्येति भावः।
गुरूपास्तेः 'सम्प्रदायविश्वासाभ्याम्' इति पूर्वसूत्रेणैव प्राप्तौ पुनर्विधानम्
एकं गुरुमाश्रित्य न गुर्वन्तरमाश्रयेद् इति इतरगुर्वाश्रयनिवृत्तिफलकेयं
परिसंख्या॥२०॥
असंशय शब्द का अर्थ करते समय नञ् समास का अभाव अर्थ और
संशय इन दोनों का साथ विचार करना चाहिये। इस आधार पर कहा जा सकता
है कि, जहाँ संशय का अभाव हो, उसे असंशय कहते हैं। पूरे सूत्र का इस
सन्दर्भ में अर्थ होता है— एक गुरु की उपासना संशयरहित होनी चाहिये।
असंशय शब्द में पुंलिङ्ग प्रयोग और उपास्ति का स्त्रीलिङ्ग प्रयोग आर्ष प्रयोग
है। इस तरह असंशय शब्द उपास्ति का विशेषण सिद्ध हो जाता है।
गुरु शब्द से यहाँ दीक्षागुरु अभिप्रेत है। गुरु ज्ञान के प्रकाश से शिष्य
के जीवन को धन्य बना देता है। ऐसे गुरु की असंशय उपासना शिष्य का
परमकर्त्तव्य है। अनेक गुरु नहीं हो सकते। 'ज्ञानवान् गुरुरिष्यते' के अनुसार गुरु
ज्ञानवान् होना ही चाहिये। अनेक गुरुओं की उपासना से व्यवहार खण्डित हो
जाता है। पहले गुरु के वचन के विरुद्ध कुछ कहने पर संशय उत्पन्न होना
स्वाभाविक है। वहीं एक ज्ञानवान् गुरु के तपःपूत व्यक्तित्व और उनकी दीक्षा
के लाभ से अभिभूत शिष्य के मन में शङ्का के लिये कोई स्थान नहीं होता।
इसलिये गुरु एक ही होना चाहिये और उसी में श्रद्धा और आस्था की दृढ़ता
अपनानी चाहिये। पहले आये हुए सूत्र—'सम्प्रदायविश्वासाभ्याम्' में सम्प्रदाय
शब्द सम्यक् रूप से गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान प्रकर्ष के उत्तरदायित्व के नियमों को
व्यक्त करता है। शिष्य उन नियमों का विश्वासपूर्वक पालन करता है। गुरु की
उपासना के ये दो मूलभूत तत्त्व हैं— १. सम्प्रदाय और २. विश्वास। इस सूत्र
से भी एक गुरु की उपासना संकेतित हो रही है। फिर भी इस सूत्र द्वारा पुनः
एक गुरूपासना का विधान एक गुरु का त्याग कर गुर्वन्तर आश्रय का बलपूर्वक
निषेध करने के लिये किया गया है। गुर्वन्तरोपास्तिनिवृत्तिफलक यह सिद्धान्तनिष्ठ
विधान है। इसमें संशयवाद और तर्क के लिये कोई स्थान नहीं रह गया है॥२०॥

दीक्षाविधिः २३
नवमं धर्ममाह
सर्वत्र निष्परिग्रहता ॥२१॥
सर्वत्र मपञ्चकादिषु निष्परिग्रहता। निर्गतः परिग्रह इच्छा यस्य सः
निष्परिग्रहः। तस्य भावस्तत्ता। “पत्नीपरिजनादानमूलशापाः परिग्रहाः”
इत्यमरः। अत्रादानस्य परिग्रहस्य मूलम् इच्छैव, एतादृशकोशानुसारेण परिग्रह-
शब्द इच्छावाचकः। मपञ्चकं मे भूयाद् इतीच्छया न स्वीकार्यम्।
यद्वा—सर्वत्र वस्तुमात्रे निष्परिग्रहता स्वीयबुद्धित्यागः सम्पादनीयः।
सर्वत्र ममता त्याज्येति यावत्॥२१॥
सर्वत्र मपञ्चक आदि में निष्परिग्रहता होनी चाहिये। यह सूत्र का संक्षिप्त
अर्थ है। यहाँ सर्वत्र शब्द का मपञ्चक आदि में यह अर्थ किया गया है।
सामान्यतया सर्वत्र शब्द से सर्वस्थान का प्रकल्पना होता है। सर्व शब्द के परिवेश
में सारा विश्वप्रपञ्च आता है। इस दृष्टि से इसका अर्थ 'इस विश्वात्मक प्रपञ्च
और स्थानात्मक विस्तार में परिग्रह बुद्धि नहीं रहनी चाहिये' यही होना चाहिये।
परिग्रह शब्द अमरकोश के अनुसार पत्नी, परिजन, आदान, मूल और
शाप इन अर्थों में प्रयुक्त होता है। कुछ लोग आदान को मूल के साथ जोड़कर
चार अर्थ ही करते हैं। इस दृष्टि से जिन व्यक्तियों के स्वभाव से ये निर्गत
हो जाते हैं, वे निष्परिग्रह कहलाते हैं। निष्परिग्रह का भाव ही निष्परिग्रहता
कहलाती है। परिग्रह शब्द का 'इच्छा' अर्थ भी करते हैं। मपञ्चक में मेरी इच्छा
हो अथवा मपञ्चक मुझे हो इस इच्छा से किसी की स्वीकृति नहीं होनी चाहिये।
इस सूत्र का एक वैकल्पिक अर्थ भी वृत्तिकार ने प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार
सर्वत्र वस्तु मात्र में 'यह मेरी है' इस प्रकार की बुद्धि का त्याग ही सर्वत्र निष्परि-
ग्रहता है। इसका सदैव सम्पादन होना चाहिये। अर्थात् कहीं ममता नहीं होनी
चाहिये॥२१॥
दशमं धर्ममाह
फलं त्यक्त्वा कर्मकरणम् ॥२२॥
फलं पूर्वोक्तं कृत्रिमं तत्साधनं च धर्मार्थकामा इति यावत्।
फलविषयिणी इच्छा फलपदस्यार्थः। तं त्यक्त्वा कर्मणो विहितस्य करणं

२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
भवतीति शेषः। काम्यं कर्म न कर्त्तव्यमित्यर्थः। काम्यं कर्म न कर्त्तव्यमिति
वक्तव्ये फलं त्यक्त्वा कर्त्तव्यमिति कथनात् काम्यानामपि कर्मणामीश्वरार्पण-
बुद्ध्या अनुष्ठानं कर्त्तव्यमिति ज्ञायते।।२२।।
'फल का त्याग कर कर्म करना चाहिये' यह सूत्र का सार अर्थ है। जहाँ
तक फल का प्रश्न है, इसके कृत्रिम फल साधन धर्म, अर्थ और काम हैं।
फल का तात्पर्य फलविषयक इच्छा ही है। इस फलाकाङ्क्षा का परित्याग कर
विहित कर्म का करना उत्तम होता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि, काम्य
कर्म नहीं करना चाहिये। सूत्र में यही कहना चाहिये था। उसके स्थान पर फल
का त्याग कर करना चाहिये, यह कथन यह निर्दिष्ट करता है कि, ईश्वरार्पण
बुद्धि से काम्य कर्म सम्पादित करना चाहिये।।२२।।
एकादशं धर्ममाह
अनित्यकर्मलोपः ।।२३।।
नित्यं च तत्कर्म च नित्यकर्म, स्नानसन्ध्यापूजादि। तस्य लोपः
अननुष्ठानं नित्यकर्मलोपः। न विद्यते नित्यकर्मलोपो यस्मिन्नुपासके स
अनित्यकर्मलोपो भवेदिति शेषः। नित्यकर्म अवश्यंकर्त्तव्यमित्यर्थः। नित्य-
कर्म कर्त्तव्यमिति वक्तव्ये व्यतिरेकमुखेन कथनं, त्यागे न केवलं क्रतुवैगुण्यम्,
प्रत्यवायो निरयश्चेति ज्ञापयति।।२३।।
नित्य और कर्म दो शब्दों का समवायगत अर्थप्रद यह नित्यकर्म शब्द है।
स्नान, संध्या और पूजा आदि नित्यकर्म माने जाते हैं। इनका अनुष्ठान नियमित
होना चाहिये। अनुष्ठान का लोप अर्थात् अननुष्ठान ही नित्यकर्म लोप माना जाता
है। नित्यकर्म लोप जिस उपासक का नहीं होता है, वह अनित्यकर्मलोप उपासक
होता है। अर्थात् उपासक का यह धर्म है कि, वह नित्यकर्म अवश्य करे। नित्य-
कर्म करना चाहिये, वस्तुतः सूत्र में यही कहना चाहिये था किन्तु सूत्रकार ने
व्यतिरेक शैली का आश्रय लिया है। इससे यह सूचित होता है कि, नित्यकर्म
के त्याग से न केवल कर्म-वैगुण्य होता है, नरक की भी प्राप्ति सम्भव है।।२३।।
ननु नित्यकर्म-साधनीभूत-मपञ्चकालाभे कथं कार्यमित्याशङ्कायामाह
मपञ्चकालाभेऽपि नित्यक्रमप्रत्यवमृष्टिः ।।२४।।

दीक्षाविधिः २५
मपञ्चकालाभे मुख्यं नास्तीति न कर्मलोपः। किन्तु प्रतिनिधिनाऽपि
नित्यक्रमो नित्यपूजा तस्याः प्रत्यवमृष्टिः अनुष्ठानं कर्त्तव्यमिति शेषः। तेन
नित्यपूजायां विशेषद्रव्यालाभेऽपि प्रतिनिधिना निर्वाहः सूचित इति नित्य-
पूजायामेवाभ्यनुज्ञा, नान्यत्रेति।।२४।।
मपञ्चक द्रव्यों की अप्राप्ति होने पर मुख्य द्रव्य नहीं है, यह सोच कर
कर्म में अवरोध नहीं आने देना चाहिये। प्रतिनिधि द्रव्य से भी नित्यपूजा का
क्रम पूरा करना कर्म का अनुष्ठान ही होता है। इसलिये यह सिद्धान्त रूप से
मान्य है कि, विशेष द्रव्य के न रहने पर भी प्रतिनिधि द्रव्य से निर्वाह करना
आवश्यक है। यह अभ्यनुज्ञा नित्यकर्म के लिये है। किसी अन्य काम्य या
नैमित्तिक के लिये नहीं।।२४।।
द्वादशं गुणमाह
निर्भयता सर्वत्र ।।२५।।
सर्वत्र सर्वतः मपञ्चकस्वीकारे कौलमार्गावलम्बनेन नरकादि-
प्रतिपादकानि यानि शास्त्राणि तेभ्यः सर्वेभ्यो निर्गतं भयं यस्मात् स निर्भयः,
तस्य भावस्तत्ता सम्पादनीयेति शेषः। तानि सर्वाणि शास्त्राणि रागिणं
भीषयन्ति कामं भीषयन्तु, अहं तु न रागी किन्तु शास्त्रेण प्रवर्तितेन न मे
भीतिरिति निर्धारणेन निर्भयता सम्पादनीयेति भावः।।२५।।
मपञ्चक से सर्वत्र पूजा को कौलमार्ग अङ्गीकार करता है। कौल शास्त्र
यह प्रतिपादित करते हैं कि, इनसे निरय (नरक) आदि की सम्भावना नहीं होती।
इससे उपासक निर्भय हो जाता है। भय तो रागी व्यक्तियों को होता है।
श्रीविद्योपासक रागी नहीं होता। अतः इसे निर्भय रहना चाहिये।।२५।।
सकलसिद्धान्तसारभूतं धर्ममाह
सर्वं वेद्यं हव्यम्, इन्द्रियाणि स्रुचः शक्तयो ज्वालाः स्वात्मा
शिवः पावकः स्वयमेव होता।।२६।।
इति भावयेदिति शेषः। अन्तःकरणवृत्तिभिरिति वेद्यमित्यस्यादौ पूरणीयम्।
अन्तःकरणवृत्तिवेद्यं सर्वं हविष्ट्वेन भावयेत्। यथा अग्नौ प्रक्षिप्तं हविस्तदाकारं

२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
भवति एवं वृत्तिवेद्यानां सर्वेषां शिवरूपेऽग्नौ होमे सति शिवाकारसम्पत्तेस्तेषु
हविष्ट्वेन भावनं युक्तम्।
तादृशहविष आधारभूतहोमसाधनीभूत-जुहूरेव स्रुक्पदेन गृह्यते, न
स्रुवादयः, तेषां स्रुक्पदवाच्यत्वेऽपि होमसाधनत्वाभावेन होमभावनाप्रकरणे
स्रुवादीनामयोग्यत्वात्।।२६।।
यह सारा विश्व ही वेद्य है। वेद्यवस्तु का ज्ञान अन्तःकरण की वृत्तियों
से होता है। इसलिये यह कहा जा सकता है कि, अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा
सारा वेद्यमात्र आध्यात्मिक यज्ञ में अर्पित करने योग्य हवनीय द्रव्य है। सारी
इन्द्रियाँ स्रुक् हैं। हविष्य के आधारभूत होम में साधन रूप से प्रयुक्त मुख्य पात्र
स्रुक् होता है। स्रुवा आदि नहीं। स्रुवा होम का साधन नहीं होता। होम भावना
के सन्दर्भ में स्रुवा स्रुक् के समक्ष कोई महत्त्व नहीं रखता। शक्तियाँ ज्वाला
हैं। स्वात्मा शिव ही पावक है। और उपासक स्वयं होता माना जाता है। जैसे
अग्नि में अर्पित हविष्य अग्निसात् होकर अग्निरूप में परिवर्त्तित हो जाता है।
इसी तरह वृत्तिवेद्य सभी वस्तुजात को शिवरूप अग्नि की ज्वाला में हवन से
शिवरूपत्व की उपलब्धि हो जाती है। इसलिये वेद्यों का हविष्ट्व-भावन और
शिव रूप में सर्व समर्पण का भाव उपासक व्यक्ति के लिये अनिवार्यतः
आवश्यक माना जाता है।।२६।।
एवमनुष्ठितभावनायाः फलमाह
निर्विषयचिद्विमृष्टिः फलम्।।२७।।
निर्विषयाया निर्विकल्परूपायाश्चितो विमृष्टिः फलम्। पूर्वोक्तभावनाया
इति शेषः।।२७।।
पौराणिक भगवान् शिव को सच्चिदानन्द कहते हैं। आगमिक चिदानन्दघन
कहते हैं। चित् निर्विकल्प रूप ज्ञान होता है।
आणव भाव में सविकल्पकात्मकता का प्रभाव होता है। जब उपासक
अणुता पर विजय कर आध्यात्मिक यज्ञ का होता बनकर इसे सिद्ध कर लेता
है, उस समय उसका चिद्विमर्श निर्विकल्पदशा का स्पर्श कर लेता है। यही इस
उपासना का फल है।।२७।।

दीक्षाविधिः २७
ननु किमीदृशफललाभेनेत्यत आह
आत्मलाभान्न परं विद्यते॥२८॥
आत्मलाभात् स्वरूपलाभात् परं श्रेष्ठं फलम् इति पूर्वसूत्रस्थम-
नुषज्यते। न विद्यते नास्तीत्यर्थः। “पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा
गतिः” इति ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ इति च श्रुतिः। इममर्थं
प्रतिपादयति। मोक्षः परमपुरुषार्थ इत्यत्र न कोऽपि विवादं करोति।
अतस्तादृशभावनया परमपुरुषार्थ इति भावः। पूर्वं “स्वविमर्शः पुरुषार्थः”
इत्यनेन पुरुषार्थस्वरूपं प्रतिपादितम् अत्र स्तुतिरिति न पौनरुक्त्यम्॥२८॥
इस जीवन में स्वात्म रूप ही विस्मृत हो चुका है। इसी की उपलब्धि
जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि मानी जाती है। स्वरूप लाभ से बढ़कर कोई लाभ
नहीं हो सकता। इसे ही निर्विषय चिद्-विमृष्टि शब्द के माध्यम से पूर्व सूत्र
में परिभाषित किया गया है। भगवती श्रुति कहती है—
“पुरुष से पर अर्थात् उसको अतिक्रान्त कर वर्त्तमान कोई नहीं है। पुरुष
सत्ता की अनुभूति सर्वातिशायिनी सीमा है और वही सर्वोत्तम गति भी है।”
इसके अतिरिक्त भी कहा गया है कि, “उस परमेश्वर को इस रूप में जानने
वाला स्वयम् अमृत हो जाता है।”
ये दोनों उक्तियाँ इस सूत्र का समर्थन कर रही हैं। मोक्ष को परम पुरुषार्थ
कहते हैं। वह निर्विवाद तथ्यात्मक सत्य है। इस आधार पर यह कहा जा सकता
है कि, उक्त पुरुषार्थ भाव का भावन जीवन के चरम उत्कर्ष का साधक हो
सकता है। पहले स्वात्मविमर्श को पुरुषार्थ कहा गया है। यहाँ पुरुषार्थ के महत्त्व
का प्रतिपादन है, पुनरुक्ति नहीं है॥२८॥
अत्रायं सिद्धान्तः इत्यारभ्य प्रक्रान्तमर्थमुपसंहरति
सैषा शास्त्रशैली॥२९॥
सैषा पूर्वोक्ता शास्त्रशैली। शास्तीति शास्त्रं पञ्चाम्नायरूपं, तस्य शैली
रीतिर्भवतीति शेषः ॥२९॥
ऊपर निर्दिष्ट धर्मों का स्वरूप, उनका प्रतिपादन और उनके अनुसन्धान-
पूर्वक आचरण विज्ञान का सारा विस्तार शास्त्र की शैली मानी जाती है। शैली

२८ परशुरामकल्पसूत्रम्
को रीति भी कहते हैं। किन्तु शैली रीति से महत्त्वपूर्ण होती है। अभिव्यक्ति
के विशिष्ट प्रकार को शैली कहते हैं। वहीं रीति एक अनुकरणीय पद्धति मात्र
होती है। शास्त्र का शील पाँच आम्नायों में अभिव्यक्त है। उसे पूर्व, दक्षिण,
उत्तर, पश्चिम और ऊर्ध्वाम्नाय रूपों में जाना जाता है।।२९।।
एतादृशं शास्त्रं श्रोतॄप्रवृत्तये प्रशंसति
वेश्या इव प्रकटा वेदादिविद्याः ।
सर्वेषु दर्शनेषु गुप्तेयं विद्या ।।३०।।
वेश्या इव प्रकटाः सुलभा वेदादि-विद्याः। आदिना स्मृत्यादिः।
वेश्योपभोगो द्रव्यादिव्ययेन यथा सुलभः, एवं वेदादि-विद्यालाभो द्रव्यादिदानेन
सुलभ इत्यर्थः। अध्ययनस्य लोभमूलता शास्त्रेणैव प्रतिपादिता। “षष्णां तु
कर्मणां मध्ये त्रीणि कर्माणि जीविका”। इति।
अस्याः मोक्षसाधनीभूतब्रह्मविद्यायास्तु न कोटिकनकव्ययेनापि लाभः
किन्तु गुरुकृपैकलभ्यत्वम्।।३०।।
सारी वेद आदि विद्यायें जो प्रकट हैं अर्थात् सर्वसुलभ हैं, उनका
परमपुरुषार्थ लाभ की दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं है। वे रहस्य विद्यायें नहीं हैं।
वेद आदि शब्द में आदि शब्द से स्मृति आदि का ग्रहण होता है।वे भी प्रकट
विद्यायें हैं। ये सारी विद्यायें सूत्रकार की दृष्टि से वेश्याओं के समान हैं।
वेश्याओं का उपभोग द्रव्य आदि के व्यय से सभी लोग कर सकते हैं।
वेद आदि विद्याओं के स्वाध्याय का अभिलाष मन में और पास में द्रव्य का
प्रबन्ध हो तो, अध्यापक को घर पर बुला कर भी पढ़ा जा सकता है। सूत्रकार
के समकालीन पैसा लेकर पढाने वालों पर यह एक कटाक्ष की तरह प्रतीत
होता है। यह सत्य है कि, इन प्रकटविद्याओं का उपभोग उसी तरह सर्वसुलभ
है जैसे वेश्या वर्ग का उपभोग।
अध्ययन की लोभमूलकता की चर्चा शास्त्रों में भी की गयी है। एक
स्थान पर कहा गया है कि,
“ब्राह्मणों के छः कर्म (पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना और दान देना
एवं लेना) निर्धारित हैं। इनमें से तीन कर्म (पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना)
तो जीविकार्थ ही स्वीकृत हैं।”

दीक्षाविधिः २९
जीविका के प्रति लोभ स्वाभाविक है। इन तीनों से द्रव्योपार्जन होता है।
अर्थ के अभाव से जीवन कष्टसाध्य हो जाता है। पर इस कष्ट को प्राचीन ब्राह्मण
वर्ग सहर्ष स्वीकार करता था।
जहाँ तक परमपुरुषार्थसाधनीभूत ब्रह्मविद्या का प्रश्न है, यह रहस्य विद्या
है। करोड़ों द्रव्य व्यय कर भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह एकमात्र गुरुकृपा
और उनके अनुग्रह पर निर्भर है। इसलिये यह सर्वातिशायिनी ब्रह्मविद्या है ।।३०।।
एतावत्पर्यन्तं शास्त्रमनूद्य उपासकेन प्रथमां कर्त्तव्यां क्रियामाह
तत्र सर्वथा मतिमान् दीक्षेत ।।३१।।
सप्तमी षष्ठ्यर्थे, प्रकृत्यर्थः श्रीविद्योपास्तिः। षष्ठ्यर्थः सम्बन्धः
तदव्यवहितपूर्ववृत्तित्वम्। तस्य दीक्षापदार्थे आश्रयतया अन्वयः। तस्य
करणत्वसम्बन्धेन भावनायामन्वयः। तथा च श्रीविद्योपासनाऽव्यवहितपूर्ववृत्ति
दीक्षया इष्टं भावयेद् इति विशिष्टबोधः। अत एवोत्पत्तिविधिः। सर्वथा अवश्यं
मतिमान् पूर्वोक्तभूमिकामारूढः। एतत्पदस्वारस्यादेव अयमधिकारविधिरपि।
तादृशभूमिकामारूढस्यैव अधिकारो नान्यस्येति सिद्धम्।।३१।।
तत्र शब्द में सप्तमी विभक्ति का अर्थ सम्बन्ध का द्योतक है। प्रकृत
प्रक्रान्त तत्त्व यहाँ श्रीविद्या है। सम्बन्ध अव्यवहितपूर्व वस्तु से होता है।
श्रीविद्योपासना के अव्यवहितपूर्व दीक्षा होनी चाहिये। श्रीविद्योपासना दीक्षा पर
ही आश्रित है। दीक्षा में करण कारक का अन्तर्भाव है अर्थात् दीक्षा के ग्राह्य
सिद्धान्तों के द्वारा उपासना करे। इसे इस तरह कह सकते हैं कि, श्रीविद्योपासना
के अव्यवहितपूर्व दीक्षा द्वारा इष्ट का भावन करना चाहिये। यह विशिष्ट बोध
उत्पन्न होता है। इस आधार पर इस सूत्र को उत्पत्तिविधि भी कह सकते हैं।
पूर्व भूमिका में आरूढ व्यक्ति ही मतिमान् कहा जाता है। उपासना में मति
है। अत एव वह मतिमान् है। ऐसे मतिमान् को ही दीक्षा में अधिकार है।
इसलिये इस सूत्र को अधिकारविधि सूत्र भी कह सकते हैं ।।३१।।
दीक्षात्रयम्
एवं दीक्षां विधाय तत्र अवान्तरभेदवतीषु तासु एककालसम्बन्धं
विधातुम् आदौ तां विभज्य विभागप्रयोजकं धर्मं च प्रदर्श्य तासु तिसृष्वपि
एककालसम्बन्धरूपं गुणं विधत्ते—

३० परशुरामकल्पसूत्रम्
दीक्षास्तिस्रः, शाक्ती, शाम्भवी मान्त्री चेति। तत्र शाक्ती
शक्तिप्रवेशनात्, शाम्भवी चरणविन्यासात्, मान्त्री मन्त्रोपदिष्ट्या
सर्वाश्च कुर्यात् ॥३२॥
चेतीत्यन्तेन विभागं कृत्वा तासां नामकथनम्। तत्र तासु मध्ये
शाक्तीत्यस्यार्थं विवृणोति— शक्तिप्रवेशनात्। जातेति शेषः। यद्वा
शक्तिप्रवेशनाद् इति हेतौ पञ्चमी। शक्तिप्रवेशनाद् या दीक्षा शक्तिप्रवेश-
हेतुकीत्यर्थः। एवमेवाग्रेऽपि। प्रवेशनादिति स्वार्थे ल्युट्। शक्तिप्रवेशनं नाम
अग्रे 'तदमृतक्षालितम्' इत्यारभ्य पाशान् दग्ध्वा' इत्यन्तं प्रतिपादिता क्रिया।
चरणविन्यासो नाम शिष्यशिरसि गुरुकर्त्तृकं कामेश्वरी-कामेश्वरयो
रक्तशुक्लचरणभावनम्। मन्त्रोपदेशस्तु स्पष्टः। शिष्यमात्रश्रावणविषय-
गुरुकर्त्तृकशब्दोच्चारणरूपः। सर्वाः पूर्वोक्ताः। तिस्रश्चेत्यनेन एककालसम्बन्धः
तासु बोध्यते। च-शब्दः साहित्यवाची। साहित्यं च एककालसम्बद्धत्वरूपम्।
तथा च सर्वा दीक्षाः सह कुर्यादिति फलितोऽर्थः।
दीक्षात्रय
प्रथम सूत्र में यह प्रतिज्ञा की गयी है कि, दीक्षा की व्याख्या करने जा
रहा हूँ। उसके बाद उपासना के स्वरूप और उपासकों के धर्मों एवं गुणों की
चर्चा की गयी। पुनः शास्त्र-शैली के प्रसङ्ग में विद्या की अत्यन्त गोपनीयता
का वर्णन सूत्र ३० तक कर दिया गया है। सूत्र ३१ में दीक्षा की आज्ञा प्रदान
कर दी गयी। इस बत्तीसवें सूत्र में दीक्षा के भेद और इनके एककालिक संबन्ध
का विधान करने के लिये सूत्र का प्रवर्त्तन कर रहे हैं—
दीक्षायें तीन प्रकार की होती हैं— १. शाक्ती दीक्षा, २. शाम्भवी और
३. मान्त्री।
१. शक्ति प्रवेशन के माध्यम से दी जाने वाली दीक्षा शाक्ती कहलाती
है। हेतु अर्थ में 'प्रवेशनात्' में प्रयुक्त पंचमी विभक्ति शक्ति-प्रवेश के द्वारा दी
जाती है, यह अर्थ अभीप्सित है। स्वार्थ में ल्युट् का प्रयोग किया गया है।
शक्ति प्रवेशन की प्रक्रिया का वर्णन इसी क्रम के सूत्र ३५ और ३६ में किया
गया है।

दीक्षाविधिः ३१
२. शाम्भवी दीक्षा चरण विन्यास द्वारा दी जाती है। चरण विन्यास एक
आध्यात्मिक भावन है। कामेश्वरी और कामेश्वर के रक्त और शुक्ल वर्ण के अरुण
चरण का शिष्य के शिर पर गुरु द्वारा भावन किया जाता है। शिष्य यह ध्यान
करता है कि, वे चरण उसके उत्तमाङ्ग से सारे शरीर में आध्यात्मिक ऊर्जा का
संचार कर रहे हैं। इस अनुभूति से वह कृतार्थ हो जाता है।
३. मान्त्री दीक्षा मन्त्र के उपदेश से पूरी होती है। गुरु मन्त्र का उच्चारण
करते हैं। शिष्य ध्यान से सुनकर उस नाद सुधा का अनुसन्धान करता है।
जहाँ तक एककाल सम्बन्ध की बात है, इसे सूत्र में प्रयुक्त 'च' अव्यय
से वृत्तिकार ने आविष्कृत किया है। एककालिकता सम्प्रदाय और परम्परा पर
निर्भर करती है। यदि सूत्र क्रम को उत्तरोत्तर उत्कृष्ट माना जाय, तो गुरु पहले
शिष्य पर शक्तिपात करें। तब शाम्भवी का भावन करावें और तदुपरान्त
मन्त्रोपदेश देकर शिष्य को कृतार्थ करें। ये सारी क्रियायें एक दिन में ही पूरी
करें, यह क्रम उपयुक्त लगता है। अन्य विद्वद्वर्ग की दृष्टि से 'च' का तीनों
भेदों का स्पष्ट उल्लेख कर उनका यथावसर शिष्य की परीक्षा के उपरान्त
अनुपालन करना चाहिये, यही वास्तविक अर्थ है। जो हो, परम्परा का प्राधान्य
सर्वमान्य है। आणव, शाक्त और शाम्भवोपाय-क्रम के अनुसार सर्वप्रथम मान्त्री
दीक्षा, पुनः शाक्ती दीक्षा और अन्त में प्रतिबोध को सिद्ध करने के लिये शाम्भवी
दीक्षा दी जानी चाहिये। सूत्र में प्रयुक्त क्रम, विशिष्ट साम्प्रदायिक क्रम का द्योतक
है। इस पर श्रीविद्या के उपासकों को विचारपूर्ण निर्णय लेना चाहिये।।३२।।
परेषां मतमाह
एकैकां वेत्येके ।।३३।।
वीप्सया त्रयाणां समुच्चयः। काल-भेदमात्रमिति ज्ञापितम्। 'वा'कारेण
मध्ये चिरकालव्यवधानं कार्यम्, न तु दिवसत्रय इति सूचितम्।।३३।।
सूत्र-संख्या ३२ के हिन्दी अर्थ में इसी पक्ष का समर्थन किया गया है।
भेद सिद्ध है, तो काल-क्रम भी सिद्ध है। अन्यथा एक ही क्रिया की ये तीन
प्रक्रियायें मान ली जायेंगी। वस्तुतः ये स्वतन्त्र प्रक्रियायें हैं, और असामान्य रूप
से अपनाने योग्य हैं। दीक्षा जीवन के उत्कर्ष की विधायिका और परमपुरुषार्थ
की साधयित्री है। अतः इसमें सावधानी की अपेक्षा की जाती है।।३३।।

३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
इतःपरं गुरुकर्त्तृकां क्रियामाह
सद्गुरुः क्रमं प्रवर्त्य साङ्गं हुत्वा तरुणोल्लासवान् शिष्यमाहूय
वाससा मुखं बद्ध्वा गणपति-ललिता-श्यामा-वार्त्ताली-परा-पात्र-
बिन्दुभिरस्तमवोक्ष्य सिद्धान्तं श्रावयित्वा।।३४।।
साङ्गम् अङ्गैः सहितं क्रमं प्रधानदेवतापूजां प्रवर्त्य कृत्वा। अत्र अङ्गानि
गणपति-ललिता-श्यामा-वार्त्ताली-पराः। प्रधानं च ललिता अत्र अङ्गपदेन
अङ्गक्रमोपलक्ष्यते। अङ्गक्रमसहितं प्रधानक्रमम् इत्यर्थः। द्वितीयखण्डारम्भे
“इत्थं सद्गुरोराहितदीक्षो महाविद्याराधनप्रत्यूहापोहाय गाणनायकीं पद्धति-
मामृशेत्” इत्यत्र विघ्नापोहाय यत्क्रियते तत्प्रधानम् अङ्गं लोके दृष्टम्।
एवं तृतीयखण्डारम्भे “एवं गणपतिमिष्ट्वा नायिकायाः श्रीललितायाः
क्रममारभेत” इति क्त्वाप्रत्ययेनापि ललितोपास्त्यङ्गत्वं स्पष्टम्।
श्यामोपास्तिखण्डे तस्याः प्रधानसचिवपदं श्यामा। अन्यास्तस्मादिमा
अङ्गदेवताः।
शिष्यमाहूय इत्यनेन तावत्पर्यन्तं शिष्यस्यान्तः प्रवेशो नास्ति इति
ज्ञापितम्। अत्र पात्रपदेन विशेषार्घ्यपात्रं ग्राह्यम्। सिद्धान्तं सिद्धान्तप्रतिपादक-
वाक्यसमूहं श्रावयित्वा।।३४।।
ये सूत्र गुरुकर्तृक प्रक्रिया का प्रवर्त्तन कर रहे हैं। सद्गुरु शब्द गुरु के
सर्वातिशायी पारदृश्वा स्तर के स्वरूप का संकेत कर रहे हैं। ऐसे ज्ञानवान् गुरुदेव
दीक्षा क्रम का प्रवर्त्तन करते हुए आङ्गिक शक्तियों के क्रमानुसार हवन करने
की व्यवस्था करें। उनमें सम्प्रदाय की आस्था का ओज है, श्रद्धा का उल्लास
है और विश्वास का तारुण्य है। इन उच्च गुणों से गौरवास्पद गुरुदेव शिष्य
को वहाँ आहूत करें। अब तक शिष्य वहाँ नहीं था। गुरुदेव ने इन प्रक्रियाओं
को पूरा करने के उपरान्त शिष्य को बुलाया है। शिष्य वहाँ आया। आज्ञा लेकर
वहीं बैठ गया। गुरुदेव ने सबसे पहले कपड़े से उसके पूरे मुख को ढक कर
बाँध दिया। मुख बाँधने की क्रिया ऐकाग्र्य के उद्देश्य से करनी पड़ती है।
गुरुदेव ने अब तक सारा उपक्रम पूरा कर लिया है। दीक्षा देने के अवसर
पर समस्त करने योग्य विधियाँ पूरी कर ली गयी हैं। इस सूत्र के सन्दर्भ में

दीक्षाविधिः ३३
सर्वप्रथम करने योग्य सारे अङ्गों से समन्वित क्रम का प्रवर्तन कर लिया है।
शिष्य आ गया है। उसके नेत्र बाँध दिये गये हैं। अब उसे श्रीविद्योपासना के
सिद्धान्तों को सुनाना है।
सूत्रकार के निर्देशानुसार सर्वप्रथम गणपति, ललिता, श्यामा, वार्त्ताली,
और परा रूप उपास्यों के निर्धारित विशेषार्घ्य पात्र में रखे पवित्र जल-बिन्दुओं
से शिष्य को प्रोक्षित करते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, इनमें प्रधान
उपास्या माँ ललिताम्बा है। सूत्र में प्रयुक्त अङ्गशब्द क्रम का भी द्योतन करता
है। अङ्गक्रम के साथ ही प्रधान क्रम अपनाना उचित होता है।
इस अङ्ग क्रम के अनुसार प्रथम अङ्ग गणपति हैं। द्वितीय खण्ड के
आरम्भ में एक तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। वहाँ लिखा गया
है कि,
“सद्गुरु द्वारा दीक्षा के लिये निर्देशानुसार स्वीकृत अनुशासन की योग्यता
से विभूषित और दीक्षा के लिये निर्धारित स्थान पर अवस्थित दीक्ष्य
श्रीविद्योपासना में आने वाले विघ्नों के निराकरण के लिये गणपति-क्रम-पद्धति
का स्वात्म परामर्श करे।”
इस निर्देश में यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि, विघ्नों के निराकरण
के लिये जो सबसे पहले स्वीकार्य होता है, वही प्रधान अङ्ग माना जाता है।
यह लोकसमर्थित दृष्टि है।
इसी तरह तृतीय खण्ड के आरम्भ में भी लिखा है कि, गणपति की
आराधना से उपासना में आने की सम्भावना वाले सारे विघ्नों का निराकरण
करने के उपरान्त समस्त शक्तिचक्र की एकमात्र नायिका सर्वेश्वरी भगवती
श्री माँ ललिताम्बा की उपासना का क्रम अपनाये।”
इस देशना में आने वाली पूर्वकालिक क्रिया के प्रत्यय से यह प्रतीत
होता है कि, गणपति-क्रम के बाद ललितोपासना का ही क्रम अपनाना चाहिये।
श्यामोपासना खण्ड में यह स्पष्ट उल्लेख है कि, “माँ ललिताम्बा के
प्रधान सचिव पद पर श्यामा ही प्रतिष्ठित हैं।” इस प्रकार अङ्ग की दृष्टि से
विचार करने पर अन्य सभी अङ्ग रूप से उपास्य हैं, यह स्पष्ट हो जाता है।
अन्त में सिद्धान्त श्रावण की प्रक्रिया अपनायी जाती है। सिद्धान्त शब्द

३४ परशुरामकल्पसूत्रम्
श्रीविद्योपासना में स्वीकृत विधियों के प्रतिपादक वाक्य समूह की ओर संकेत
करता है। यहाँ सिद्धान्त का सुनाना मात्र ही निर्दिष्ट है। अर्थबोधपूर्वक समझाने
की अपेक्षा एक संस्कार उत्पन्न करने के लिये शिष्य को सिद्धान्त श्रावण करे,
यही तात्पर्य है।।३४।।
अथ शाम्भवीदीक्षामाह
तच्छिरसि रक्तशुक्लचरणं भावयित्वा तदमृतक्षालितं
सर्वशरीरमलङ्कुर्यात् ।।३५।।
तच्छिरसि शिष्यस्य शिरसि। रक्तशुक्लचरणं, रक्तं कामेश्वर्या रजः-
स्वभावात्। तदुक्तं 'रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्' इति। श्यामा-
रहस्येऽपि—
"रक्तं तु चरणं देव्या रजोरूपं प्रकीर्त्तितम्।
शुक्लं च तदधिष्ठानचरणं सात्त्विकं भवेत्।।"
एतेन शुक्लचरणमपि व्याख्यातम्। प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः। भावयित्वा
ध्यात्वा। तदमृतं चरणसम्बन्धि यदमृतम् उदकं तेन क्षालितं नाशितं सर्वपातकं
यस्य। ईदृशं शिष्यं कुर्यात्। तस्य सर्वं यावच्छरीरं गन्धवस्त्रभूषणकुसुमादिभिः
गुरुः अलङ्कुर्यात्।।३५।।
शाम्भवी दीक्षा के लिये तैयार शिष्य के शिर पर रक्त-शुक्ल चरणों का
ध्यान गुरु करे। भावन क्रिया ध्यानमय होती है। शिर व्यक्ति का उत्तमाङ्ग होता
है। उसमें नादानुसन्धान से लेकर समनापर्यन्त समस्त शक्तियों का उल्लास होता
है। इसलिये शाम्भवी दीक्षा सदृश महत्त्वपूर्ण दीक्षा के लिये उसके शिरोभाग में
कामेश्वरी के रक्त और कामेश्वर के शुक्ल चरणों का भावन कर शिष्य के मस्तिष्क
चक्र को चरण चेतना की चिन्मयता से समन्वित करना आवश्यक होता है।
जहाँ तक रक्त चरण का प्रश्न है, आगम कहता है कि, "रजः स्वभाव
के कारण कामेश्वरी के चरण रक्तवर्णी होते हैं।"
साथ ही यह भी कहा गया है कि, "परा अम्बिका का ध्यान करते समय
माँ के चरणों की लाली में डूब जाना चाहिये"।

दीक्षाविधिः ३५
श्यामारहस्य नामक साधना उपासना के महान् ग्रन्थ में रक्त और शुक्ल
दोनों चरणों के विषय में इस प्रकार लिखा गया है—
"परमोपास्या माँ के चरण लाली से ललित और आकर्षक हैं। यह लालिमा
रजोरूपता की प्रतीक है, ऐसा शास्त्र कहते हैं। कामेश्वर के चरण शुक्लता से
ललाम लगते हैं। इसका कारण परमेश्वर की पारमार्थिक सात्त्विकता है।
सूत्र में चरण शब्द के एकवचन का कारण व्याकरण शास्त्र का वह नियम
है, जिसके अनुसार प्राणियों के अङ्ग प्रयोग में एकवचनत्व हो जाता है।
ऐसे चरण शिष्य के शिरोभाग पर अमृत उड़ेल रहे हैं। चरणों से गङ्गा-
रूप ब्रह्मद्रव की परिकल्पना कितनी हृदयावर्जक है। यहाँ सूत्रकार के अनुसार
उनसे अमृत बरस रहा है। शिष्य के सारे पाप-ताप धुल गये हैं। अब वह
पातकरहित तप्तदिव्यकाञ्चनवत् निर्मल हो गया है। उसका सारा शरीर पावनता
का प्रतीक बन गया है। उसे गुरुदेव अपने अनुग्रह से अलङ्कृत करते हैं।
सूत्रकार ने गुरु के लिये यहाँ विधिलिङ् परस्मैपद प्रयोग द्वारा यह निर्देश दिया
है कि, उसे ऐसा करना चाहिये। वृत्तिकार द्वारा गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार द्वारा
अलङ्कृत करने की बात व्यावहारिक नहीं लगती। यहाँ अलंकरण का तात्पर्य
सारे शरीर को सजाने से नहीं वरन् अनुगृहीत कर पुलकायमान करने मात्र
से है।।३५।।
शाक्तीं दीक्षामाह
तस्यामूलब्रह्मविलं प्रज्वलन्तीं प्रकाशलहरीं ज्वलदनलनिभां
ध्यात्वा तद्रश्मिभिस्तस्य पापपाशान् दग्ध्वा ।।३६।।
तस्य शिष्यस्य मूलं पायूपस्थमध्यवर्त्ति-चतुर्दलकमलाधारदेशः, तन्म-
र्यदेति आमूलम्। एवम् अधोमर्यादामुक्त्वा ऊर्ध्वमर्यादामाह ब्रह्मबिलं सहस्र-
दलकमलाधारभूतं मर्यादा अस्येति आब्रह्मबिलं प्रज्वलन्तीम्, अत एव प्रकाशानां
लहर्य ऊर्मयो यस्यां तादृशीम्, अत एव ज्वालायुक्तो योऽनलोऽग्निस्तन्निभां
तदुपमां ध्यात्वा संविदमिति शेषः। ज्वलदनलनिभत्वादेव पापपाशदाहकत्वमुप-
पन्नम्। पापपाशस्य दाह एव न भावनम् अत एव दग्ध्वेति। यद्यप्यत्रत्यपाठ-
क्रममनुसृत्य आदौ शाम्भवी, ततः शाक्तीति प्रतिभाति, तथाप्युपक्रमे दीक्षा-