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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

( २८ )
३१८ ६८ आयु स्तर के उल्लास के
विशिष्ट समयाचार २६३-२६४
३१९ ६९ अवशिष्ट उपासक धर्म २६४-२६५
३२० ७० आठ पाशों का अवसादन २६५
३२१ ७१ अन्य धर्म २६५-२६६
३२२ ७२ अभ्यर्हितों का आदर २६६
३२३ ७३ प्रकाश की विभावना २६६
३२४ ७४ स्वार्था, गुर्वर्था धारणा २६७
३२५ ७५ गुरु द्वारा उक्त ही कार्य २६७
३२६ ७६ अविचारणीय आदेश २६७
३२७ ७७ सत्य-पालन-दृढता २६८
३२८ ७८ परदार-धन में अनासक्ति २६८
३२९ ७९ आत्मश्लाघा आदि वर्जित सात व्यवहार २६८
३३० ८० सामयिक मुख्य धर्म २६८-२६९
३३१ ८१ शास्त्रान्तर में अनुशिष्ट धर्म भी ग्राह्य २६९
३३२ ८२ कुल-मार्गनिष्ठ की प्रशंसा २६९-२७०
३३३ ८३ दशखण्डी इस महोपनिषद् के अध्येता
की प्रशंसा २७०-२७१
३३४ ८४ पाँच अव्यय शब्दों से पाँच खण्ड
का आकलन २७१-२७२
३३५ ८५ ग्रन्थकार-स्तुति, वृत्तिकार-परिचय, ग्रन्थ-
रचनाकाल २७२-२७३

परशुरामकल्पसूत्रम्
दीक्षाविधिः
[ प्रथमः खण्डः ]
इह खलु श्रीभगवान् परशुरामस्तुरीयपुरुषार्थसाधनं
लघुमध्वानं दर्शयन् प्रतिजानीते—
अथातो दीक्षां व्याख्यास्यामः ।।१।।
अत्र अथशब्दः मङ्गलद्योतकः। अतःशब्दश्च आनन्तर्यद्योतकः। दीक्षा-
पदार्थं सूत्रकारोऽग्रे विवेचयिष्यति। व्याख्यापदार्थश्च निगूढाभिप्रायकशब्दस्य
विविच्य कथनम्। प्रकृते गूढार्थानां तन्त्राणामुपसंहारेण विविच्य कथनं कल्पसूत्रे
इति लक्षणसमन्वयः।।१।।
परशुरामकल्पसूत्र का यह प्रथम सूत्र है। इसमें चार शब्दों का प्रयोग किया
गया है— १. अथ, २. अतः, ३. दीक्षां और ४. व्याख्यास्यामः। अथ शब्द
मङ्गलवाचक है। प्रारम्भ में विषयप्रवर्त्तन 'अथ' शब्द से करने की भारतीय परम्परा
है। उसी का अनुसरण यहाँ किया गया है। अतः शब्द आनन्तर्य का बोधक
है। इसके पहले के कार्य की समाप्ति और उसके बाद नये कार्य के प्रारम्भ
की प्रवृत्ति का आकलन इससे होता है। दीक्षा आँख में अञ्जन की तरह
सर्वदोषनाशिका परमार्थपरिष्कारिका गुरुतः प्राप्त मन्त्रादि-वरद प्रक्रिया है। ग्रन्थ
में आगे चलकर इसका स्पष्टीकरण करेंगे। व्याख्या गूढ अभिप्राय से भरे शब्दों
का विवेकपूर्ण निर्वचन करती है। सूत्र में वर्तमान की उपेक्षा कर भविष्यत् प्रयोग
अभिप्रायगर्भ प्रयोग है।।१।।
भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः सर्वाणि
दर्शनानि लीलया तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय संविन्मय्या भगवत्या

२ परशुरामकल्पसूत्रम्
भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः पञ्चाम्नायान् परमार्थ-
सारभूतान् प्रणिनाय ।। २ ।।
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इति स्मृतः ।।
इत्येतादृशषड्गुणैश्वर्यसम्पन्नो भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः
(श्रुतयः चत्वारि, तदङ्गानि शिक्षा, व्याकरणं, कल्पः, छन्दः, ज्योतिषं,
निरुक्तं चेति षट्, मीमांसा, न्यायः, पुराणं, धर्मशास्त्रम् इति चतुर्दशविद्याः,
आयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्वं, नीतिशास्त्रम् इति चतस्रः, एवमष्टादशविद्याः),
सर्वाणि दर्शनानि, शाक्तदर्शनादीनि, दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्, ज्ञानसाधनम्,
शैवदर्शनम्, वैष्णवदर्शनम्, ब्राह्मदर्शनम्, सौरदर्शनम्, बौद्धदर्शनं चेति षट्
दर्शनानि, लीलयाऽनायासेन तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय निर्माय, संविन्मय्या
भगवत्या भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः सद्योजात-वामदेव-अघोर-
तत्पुरुष-ईशान-संज्ञकैः मुखैः पञ्चाम्नायान् पूर्व-दक्षिण-पश्चिमोत्तराम्नायान्।
परमार्थः अकृत्रिमः तुरीयः पुरुषार्थः तस्मिन् सारभूतान् प्रणिनाय निर्ममे ।। २ ।।
समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन सर्वोत्कृष्ट गुणों
से सम्पन्न भगवान् परमशिव भट्टारक ने अनायास समस्त विद्याओं के अधिष्ठाता
होने के कारण तत्तदावस्थापन्न स्थिति में अष्टादश विद्याओं की रचना की।
साङ्ग चारों वेद, शिक्षा-व्याकरण-कल्प-छन्द-ज्योतिष-निरुक्त, पुराण-धर्मशास्त्र
और मीमांसा, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व और नीतिशास्त्र कुल मिलाकर ये
अष्टादश विद्यायें होती हैं। ये सभी भगवद्रचित विद्यायें हैं।
इनके अतिरिक्त छः दर्शन भी भगवत्प्रवर्त्तित हैं। जिनके द्वारा वास्तविक
दर्शन होता है, उन्हें दर्शन कहते हैं। ये छः माने जाते हैं— १. शैवदर्शन,
२. वैष्णवदर्शन, ३. ब्राह्मदर्शन, ४. सौरदर्शन, ५. शाक्तदर्शन और
६. बौद्धदर्शन। पाणिनि, व्यास आदि अवस्थापन्न होकर परमशिवभट्टारक ने
ही सर्वविद्याओं, शास्त्रों और दर्शनों का इस प्रकार प्रवर्त्तन किया। इसमें
उन्हें कोई प्रयास नहीं करना पड़ा वरन् लीलापूर्वक ही यह प्रणयन
सम्पन्न हुआ।

दीक्षाविधिः ३
अभी 'प्रणीय' रूप पूर्वकालिक क्रिया पूरी हुई और अग्रिम सक्रियता होने
ही वाली थी कि, एक लोकोत्तर अनुयोगात्मक स्पन्दन घटित हो गया।
स्वात्माभिन्न भाव से ऐकात्म्य में उल्लसित भगवती संवित् शक्ति ने आगे
की सक्रियता पर प्रश्नचिह्न उपस्थित कर दिया। उस अलौकिक अव्यक्त अनुयोग
का आन्तर ऊहन भगवान् भट्टारक ने तुरत कर लिया और परिणामस्वरूप उनके
पाँचों मुखों से वाणी की तरङ्गिणी ही फूट-सी पड़ी। उन्होंने सद्योजात, वामदेव,
अघोर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से पूर्वाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, पश्चिमाम्नाय,
उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वाम्नाय नामक पाँच आम्नायों का प्रवर्त्तन भी किया। ये पाँचों
आम्नाय परमार्थसारभूत माने जाते हैं॥२॥
तत्रायं सिद्धान्तः॥३॥
तत्र पञ्चाम्नायेषु, अयं वक्ष्यमाणः सिद्धान्तो विचार्य वादजनित-
निर्णयजनितविषयोऽर्थः॥३॥
उक्त पाँचों आम्नायों के व्यापक वैचारिक परिवेश की असीमता में वस्तु
तथ्य का आकलन कर भगवान् परशुराम ने यह सिद्धान्त निर्धारित किया। वाद
आदिकों के वैचारिक ऊहापोह के उपरान्त निर्णयात्मक सत्य-अर्थ ही 'सिद्धान्त'
की संज्ञा से विभूषित होता है॥३॥
सिद्धान्तप्रवर्त्तकसूत्राणि-
षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्॥४॥
तदित्थं केवलनिजरूपेण अवस्थितस्य 'बहु स्यां प्रजायेय' इति
इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः शक्तयस्ताभिर्योगे क्रमेण अर्थशब्दसृष्टी अङ्कुरच्छायावद्
युगपद् भवतः। तादृशसिसृक्षारूपोपाधिविशिष्टः परमशिव एव केवलशिव-
पदवाच्यो भवति। स एव तत्त्वानां मध्य आदिमः।
सा पूर्वोदिता सिसृक्षा द्वितीयं तत्त्वं शक्तिरिति। जगतः अहन्तया
यद्दर्शनं तदहमितिवृत्तिमान् सदाशिवपदवाच्यस्तृतीयं तत्त्वम्।
इदं जगदिति केवल-भेदविषयिणी सा वृत्तिस्तद्वान् ईश्वरपदवाच्यस्तुरीयं
तत्त्वम्। जगदहमेवेत्याकारिका या सदाशिवसम्बन्धिनी वृत्तिः सा विद्यापद-
वाच्या पञ्चमं तत्त्वम्।

४ परशुरामकल्पसूत्रम्
इदं जगदित्याकारिका ईश्वरनिष्ठा भेदविषयिणी वृत्तिर्मायापदवाच्या षष्ठं
तत्त्वम्।
पूर्वोक्त-विद्यातिरोधान-शक्तिमती तद्विरोधिनी अविद्यापदवाच्या सप्तमं
तत्त्वम्।
जीवनिष्ठं सर्वकर्तृत्वं यत्किञ्चित्कर्तृत्वेन संकुचितं तदेव कलापदवाच्यम्
अष्टमं तत्त्वम्।
पूर्वोक्तरीत्या जीवनिष्ठा या नित्यतृप्तिः सैव केषुचिद्विषयेषु अतृप्त्यां
संकुचिता राग-पदवाच्या नवमं तत्त्वम्।
जीवनिष्ठा या नित्यता तस्या आच्छादने सति सैव नित्यता अस्ति,
जायते, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यतीति षड्भावयोगात्
संकुचिता कालपदवाच्या दशमं तत्त्वम्।
परशिव-जीवयोरभेदाद् यथा परशिवे सर्वस्वातन्त्र्यं तथा जीवेऽप्यस्ति।
तस्य सर्वस्वातन्त्र्यस्य पिधानं पूर्वोक्तविद्यया कृतम्। तदेव कारणान्तरापेक्षं
यत्कारणमपेक्षते तन्नियतिपदवाच्यम् एकादशं तत्त्वम्।
एतादृश-नियति-काल-राग-कलाविद्याश्रयो जीवः, सत्त्वरजस्तमोगुणानां
साम्यरूपा प्रकृतिः चित्तापरपर्याया यदा सत्त्वतमसी अभिभूय रजःप्रधानं
तन्मनःपदवाच्यं संकल्पहेतुः, रजस्तमसी अभिभूय सत्त्वप्रधानमन्तःकरणं
तद्बुद्धिपदवाच्यं निश्चयहेतुः, यदा रजःसत्त्वे अभिभूय तमःप्रधानमन्तःकरणं
तदहंकारपदवाच्यं विकल्पकरणं षोडशं तत्त्वम्। शब्दग्राहकमिन्द्रियं श्रोत्रम्,
स्पर्शग्राहकं त्वक्, रूपग्राहकं चक्षुः, रसग्राहकं रसनं, गन्धग्राहकं घ्राणम्
एकविंशं तत्त्वम्, व्यक्तवागुच्चारणानुकूलं वागिन्द्रियम्, ग्रहणत्यागानुकूल-
मिन्द्रियं पायुः, मैथुनजनकमिन्द्रियमुपस्थः (क्रमेण) षड्विंशं तत्त्वम्,
सूक्ष्माकाशरूपशब्दः सप्तविंशं, सूक्ष्मवायुरूपः स्पर्शः अष्टाविंशं,
सूक्ष्मतेजोरूपं रूपम् एकोनत्रिंशं, सूक्ष्मजलरूपो रसः त्रिंशं, सूक्ष्मपृथिवीरूपो
गन्ध एकत्रिशम्, अवकाशात्मक आकाशः स्थूलः द्वात्रिंशं, सदागतिमत्त्वात्मक-
गुणवान् वायुः त्रयस्त्रिंशम्, उष्णवत् तेजः चतुस्त्रिशं, द्रवत्ववज्जलं पञ्चत्रिंशं,
काठिन्यगुणवती पृथ्वी षट्त्रिंशं चरमं तत्त्वम्। एतादृशतत्त्वसंघातो विश्वं
जगदिति व्यवहारविषयाभिन्नम्॥४॥

दीक्षाविधिः ५
सिद्धान्तप्रवर्त्तक सूत्रों में यह सर्वप्रथम और तत्त्वदृष्टि से महत्त्वपूर्ण सूत्र है।
पाँचों आम्नाय इसे सिद्धान्त रूप से स्वीकार करते हैं कि, यह जगत् ३६
तत्त्वात्मक है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। सर्वप्रथम केवल निजरूप में
ही परमशिव अवस्थित थे। उनमें "मैं एकाकी बहुरूपों अर्थात् अनन्तरूपों में व्यक्त
हो जाऊँ" इस प्रकार की इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक शक्तियाँ उल्लसित हो गयीं।
इन शक्तियों के योग से क्रमशः अर्थ और शब्द की सृष्टि, अङ्कुर और प्रतिबिम्ब
की तरह एक साथ उत्पन्न हो गयी। इस प्रकार की सिसृक्षा से सिसृक्षु उपाधिविशिष्ट
परमशिव ही केवल 'शिव' पदवी से विभूषित हो गया। उसका अभिधेय शिव
हो गया। शिव ३६ तत्त्वों में प्रथम आदिम तत्त्व माना जाता है।
सिसृक्षा की वह शक्ति जो परमशिव में आद्यस्पन्द रूप से उल्लसित हुई,
वही शक्ति नामक द्वितीय तत्त्व है।
समग्र विश्व को अहमात्मक अङ्गीकृत कर 'सर्वं विश्वम् अहम्' इस वृत्ति
से विद्योतित 'सदाशिव' नामक तृतीय तत्त्व है।
यह विश्व है। यह भेदविषयक वृत्ति है। इस वृत्तिवाला तत्त्व ईश्वरतत्त्व
है। यह चतुर्थ तत्त्व है।
विश्वात्मक यह विस्तार मैं ही हूँ, इस प्रकार की सदाशिव सम्बन्धिनी
वृत्ति ही 'विद्या' है। यह पाँचवाँ तत्त्व है।
यह जगत् पार्थक्य प्रथा से प्रथित है। इसमें व्यापक पृथक् वृत्तिमयी
भेदविषयिणी ईश्वरनिष्ठा वृत्ति पृथक् तत्त्व मानी जाती है। यह वृत्ति ही माया
है। यह छठवाँ तत्त्व है।
ऊपर कथित विद्या को तिरोहित करने वाली शक्ति और विद्या की
विरोधिनी शक्ति को अविद्या कहते हैं। यह सातवाँ तत्त्व है।
जीव-निष्ठ सारा कर्त्तृत्व किञ्चित्कर्त्तृत्व से नितान्त संकुचित है। यह
सङ्कोचमयी वृत्ति ही कला है। इसे आठवाँ तत्त्व कहते हैं।
जीवनिष्ठा नित्यतृप्ति ही किन्हीं विषयों में अतृप्ति के कारण किन्हीं विषयों
में संकुचित होकर 'राग' संज्ञा से विभूषित हो जाती है। यह नवाँ तत्त्व है।
जीवनिष्ठ नित्यता, आच्छादित होने पर अस्ति (है), जायते (उत्पन्न होती
है), वर्धते (बढ़ती है), विपरिणमते (अधेड़ होकर परिणत होती है), अपक्षीयते

६ परशुरामकल्पसूत्रम्
(क्षीण होती है) और विनश्यति (नष्ट हो जाती है) इस छः प्रकार की
अस्तित्वगत गतिशीलता से प्रभावित और संकुचित होती है। यही काल नामक
कञ्चुक है। यह दशवाँ तत्त्व है।
परशिव और जीव में अभेद है। जैसे परशिव में सर्वस्वातन्त्र्य है, वैसा
ही स्वातन्त्र्य जीव में भी है। इसका पिधान अविद्या करती है। यह कारणसापेक्ष
प्रक्रिया है। नियति ही वह कारण है। यह नियति ही ग्यारहवाँ तत्त्व है।
जीव इन नियति, काल, राग, कला और अविद्यारूप ५ कञ्चुकों का
आश्रय बन जाता है। यह बारहवाँ तत्त्व है।
सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। इसे एक-
दूसरे पर्याय चित्त शब्द से भी बोधित करते हैं। यह तेरहवाँ तत्त्व है। सत्त्व
और तमस् को अभिभूत कर वर्त्तमान रजःप्रधान संकल्प हेतु तत्त्व ही मन
कहलाता है। यह चौदहवाँ तत्त्व माना जाता है।
रजस् और तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित सत्त्वप्रधान अन्तःकरण निश्चय
का हेतु होता है। इसे बुद्धि तत्त्व कहते हैं। यह पन्द्रहवाँ तत्त्व है। रजस् और
तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित तमःप्रधान अहंकार तत्त्व विकल्पों का कारण
माना जाता है। यह सोलहवाँ तत्त्व है।
शब्दग्राहक इन्द्रिय श्रोत्र कहलाती है। यह सत्रहवाँ तत्त्व है।
स्पर्शग्राहक इन्द्रिय त्वक् अठारहवाँ तत्त्व है।
रूपग्राहक इन्द्रिय चक्षु उन्नीसवाँ तत्त्व हैं।
रसग्राहक इन्द्रिय रसना बीसवाँ तत्त्व है।
गन्धग्राहक इन्द्रिय नासिका इक्कीसवाँ तत्त्व है।
व्यक्तवागुच्चारक वागिन्द्रिय बाइसवाँ तत्त्व है।
ग्रहणत्यागानुकूल पाणि तेइसवाँ तत्त्व है।
गमनानुकूल पाद चौबीसवाँ तत्त्व है।
मलविसर्जनक पायु इन्द्रिय पचीसवाँ तत्त्व है।
मैथुनजनक उपस्थ इन्द्रिय छब्बीसवाँ तत्त्व है।

दीक्षाविधिः ७
सूक्ष्माकाशरूप शब्द सत्ताइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म वायुरूप स्पर्श अट्ठाइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म तेजरूप रूप उन्तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म जलरूप रस तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म पृथ्वीरूप गन्ध इकतीसवाँ तत्त्व है।
स्थूल अवकाशात्मक आकाश बत्तीसवाँ तत्त्व है।
सदागतिशीलता-गुणशाली वायु तैंतीसवाँ तत्त्व है।
उष्णतागुणशाली तेज चौंतीसवाँ तत्त्व है।
द्रवत्वगुणशाली तत्त्व जल पैंतीसवाँ तत्त्व है।
काठिन्यगुणवती पृथ्वी अन्तिम छत्तीसवाँ तत्त्व है।
इन छत्तीस तत्त्वों का संघात ही विश्व है। व्यवहार में इसे ही जगत् कहते
हैं। शास्त्रों में इसके अनन्त प्रमाण उपलब्ध हैं।।४।।
शरीरकञ्चुकितः शिवो जीवो निष्कञ्चुकः परशिवः।।५।।
एवं षट्त्रिंशत्तत्त्वानामपि सामान्यरूपेण पुनर्द्विस्वभावत्वम्-केषुचित् केवलं
दृश्यत्वम्, केषुचित् केवलं द्रष्टृत्वम्। आद्यं जडेषु। द्वितीयं केवलमिति।
ननु जीवस्य तत्त्वान्तःपातित्वात् परशिवस्यातथात्वाद् द्वयोर्भेद
आयातः। सर्वस्वतन्त्रः परशिवः स्वस्य मायया दुर्घटया स्वनिष्ठं यदन्यानपेक्ष-
त्त्वरूपं पूर्णं स्वातन्त्र्यं तदाच्छादयति। ततस्तिरोहितं यत् स्वातन्त्र्यं परिमितं
तदाणवमलमुच्यते। आणवमलमेव अविद्येत्यप्युच्यते।
एवमाणवेन मलेन छन्नः, तदा स्वयमणुदेहपरिमितः सन् अन्यान्
देहपरिमितान् अनन्तान् जीवान् स्वभिन्नत्वेन पश्यति। तन्मायिकं मलम्। एवं
भेदप्रथारूपमायिकमलेन मलिनाः शुभाशुभकर्म अनुतिष्ठन्तस्तज्जनित-
संस्कारवन्तो भवन्ति। तदेतत् कार्मं मलम्। एतादृशत्रिविधमलं शरीर-
पदेनोच्यते। तद्रूपं यत् कञ्चुकम् आच्छादनं तेन आवृतः शिव एव जीवः।
एतादृश-कञ्चुकरहितो यः स तत्त्वातीतः परशिव इत्यर्थः।।५।।

८ परशुरामकल्पसूत्रम्
छत्तीस तत्त्व भी सामान्यरूप से दृश्य और द्रष्टा रूप से दो भागों में
विभक्त हैं। जड़ों में दृश्यत्व और केवल तत्त्व में द्रष्टा का भाव। उसी तरह
निष्कञ्चुक परशिव और शरीर से कञ्चुकित जीव ये दो भाव होते हैं। जीव तत्त्व
भाव में परिगणित है। परशिव तत्त्ववाद से ऊपर है। यह दोनों में भेद है।
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र परशिव अघटितघटनापटीयसी अपनी ही माया शक्ति द्वारा अपने
परम निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य को स्वयम् आच्छादित करता है। परिणाम-स्वरूप
आच्छादित परस्वातन्त्र्य परिमित स्वातन्त्र्य में परिणत हो जाता है। यही पारिमित्य
आणव मल कहलाता है। आणव मल को ही अविद्या भी कहते हैं।
आणव मल से आच्छन्न शिव स्वयम् अणुशरीर से परिमित हो जाता
है। इस अवस्था में वह अन्य अनन्त परिमित शरीराच्छन्न जीवों को स्वात्म से
भिन्न रूप में देखने लगता है। यह उसकी माया-परिच्छिन्न अवस्था है। इसे
मायिक मल कहते हैं।
यही भेदप्रथा मानी जाती है। जीव भेद-प्रथा से प्रथित परिमित प्रमाता
बन जाता है। ये जीव अब मायामलिन होकर अनन्त अनन्त शुभकर्मों को
अनुष्ठित करते हुए कर्मों के संस्कारों से प्रभावित होते रहते हैं। विवशता की
एक ऐसी परम्परा चल पड़ती है, जिसमें जीवजगत् की सक्रियता ही अभिशाप
बन जाती है। इसे कार्म मल कहते हैं।
यही तीनों आणव, मायिक और कार्ममल ही शरीर बनकर शरीरी को
कञ्चुक की कमनीयता प्रदान करते हैं। इस तरह शिव ही जीव भाव में पड़ा
भेदवाद की विभीषिका का उपभोग कर रहा है। यही शरीर कञ्चुकित शिव जीव
है। निष्कञ्चुक अर्थात् ऐसे कञ्चुकों से रहित तत्त्वातीत शिव ही परमशिव है॥५॥
एवं जीवेश्वरयोः स्वरूपमुक्त्वा कः पुरुषार्थ इति निर्दिशति-
स्वविमर्शः पुरुषार्थः ॥६॥
स्वस्य परशिवरूपस्य विमर्शः प्रत्यभिज्ञानं सोऽहमित्याकारकम्। यथा
कण्ठस्थं चामीकरं विस्मृत्य तदन्वेषणाय देशाद्देशं धावन् केनचिद् उद्बुद्ध-
संस्कारः कण्ठस्थं पश्यति तथा विस्मृतस्वरूपज्ञानस्य पुनर्लाभः पुरुषार्थः
अकृत्रिम इत्यर्थः। एतादृशपुरुषार्थलाभश्च न भगवत्कृपामृते भविष्यति। तदुक्तं

दीक्षाविधिः ९
भगवता श्रीकृष्णेन—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' (श्री.भ.
७।१४)। भगवत्प्रीतिश्च भगवदाराधनेनैव भवति। अतो भगवदाराधनं
परम्परया मोक्षसाधनम्॥६॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर के स्वरूप कथन के अनन्तर पुरुषार्थ क्या
होता है, इसका निर्देश कर रहे हैं कि,
स्वात्म का विमर्श ही पुरुषार्थ है।
अपने परशिवरूप का विमर्श अत्यन्त आवश्यक है। इसे प्रत्यभिज्ञान
कहते हैं। माया के प्रतीप आत्माभिमुख्यपूर्वक विमर्श से सोऽहम् अर्थात् मैं
परशिव हूँ, इस तरह का दृढ़ ज्ञान उत्पन्न होता है। इसे ही प्रत्यभिज्ञान कहते
हैं। विस्मृत ज्ञान का पुनः उपलब्ध करना ही पुरुषार्थ है।
जैसे गले का स्वर्णाभूषण वस्त्र से ढक जाय। उसे इधर-उधर खोजा जाने
लगे। किसी प्रबुद्ध दर्शक द्वारा निर्देश देने पर गले में है, यह ज्ञान हो जाय,
तो प्रसन्नता होती है। उसी तरह स्वात्मज्ञान उपलब्ध हो जाने पर परमपुरुषार्थ
की सिद्धि हो जाती है। ऐसा पुरुषार्थ-लाभ भगवत्कृपा के विना नहीं हो सकता।
इसी तथ्य को श्रीमद्भगवद्गीता (७।१४) द्वारा भगवान् कृष्ण कहते हैं कि, 'जो
मेरी शरण में आ जाते हैं, मेरी प्रपत्ति प्राप्त कर लेते हैं। वे ही इस दुस्तर
माया को पार कर पाते हैं।'
यह सत्य है कि, भगवत्प्रीति भगवान् की आराधना से ही होती है।
इसीलिये यह माना जाता है कि, भगवान् की आराधना परम्परा से मोक्ष-साधन
सिद्ध होती है॥६॥
वर्णात्मका नित्या शब्दाः॥७॥
वर्णात्मका वर्णसमुदायरूपाः शब्दा मन्त्रा नित्याः। मूलविद्या समसत्ताका
इत्यर्थः॥७॥
शब्द वर्णात्मक होते हैं। वर्णात्मकता का तात्पर्य वर्णसमुदायरूपात्मकता
से है। वर्णसमुदाय रूप शब्द ही मन्त्र होते हैं। ये नित्य होते हैं। मूल अविद्या
की समान-सत्ता वाले ये मन्त्र यद्यपि नित्य हैं फिर भी अज्ञान की निवृत्ति हो
जाने पर स्वात्मातिरिक्त किसी अन्य देवता के अनस्तित्व के कारण ज्ञानी के

१० परशुरामकल्पसूत्रम्
लिये इसके त्रैकालिक नित्यत्व का कोई महत्त्व नहीं रहता। यह ध्यान देने की
बात है कि, मन्त्र देवतावत् सूक्ष्म शरीररूप होते हैं। देवता के सूक्ष्म शरीर भी
अविद्या पर्यन्त ही अनुभूत होते हैं। अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर इनकी स्वतः
निवृत्ति स्वाभाविक है॥७॥
मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।।८।।
मन्त्राणामिति षष्ठी सप्तम्यर्थे, मन्त्रेष्वित्यर्थः। न चिन्त्या अचिन्त्या
शक्तिर्यत्र, ते अचिन्त्यशक्तयो मन्त्राः, तेषां भावस्तत्ता। अस्तीति शेषः। शक्तौ
अचिन्त्यत्वं च तर्काविषयत्वम्। एतेन पूर्वोदितमाया अतर्क्या दुर्वारा, तथापि
तन्निवारणे समर्था ततोऽपि अधिकशक्तिता मन्त्रेषु लीलया
ज्ञानावरकाविद्यानिर्वर्तकत्वशक्तिरस्तीति प्रतिपादितम् ।।८।।
सूत्र में मन्त्रशब्द से बहुवचन षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वस्तुतः सप्तम्यर्थ
में है। अतः उसका अर्थ करते समय सप्तमीवाचक अर्थ करना चाहिये। मन्त्रों
में अचिन्त्यशक्तिता होती है। यही व्यावहारिक प्रचलित प्रयोग है। मन्त्रों में ऐसी
शक्ति होती है, जो अचिन्त्य होती है। इनकी शक्ति के सम्बन्ध में कोई तर्क
नहीं किया जा सकता, अर्थात् मन्त्रों की शक्ति तर्क से परे है। यहाँ यह ध्यान
देने की बात है कि, माया की शक्ति भी अतर्क्य होती है। अन्तर इतना ही
है कि, मन्त्र की अतर्क्य शक्ति, माया की ज्ञान को आवृत कर लेने वाली अविद्या
शक्ति का भी निवारण कर देती है। अतः मन्त्रों में रहने वाली शक्ति माया शक्ति
को भी अतिक्रान्त कर विद्यमान रहती है॥८॥
सम्प्रदायविश्वासाभ्यां सर्वसिद्धिः ।।९।।
सम्प्रदायः गुरुपरम्पराऽऽचारानुसरणम्। विश्वासो मन्त्रेषु
फलसाधनत्वविषयको निश्चयः। आभ्यां सहितेन मन्त्रेण सर्वसिद्धिर्भवतीति
शेषः। यद्यपि लोके एकेन दण्डेन एकव्यापारेण घट एव भवति, न पटः।
एवं तुरीवेमादिना पट एव न घट इति। एवं सर्वकारणेषु लोके
नियतैककार्यजनकत्वं दृष्टम्। तथापि मन्त्रेषु न तथा। एक एव मन्त्रो
यद्यदीप्सितं तत्सर्वं जनयति इति ज्ञापयितुं सर्वपदम्। एतेन श्रोतॄप्रवृत्तये
मन्त्रवर्त्तिगुणोऽपि प्रतिपादितो भवति ।।९।।

दीक्षाविधिः ११
मन्त्र-सिद्धि के सहकारी कारण होते हैं। मन्त्रों से अभीप्सित कार्य की
सिद्धि के उद्देश्य से उनका वर्णन कर रहे हैं।
सूत्र में तीन शब्द हैं—१. सम्प्रदाय, २. विश्वास, ३. सर्वसिद्धि। इन
तीनों शब्दों का औपासनिक दृष्टि से अप्रतिम महत्त्व है। क्रमशः इन शब्दों की
परिभाषा के साथ इनका विश्लेषण उचित है और प्रासङ्गिक
भी है—
१. सम्प्रदाय
गुरु परम्परा के अनुसार निर्धारित आचारों के समर्थक मान्य सिद्धान्त
अर्थात् आचार्य-प्रवर द्वारा प्रवर्त्तित परम्परा पद्धति। गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्त
आध्यात्मिक अनुभूतियों पर आधृत होते हैं। उनका अनुसरण स्वात्मोत्कर्ष का
साधक माना जाता है।
२. विश्वास
गुरु में, गुरु द्वारा प्रदत्त मन्त्रों में, शास्त्रों में और भगवत्सत्ता में सिद्धि
और साफल्य का निश्चय ही विश्वास माना जाता है।
३. सर्वसिद्धि
(गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्तों और आचारों के अनुसरण और दृढ आस्था
से) सभी प्रकार की और सारी सिद्धियाँ अवश्य होती हैं। प्रकरण मन्त्रों का
है। इसलिये यह कह सकते हैं कि, सम्प्रदायानुसार विश्वासपूर्वक मन्त्रों के प्रयोग
से सारी सिद्धियाँ सम्भव हैं।
इसे एक उदाहरण से समझें। लोक में देखा जाता है कि, कुम्भकार द्वारा
एक दण्ड से घूर्णि देने के एक व्यापार से घट का ही निर्माण होता है, पट
का निर्माण नहीं होता। इसी तरह अनन्त कारणों से अनन्त कार्य (नियत कारण
से नियत कार्य रूप से ही) सम्पन्न होते हैं। जैसे तुरी और वेमा के प्रयोग
से पट रूप कार्य ही होते हैं, घड़ा रूप कार्य नहीं होता।
मन्त्रों में ऐसी बात नहीं। लोकदृष्ट व्यवहारवाद के विपरीत एक मन्त्र की
सिद्धि से ही सारी अभिलषित इच्छायें सिद्ध हो जातीं हैं। अर्थात् एक कारण

१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
से विनियोगानुसार समस्त ईप्सित कार्य पूर्ण हो जाते हैं। यह मन्त्रों की महती
गुणवत्ता है। मन्त्र-माहात्म्य को जानकर सम्प्रदाय और विश्वास के अनुसार सारी
सिद्धियाँ हस्तामलकवत् सिद्ध हो जाती हैं।।९।।
जिज्ञासु पूछता है कि, गुरुवर्य! लोकविरुद्ध अर्थ प्रदान करने वाला यह
सूत्र-वाक्य कैसे प्रामाणिक माना जा सकता है? गुरुदेव इस आशङ्का का समाधान
सूत्र के माध्यम से ही कर रहे हैं—
विश्वासभूयिष्ठं प्रामाण्यम्।।१०।।
प्रामाण्यं संवाद-प्रवृत्तिजनक-तद्धतितत्प्रकारकज्ञानजनकत्वम्। सर्वसिद्धि-
रिति वाक्यनिष्ठं विश्वासभूयिष्ठम्। अत्र विश्वासपदार्थश्च वाक्यप्रयोक्तरि आप्त-
त्वनिश्चयः। बहुशब्दाद् अतिशयार्थे इष्ठन्प्रत्ययः। तत्र पाणिनिसूत्रम्
“अतिशायने तमबिष्ठनौ” अतिशय-विशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थे एतौ स्तः।
“बहोर्लोपो भू च बहोः” इति इडागमे च भूयिष्ठशब्देन अत्यन्तबहुत्वविशिष्टः
पुरुषार्थः। पुरुषे विश्वासभूयिष्ठत्वं च स्वोत्तरोत्पन्नत्वस्वविषयविषयकत्वसम्बन्धेन
च विश्वासविशिष्टशङ्काऽनधिकरणत्वं, तदाश्रयपुरुषेण सममभेदान्वयस्य
बाधितत्वात्। भूयिष्ठपदस्य भूयिष्ठाश्रयज्ञानविषये लक्षणा। तस्य प्रामाण्ये
अभेदान्वयः अत्यन्तविश्वासवत्पुरुषैकवेद्यम् एतच्छास्त्रप्रामाण्यमित्यर्थः।
कुतर्कशालिनां शास्त्रप्रामाण्यं सर्वथा अगम्यमिति भावः। तदुक्तं भट्टपादैः—
“शास्त्रैकगम्या ये ह्यर्था न ताँस्तर्केण दूषयेत्” ।।१०।।
प्रमाण के भाव को प्रामाण्य कहते हैं। प्रामाण्य में ज्ञानजनकता होती है।
किसी वस्तुविषयक संवाद का प्रवर्तन व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कोई वस्तु जिन विशेषणों से विशिष्ट है, उससे उसी प्रकार का ज्ञान होता है।
प्रामाण्य का ज्ञानजनकत्व स्वतःप्रामाण्यवाद के समर्थक कुमारिलभट्ट के अनुसार
सिद्ध माना जाता है। जैसे घड़ा मेरे द्वारा ज्ञात है। इस प्रयोग में ज्ञान की प्रमा
वाला मैं हूँ क्योंकि तथाविधज्ञातंता से मैं युक्त हूँ। यही तद्वान् में तत्प्रकारक
ज्ञान कहलाता है।
सर्वसिद्धि विश्वास पर निर्भर करती है। यह सूत्र सं. ९ में स्पष्ट किया
जा चुका है। गुरुवाक्य में विश्वास-भूयिष्ठता सिद्धि की हेतु मानी जाती है। जहाँ

दीक्षाविधि: १३
तक विश्वास का प्रश्न है, यह वहीं होता है, जहाँ वाक्य प्रयोक्ता के प्रति यह
निश्चय होता है कि, यह प्रयोगकर्त्ता 'आप्त' पुरुष है।
अतिशायने अर्थ में 'तमप्' और इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। यह पाणिनि सूत्र
(५।३।५५) का अर्थ है। बहु को भू आदेश और इट् का आगम होने पर
भूयिष्ठ शब्द व्युत्पन्न होता है। बहुत्व विशिष्ट पुरुषार्थ की अपेक्षा इसमें निहित
है। पुरुष में विश्वास की भूयिष्ठता उत्तरोत्तर उत्पन्न विश्वास के उत्कर्ष की सूचना
देती है। विश्वास विशिष्ट भूयिष्ठता इसका अर्थ नहीं करना चाहिये। यहाँ भूयिष्ठता
का आश्रय ज्ञान है। अतः अत्यन्त विश्वास सम्पन्न पुरुष द्वारा वेद्य ही इस शास्त्र
का प्रामाण्य है, यह इस सूत्र का निष्कर्षार्थ होता है। कुतर्कशाली पुरुष को
शास्त्र प्रामाण्य अगम्य ही रहता है। इसी तथ्य का समर्थन कुमारिल भट्ट की
इस उक्ति से होता है—
“जो अर्थ एकमात्र शास्त्र के द्वारा ही गम्य हैं, उन्हें तर्कों द्वारा दूषित
नहीं करना चाहिये।”
भूयिष्ठ ज्ञान का प्रामाण्य से अभेदान्वय सम्बन्ध ही यहाँ अपेक्षित
है॥१०॥
सहकार्यान्तरमाह
गुरुमन्त्रदेवताऽऽत्मनःपवनानाम् ऐक्यनिष्फालनादन्तरात्म-
वित्तिः ।।११।।
गुर्वादयः स्पष्टाः। पवनाः पञ्चप्राणाः। एतेषामैक्यनिष्फालनं भावनया
एकत्वसम्पादनम्, तेन अन्तरात्मनः प्रत्यगात्मनो वित्तिर्वेदनं भवतीति शेषः।
जपरूपोपास्तिफलम्
सम्प्रदायविश्वास-सहित-मन्त्रकरणकोपास्तेः फलमाह— ऐक्यनिष्फालन-
मैक्युनिर्णयः, तद्द्वारा प्रत्यगात्मज्ञानं भवतीति विशिष्टार्थः।
उमानन्दनाथास्तु
गुरुमन्त्रेत्यस्य आरम्भोल्लासे गुरुमन्त्रदेवतात्मनामैक्यभावनम् एकं
साधनं, मनःपवनयोरेकयत्ननिरोद्धव्यत्वज्ञानं चापरं, द्वाभ्यां कार्यसिद्धिरिति
व्याचक्रुः ।।११।।

१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
इस सूत्र में गुरु, मन्त्र, देवता, आत्मा और मन इन अत्यन्त सहकारी
कारणों के साथ पवन रूपी पाँच प्राणों की गणना की गयी है। ये सभी मन्त्र
की सिद्धि के सहकारी कारण हैं। मन्त्र भी मन्त्रसिद्धि का सहकारी कारण होता
है। इसके साथ ही गुरु आदि तत्त्वों के ऐक्यनिष्फालन अर्थात् भावनात्मक
ऐक्य सम्पादन से अन्तरात्मा की वित्ति होती है। इस सूत्र में प्रयुक्त निष्फालन
शब्द का अर्थ सम्पादन किया गया है। वस्तुतः निष्फालन परिणामोत्पादन अर्थ
में प्रयुक्त होना चाहिये। यह सम्पादन की चरितार्थता में ही समाहित है। ऐक्य
सम्पादन के परिणामस्वरूप प्रत्यगात्मा का वेदन होता है, यह वृत्तिकार का
पक्ष है।
एक दूसरा पक्ष यह कहता है कि, निष्फालन का अर्थ निर्णय होता है।
गुरु मन्त्र आदि कारणों के द्वारा की गयी उपासना के माध्यम से इनके ऐक्य
का निर्णय हो जाता है और इस निर्णय के उपरान्त ही प्रत्यगात्म संवेदन सिद्ध
होता है। इसका तीसरा पक्ष आचार्य उमानन्द नाथ द्वारा प्रतिपादित है। इनके
अनुसार गुरु, मन्त्र, देवता और आत्म का ऐक्य भावन एक अलग साधन है।
मन और पवन इन दोनों के एक साथ यत्नपूर्वक निरोध का ज्ञान दूसरा साधन
है। इन दोनों के ऐक्य निष्फालन से प्रत्यगात्मा का संवेदन होता है। आचार्य
रामेश्वर इस पक्ष को चिन्त्य मानते हैं।।१९।।
अर्चनरूप उपास्तिविधिः
एतावत्पर्यन्तं मन्त्रस्तुत्या तत्सहकारिकारणस्य कथनेन च मन्त्रकरणक-
क्रियातद्विधिरुन्नेयः। तथा च तादृशी जपरूपैव। एवं जपरूपास्तिं निरूप्य
पूजारूपामुपास्तिं विधत्ते—
आनन्दं ब्रह्मणो रूपम्। तच्च देहे व्यवस्थितम्। तस्याभि-
व्यञ्जकाः पञ्चमकाराः, तैरर्चनं गुप्त्या प्राकट्यान्निरयः।।१२।।
यथा चिद्रूपं ब्रह्म एवम् आनन्दरूपमपि। ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।’ इति
श्रुतेः। यथा चिद्रूपमावृतमज्ञानेन न जानाति एवमानन्दस्वरूपमपि दुःखैनावृतं
न जानाति। यदा कदाचिद् भारादिरूपदुःखापगमे ब्रह्मणः परिच्छिन्नं रूपं
शरीरावच्छेदेन सम्प्रत्यपि जानाति तादृशानन्दः परिच्छिन्नो देहे देहावच्छेदेन

दीक्षाविधिः १५
व्यवस्थितः। तस्य अभिव्यञ्जकास्तद्विषयकसाक्षात्कारजनकाः पञ्चमकाराः।
एतदन्तेन विधीयमान-द्रव्यस्तुतिः अनुष्ठातृ-प्रवृत्तये यत ईदृशाः श्रेष्ठा
मकाराः। अतस्तैरर्चनं गुप्त्या अप्राकट्येन, कुर्वीतेति शेषः। गुप्तिद्रव्योभय-
विशिष्टार्चनरूपं कर्म अनेन विधीयते॥१२॥
ब्रह्म की परिभाषा करते हुए मनीषियों ने कहा है कि, ब्रह्म चिद्रूप है।
इसी सन्दर्भ में भगवान् परशुराम कहते हैं कि, आनन्द भी ब्रह्म का रूप है।
भगवती श्रुति कहती है—"विज्ञान और आनन्द दोनों ब्रह्म हैं।"
जैसे अज्ञान से आवृत होने के कारण ब्रह्म के 'चिद्' रूप को सामान्य
अणु पुरुष नहीं जानता, उसी प्रकार दुःख से आवृत 'आनन्द' स्वरूपता का
ज्ञान भी उसे नहीं होता। मनुष्य कभी भार ढोने का काम करता है। अत्यधिक
भार दुःखदायी होता है। भार उतार देने पर सुख की साँस लेता है। वह सुख
क्या है? वह ब्रह्म का ही परिच्छिन्न रूप है। शरीर के माध्यम से वह अनुभूत
होता है।
उसी प्रकार आनन्द भी परिच्छिन्न है। देह में देह के माध्यम से व्यवस्थित
है। इस आनन्द का अभिव्यञ्जन कैसे होता है? यह सोचने पर ज्ञात होता है
कि, इसके साक्षात्कार के कारण रूप पाँच मकार हैं। एक नयी बात यह भी
मालूम होती है कि, देहरूप द्रव्य और पञ्चमकाररूप द्रव्यों से चिदानन्द का
साक्षात्कार हो सकता है। अनुष्ठाता इन दो माध्यमों से आनन्दोपलब्धि के लिए
पूजा में प्रवृत्त होता है।
एक नयी जिज्ञासा यहाँ उत्पन्न होती है। पञ्चमकारों से अर्चन कैसे किया
जाय। प्रकट रूप से या गोपन भाव अपना कर? सूत्रकार कहते हैं कि, 'गुप्ति'
के द्वारा अर्थात् प्रकट न करते हुए गोपन भाव से पूजा में प्रवृत्त होना चाहिये।
प्राकट्य से 'निरय' की प्राप्ति होती है। इस सूत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि,
गुप्ति का परमेश्वर साक्षात्कार में अप्रतिम महत्त्व है। दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान
पञ्चमकारों का है। इन दोनों से विशिष्ट अर्चनरूप कर्म के विधायक इस सूत्र
द्वारा उपासना का द्वार अनावृत हो जाता है॥१२॥
एवमुपासनामुक्त्वा उपासकधर्मान् आह
भावनादार्ढ्यादाज्ञासिद्धिः ॥१३॥

१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
उपासकधर्मः भावनादार्ढ्यम्। 'अहमिदं जानामि' इत्येतादृशवृत्तिषु इदं
पदार्थपेक्षया अहंतया भासमानं श्रेष्ठमिति विवेचनम्-सर्ववृत्तिषु इदमेव भावना-
पदार्थः। तस्य दार्ढ्यम् अशैथिलता। अनेन आज्ञासिद्धिः, निग्रहानुग्रहसामर्थ्यं
भवतीति शेषः। भावनादार्ढ्यस्तुत्या सर्वदा ईदृशभावनाविधिरुन्नेयः॥१३॥
उपासक का सबसे बड़ा धर्म है, भावना की दृढ़ता। भावना क्या है,
इसे समझाते हुए वृत्तिकार कहते हैं कि, जब कोई 'मैं यह जानता हूँ' इस वाक्य
का प्रयोग करता है, तो इस प्रयोग में 'यह' कर्म पदार्थ प्रधान नहीं होता वरन्
ज्ञानवान् 'मैं' की ही प्रधानता होती है। सारे व्यवहार जगत् में गौणत्व और
प्रधानत्व का बोध ही भावना है। भावना एक प्रकार से वास्तविक विवेचना ही
होती है। शैथिल्य के लिये इसमें स्थान नहीं होता। इससे निग्रह और अनुग्रह
की शक्तिरूपी आज्ञा की सिद्धि होती है। भावना की दृढ़ता सर्वत्र अपनानी
चाहिये॥१३॥
उपासकस्य नियमान्तरमाह
सर्वदर्शनानिन्दा ॥१४॥
इतरदेवतोपासनाविधायकानि यानि दर्शनानि शास्त्राणि तेषां निन्दा न
कर्त्तव्येत्यर्थः। तन्निन्दने तदधिकारिणां संशयोत्पत्त्या स्वावलम्बितदर्शनेष्व-
नाश्वासः। अस्मिन् शास्त्रे अनधिकाराद् उभयभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्येत्।
इममेवार्थं श्रीकृष्णोऽप्याह—
'न बुद्धि-भेदं जनयेदज्ञानां कर्म-सङ्गिनाम्' ।
'लोकान्न निन्द्यात्' इति श्रुतिरपि ॥१४॥
संसार में जितने दर्शन हैं, किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिये। बहुत
से ऐसे दर्शन हैं और शास्त्र हैं, जो अन्यान्य देवोपासना का विधान करते हैं।
यद्यपि वे स्वात्मस्वीकृत मान्यता के विपरीत होते हैं, फिर भी उनकी निन्दा
कदापि नहीं करनी चाहिये। निन्दा से उसके अनुयायियों के विश्वास में भेद उत्पन्न
होने की सम्भावना होती है। आस्था-शैथिल्य बड़ा भारी दोष है। इससे जैसे
बिखरे बादल नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह स्व और पर दोनों में विश्वास की
कमी से उपासक उभयतः भ्रष्ट हो जाता है।

दीक्षाविधिः १७
श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं— “कर्म में आसक्त अज्ञ पुरुषों में बुद्धि-
भेद नहीं उत्पन्न करना चाहिये।”
भगवती श्रुति भी यही निर्देश देती है कि, लोक अर्थात् लोगों या लोक-
प्रचलित मान्यताओं की निन्दा नहीं करनी चाहिये।।१४।।
तृतीयं धर्ममाह
अगणनं कस्यापि ।।१५।।
स्वशास्त्रविरुद्धं यदि गीर्वाणगुरुर्वदेत्तर्हि स गुरुरिति गणनं न कर्तव्यम्।
अत एव श्रुतिरपि—“न गणयेत् कमपि” इति।।१५।।
स्वात्म स्वीकृत दर्शन, उपासना अथ च शास्त्र के प्रति आस्था की दृढता
को यह सूत्र कट्टरता तक ले जाने का आदेश दे रहा है। यह कहता है कि,
हमारे दर्शन, हमारी उपासना पद्धति, हमारे सम्प्रदाय और शास्त्र के सामने सारी
मान्यतायें नगण्य हैं। हमारे शास्त्र के विरुद्ध यदि देवगुरु बृहस्पति भी कुछ
कहते हैं, तो हम उसे मानने के लिये तैयार नहीं। स्वात्मोपासना पद्धति के
विरुद्ध प्रतिवाद करने वाला कथमपि गुरु नहीं कहा जा सकता। यह हमारा दृढ
सिद्धान्त है।।१५।।
चतुर्थमाह
सच्छिष्ये रहस्यकथनम् ।।१६।।
कर्तव्यमिति शेषः। परिसंख्याविधिरियम्। ‘आत्मरहस्यं न वदेत्’ इति
निषेधस्यापवादोऽयम्। न तु गुप्त्याऽर्चनं इत्यस्यापवादः। तथा सति
शिष्यातिरिक्तेषु (सामयिकेषु) (पूजाप्राकट्यानापत्तेः। अतः इदम्)।
आत्मरहस्यं स्वसिद्धान्तरूपं सामयिकेषु शिष्यभिन्नेषु न कथयेत्। सच्छिष्ये
कथयेदित्यर्थः ।।१६।।
योग्य शिष्य यदि सम्प्रदाय निकष पर खरा उतर रहा हो, तो उसे
सम्प्रदाय-सिद्ध रहस्य का बोध कराने के उद्देश्य से गोपनीय बातों का भी उसको
बताना आवश्यक माना जाता है। सूत्र का यह विधान परिसंख्या विधि के
अनुसार किया गया है। परिसंख्या विधि मीमांसा दर्शन स्वीकृत विधि है। जब

१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
आत्यन्तिक अप्राप्ति हो, उस समरा कोई नियम बना दिया जाय, उसे विधि
कहते हैं। रहस्य कथन का निषेध है। इस स्थिति में नियम बनाया गया कि,
सच्छिष्य में कथन होना चाहिये। यह विधि है। परिसंख्या पक्ष में होती है। जैसे
मन्त्र गोपन का निषेध है अथवा 'अपना रहस्य नहीं बताना चाहिये, इस निषेध
का अपवाद उक्त नियम है। अर्चन में भी गोपन प्राप्त है। रहस्य कथन में भी
गोपन प्राप्त है। मन्त्र प्रदान में भी गोपन प्राप्त है किन्तु सच्छिष्य में यह विधि
बन गया है। इसलिये यह परिसंख्या विधि है। साहित्य में परिसंख्यालङ्कार भी
इससे मिलता-जुलता है। इसलिये स्वात्मस्वीकृत रहस्य को जिसे व्यक्ति अपना
सम्प्रदायनिष्ठ सिद्धान्त मानता है, उसे समय पालन में संलग्न सामयिक शिष्यों
को प्रदान करने में कोई विप्रतिपत्ति नहीं होनी चाहिये किन्तु शिष्य के अतिरिक्त
अन्य के प्रति कभी भी किसी अवस्था में भी इसे प्रदान नहीं करना चाहिये,
यह शास्त्रकार का मन्तव्य है॥१६॥
पञ्चमधर्ममाह
सदा विद्यानुसंहतिः ।।१७।।
सदा सर्वकालं पूजादिविहितनित्य-कर्मानुष्ठान-कालव्यतिरिक्ते सर्वदेत्यर्थः।
विद्यायाः स्वोपास्य-देवतावाचक-मन्त्रस्य अनुसंहतिस्तत्प्रतिपादितार्थस्य
अनुसन्धानं, कर्तव्यमिति शेषः।
यद्वा अनुसंहतिर्मनसा जपः कार्य इत्यर्थः। न च आसनादि-
नियमरहितस्य जपो युक्त इति शङ्कनीयम्, मानसे कस्यापि नियमस्याभावात्।
तदुक्तं परमानन्दतन्त्रे—
मानसेऽनन्तगुणितं नियमस्तत्र नैव तु।
गच्छन् शयान आसीनो मुक्तो वा यत्र कुत्रचित्।
अस्नातश्चापवित्रश्च न दोषस्तत्र विद्यते॥१७॥
यहाँ सदा शब्द शाश्वत और अजस्र अर्थ में प्रयुक्त नहीं है। समय के
उस काल खण्ड में जिसमें दैनन्दिन नित्य कर्मों का अनुष्ठान उपासक करता
है, उसकी गणना इस सदा के परिवेश में नहीं की जाती। उस काल को छोड़
कर जो समय बचता है, स्वप्न और सुषुप्ति से जो समय बचता है, उसमें
'सदा' अव्यय का प्रयोग किया गया है।

द्वितीय एवं तृतीय खण्ड: गणपति एवं श्यामला (मातङ्गी) क्रम

दीक्षाविधिः १९
जहाँ तक विद्या शब्दार्थ का प्रश्न है, यह अपने उपास्य इष्ट देवता के
वाचक मन्त्र के लिये ही प्रयुक्त है। इसी इष्टमन्त्र की जिसे गुरुमन्त्र भी कहते
हैं, उसकी अनुसंहति होनी चाहिये। 'अनुसंहति' शब्द अनुसन्धान अर्थ में प्रयुक्त
है। अनुसन्धान मन्त्रों में प्रतिष्ठित दिव्य रहस्यार्थों का ही किया जाता है।
अनुसंहति शब्द का एक अन्य अर्थ भी लगाया जा सकता है। वस्तुतत्व
का अनुसन्धान सदा मानसिक होता है। अतः सदा अनुसंहति शब्द मानस जप
की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत होता है, आसन आदि नियमों से रहित जप
नहीं हो सकता, इस प्रकार की आशङ्का मानस जप में नहीं करनी चाहिये।
परमानन्दतन्त्र में स्पष्ट लिखा हुआ है कि,
“मानस जप का अनन्तगुना फल होता है। इसमें किसी प्रकार के नियम
की कोई आवश्यकता नहीं होती। यह चलते-फिरते सोते-जागते, उठते-बैठते,
खाते-पीते किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। इसमें स्नान भी आवश्यक
नहीं होता। कभी अपवित्रता का अवसर भले आ जाय, उसमें भी इसे करना
चाहिये।”
इस सूत्र में प्रयुक्त सदा, विद्या और अनुसंहति शब्द अपने वैशिष्ट्य का
पूरा ख्यापन कर रहे हैं।।१७।।
षष्ठं धर्ममाह
सततं शिवतासमावेशः ।।१८।।
'सततम्' अस्याप्यर्थः पूर्वसूत्रस्थ-सदा-शब्दवत्। शिवतायाः समावेशः
आविर्भावः कर्त्तव्य इति शेषः। नित्यकर्मानुष्ठानव्यतिरिक्तकाले शिवोऽहमस्मीति
भावयेद् इति तात्पर्यम्।
वस्तुतस्तु पूर्वधर्मेण सहायं विकल्प्यते। अन्यथा उभयोर्भावनयो-
र्युगपत्सम्पादनासम्भवात्। पूजादि-व्यतिरिक्तकाले अन्यतरस्यानुष्ठानमिति भावः।
यद्वा— पूर्वधर्मो मन्दाधिकारिणः। अयं मुख्याधिकारिणः।।१८।।
पूर्वसूत्र 'सदा विद्यानुसंहतिः' में सदा शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त कर
रहा है, उसी अर्थ में इस सूत्र में प्रयुक्त 'सतत' शब्द का भी व्यवहार किया
गया है। शिवतासमावेश में षष्ठी तत्पुरुष है। शिव का धर्मानुगुण्य ही शिवत्व