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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 320 में से

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दीक्षाविधिः ३
अभी 'प्रणीय' रूप पूर्वकालिक क्रिया पूरी हुई और अग्रिम सक्रियता होने
ही वाली थी कि, एक लोकोत्तर अनुयोगात्मक स्पन्दन घटित हो गया।
स्वात्माभिन्न भाव से ऐकात्म्य में उल्लसित भगवती संवित् शक्ति ने आगे
की सक्रियता पर प्रश्नचिह्न उपस्थित कर दिया। उस अलौकिक अव्यक्त अनुयोग
का आन्तर ऊहन भगवान् भट्टारक ने तुरत कर लिया और परिणामस्वरूप उनके
पाँचों मुखों से वाणी की तरङ्गिणी ही फूट-सी पड़ी। उन्होंने सद्योजात, वामदेव,
अघोर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से पूर्वाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, पश्चिमाम्नाय,
उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वाम्नाय नामक पाँच आम्नायों का प्रवर्त्तन भी किया। ये पाँचों
आम्नाय परमार्थसारभूत माने जाते हैं॥२॥
तत्रायं सिद्धान्तः॥३॥
तत्र पञ्चाम्नायेषु, अयं वक्ष्यमाणः सिद्धान्तो विचार्य वादजनित-
निर्णयजनितविषयोऽर्थः॥३॥
उक्त पाँचों आम्नायों के व्यापक वैचारिक परिवेश की असीमता में वस्तु
तथ्य का आकलन कर भगवान् परशुराम ने यह सिद्धान्त निर्धारित किया। वाद
आदिकों के वैचारिक ऊहापोह के उपरान्त निर्णयात्मक सत्य-अर्थ ही 'सिद्धान्त'
की संज्ञा से विभूषित होता है॥३॥
सिद्धान्तप्रवर्त्तकसूत्राणि-
षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्॥४॥
तदित्थं केवलनिजरूपेण अवस्थितस्य 'बहु स्यां प्रजायेय' इति
इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः शक्तयस्ताभिर्योगे क्रमेण अर्थशब्दसृष्टी अङ्कुरच्छायावद्
युगपद् भवतः। तादृशसिसृक्षारूपोपाधिविशिष्टः परमशिव एव केवलशिव-
पदवाच्यो भवति। स एव तत्त्वानां मध्य आदिमः।
सा पूर्वोदिता सिसृक्षा द्वितीयं तत्त्वं शक्तिरिति। जगतः अहन्तया
यद्दर्शनं तदहमितिवृत्तिमान् सदाशिवपदवाच्यस्तृतीयं तत्त्वम्।
इदं जगदिति केवल-भेदविषयिणी सा वृत्तिस्तद्वान् ईश्वरपदवाच्यस्तुरीयं
तत्त्वम्। जगदहमेवेत्याकारिका या सदाशिवसम्बन्धिनी वृत्तिः सा विद्यापद-
वाच्या पञ्चमं तत्त्वम्।