परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ परशुरामकल्पसूत्रम्
भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः पञ्चाम्नायान् परमार्थ-
सारभूतान् प्रणिनाय ।। २ ।।
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इति स्मृतः ।।
इत्येतादृशषड्गुणैश्वर्यसम्पन्नो भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः
(श्रुतयः चत्वारि, तदङ्गानि शिक्षा, व्याकरणं, कल्पः, छन्दः, ज्योतिषं,
निरुक्तं चेति षट्, मीमांसा, न्यायः, पुराणं, धर्मशास्त्रम् इति चतुर्दशविद्याः,
आयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्वं, नीतिशास्त्रम् इति चतस्रः, एवमष्टादशविद्याः),
सर्वाणि दर्शनानि, शाक्तदर्शनादीनि, दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्, ज्ञानसाधनम्,
शैवदर्शनम्, वैष्णवदर्शनम्, ब्राह्मदर्शनम्, सौरदर्शनम्, बौद्धदर्शनं चेति षट्
दर्शनानि, लीलयाऽनायासेन तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय निर्माय, संविन्मय्या
भगवत्या भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः सद्योजात-वामदेव-अघोर-
तत्पुरुष-ईशान-संज्ञकैः मुखैः पञ्चाम्नायान् पूर्व-दक्षिण-पश्चिमोत्तराम्नायान्।
परमार्थः अकृत्रिमः तुरीयः पुरुषार्थः तस्मिन् सारभूतान् प्रणिनाय निर्ममे ।। २ ।।
समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन सर्वोत्कृष्ट गुणों
से सम्पन्न भगवान् परमशिव भट्टारक ने अनायास समस्त विद्याओं के अधिष्ठाता
होने के कारण तत्तदावस्थापन्न स्थिति में अष्टादश विद्याओं की रचना की।
साङ्ग चारों वेद, शिक्षा-व्याकरण-कल्प-छन्द-ज्योतिष-निरुक्त, पुराण-धर्मशास्त्र
और मीमांसा, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व और नीतिशास्त्र कुल मिलाकर ये
अष्टादश विद्यायें होती हैं। ये सभी भगवद्रचित विद्यायें हैं।
इनके अतिरिक्त छः दर्शन भी भगवत्प्रवर्त्तित हैं। जिनके द्वारा वास्तविक
दर्शन होता है, उन्हें दर्शन कहते हैं। ये छः माने जाते हैं— १. शैवदर्शन,
२. वैष्णवदर्शन, ३. ब्राह्मदर्शन, ४. सौरदर्शन, ५. शाक्तदर्शन और
६. बौद्धदर्शन। पाणिनि, व्यास आदि अवस्थापन्न होकर परमशिवभट्टारक ने
ही सर्वविद्याओं, शास्त्रों और दर्शनों का इस प्रकार प्रवर्त्तन किया। इसमें
उन्हें कोई प्रयास नहीं करना पड़ा वरन् लीलापूर्वक ही यह प्रणयन
सम्पन्न हुआ।