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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

( २१ )
१५४ ३७ जप आदि, ब्राह्मण भोजन १६३-१६४
१५५ ३८ मन्त्रजप कर्त्ता के धर्म १६४
१५६ ३९ ललितोपासक धर्म १६४-१६५
सप्तमः खण्डः वाराही क्रमः १६६-१९७
१५७ १ श्रीललिता त्रिपुरसुन्दरी की दण्डनायिका
वाराही की उपासना-विधि का उपक्रम १६६
१५८ २ महासत्र की परिभाषा और उसमें अनाहत
ध्वनि का अवमर्श १६६-१६७
१५९ ३ गुरुनमस्कार और मूर्धा में अञ्जलि का विधान १६७-१६८
१६० ४ सभी मन्त्रों के साथ इस क्रम में 'ग्लौं'
बीजमन्त्र का प्रयोग १६८-१६९
१६१ ५-६ लिङ्ग-देह-शोधन, इसके छः मन्त्र, शाम्भव-
शरीरोत्पादन, भूतशुद्धि १६९-१७०
१६२ ७ मातृका-सम्पुटित बीजन्यास १७०-१७२
१६३ ८ अङ्गुलिन्यास १७१-१७२
१६४ ९ हृदयादिन्यास १७२-१७३
१६५ १० आत्मालङ्करण १७३
१६६ ११ अर्घ्यशोधन १७३-१७४
१६७ १२ अर्घ्यशोधनानन्तर करणीय न्यास १७४-१७७
१६८ १३ तत्त्वन्यास १७८
१६९ १४ देवीध्यान १७९
१७० १५ चक्रनिर्माण १७९-१८०
१७१ १६ चक्रकर्त्तव्य १८०-१८१
१७२ १७ चक्रमन्त्र १८१
१७३ १८ मण्डलादियजन, तत्त्वमन्त्र, गुणमन्त्र और आत्म-
मन्त्र— यहाँ तक सत्ताइस पीठ पूजन पूर्ण १८१-१८२

( २२ )
१७४ १९ चक्र के ऊपर देवी के आसन का विमर्श १८२
१७५ २० मूर्तिकरणी विद्या १८२-१८३
१७६ २१ आवाहनादि ९ मुद्राओं का प्रयोग १८३
१७७ २२ षडङ्ग-पञ्चाङ्ग न्यास १८४
१७८ २३ षोडशोपचार १८४
१७९ २४ देवी का ध्यान १८५
१८० २५ देवी का तर्पण १८५
१८१ २६ आवरण पूजा (प्रथम) १८५-१८६
१८२ २७ द्वितीय आवरण पूजा १८६
१८३ २८ तृतीय आवरण पूजा १८६-१८९
१८४ २९ तृतीयावरण पूजा पूर्ण १८९
१८५ ३० चतुर्थावरण पूजा १८९-१९०
१८६ ३१ पञ्चमावरण पूजा १९०-१९१
१८७ ३२ षष्ठावरण पूजा १९१-१९२
१८८ ३३ देवी का सन्तर्पण एवम् उपचरण १९२-१९३
१८९ ३४ बलिदान प्रकार १९३-१९४
१९० ३५ गुरु सन्तुष्टि का विधान १९४
१९१ ३६ शक्ति आदि की पूजा १९४-१९५
१९२ ३७ हवन मन्त्र साधन १९५-१९६
१९३ ३८ पूजा, शेष कृत्य १९६-१९७
अष्टमः खण्डः पराक्रमः १९८ · २१२
१९४ १ पराबीज और विद्या की एकरूपता के
अवमर्शपूर्वक पूजा का निर्देश १९८
१९५ २ उपासना हेतु १९८-१९९
१९६ ३ अनुत्तर पद्धति-कथन की प्रतिज्ञा १९९

( २३ )
१९७ ४ पराध्यान १९९-२००
१९८ ५ स्नानादि कर्म विधान २००
१९९ ६ आसन विधि २००-२०१
२०० ७ देशिक यजन २०१
२०१ ८ विघ्नोत्सारण २०१-२०२
२०२ ९ अङ्गन्यास २०२
२०३ १० चिदग्नि में सर्वतत्त्वविलापन २०२-२०३
२०४ ११ अर्घ्य के लिये मण्डलविधान २०३-२०४
२०५ १२ अर्घ्य २०४
२०६ १३ पराक्रम के मन्त्रों में योजनीय बीजमन्त्र २०४
२०७ १४ बीज-मन्त्रावयवों से न्यास २०४-२०५
२०८ १५ न्यासित देवी पूजन २०५
२०९ १६ सुधादेवी पूजन २०५
२१० १७ तत्त्वसमूह का हृदय में आनयन २०६
२११ १८ पराचक्र का उपक्रम और निर्माण २०६-२०७
२१२ १९ चक्र में देवी का आवाहन २०७
२१३ २० देवी का ध्यान २०७
२१४ २१ पूजाप्रकार २०८-२०९
२१५ २२ कृत्य शेष २०९
२१६ २३ अर्घ्य का मुख में निवेदन २०९
२१७ २४ चिदग्नि का उद्दीपन २०९
२१८ २५ ओघत्रयार्चन २१०
२१९ २६ दिव्यौघादि-कथन २१०-२११
२२० २७ बलिदान २११
२२१ २८ हवि-शेष-स्वीकरण २११-२१२

( २४ )
नवमः खण्डः होमविधिः २१३-२२८
२२२ १ स्वेष्ट मन्त्र होम विधान की प्रतिज्ञा २१३
२२३ २ स्वेष्ट मन्त्र होम विधान की विधि २१३-२१४
२२४ ३ सामान्य जल से प्रोक्षण २१४
२२५ ४ रेखाओं का निर्माण २१४
२२६ ५ उनमें देवार्चन २१४-२१५
२२७ ६ स्वदेह में षडङ्ग न्यास और उन्हीं मन्त्रों
से कुण्डपूजा २१५
२२८ ७ अग्निचक्र-निर्माण, पूजन २१५-२१६
२२९ ८ अग्निप्रतिष्ठा,- ध्यान २१६-२१७
२३० ९ संविदग्नि-पातन २१७-२१८
२३१ १० इन्धन का कवचमन्त्र और आच्छादन २१८
२३२ ११ उपस्थापन २१८
२३३ १२ मन्त्रप्रयोग २१९
२३४ १३ प्रज्वालन मन्त्र २१९
२३५ १४ अग्निसंस्कार २१९-२२०
२३६ १५ परिषेचन आदि २२०-२२१
२३७ १६ साधिताग्नि-ध्यान २२१
२३८ १७ अग्निचक्र और अष्टकोणों में देवस्थापन २२१-२२२
२३९ १८ सप्तजिह्वाहुतियाँ २२२
२४० १९ कर्मशेष २२२-२२३
२४१ २० इष्टदेवताऽऽवाहन २२३
२४२ २१ चक्रदेवियों की पूजा २२३
२४३ २२ प्रधान होम धर्म २२४
२४४ २३ काम्य होम विधि २२४
२४५ २४ साधन सहित होम २२४-२२६

( २५ )
२४५ २५ बलिदान २२६
२४६ २६ महाव्याहृति होम २२६-२२७
२४७ २७ ब्रह्मार्पणाहूति २२७
२४८ २८ विसर्जन (उद्वासन) २२७
२४९ २९ भस्मधारण आदि २२८
दशमः खण्डः सर्वसाधारणः क्रमः २२९-२७३
२५० १ सामान्य कर्माधिकार २२९-२३०
२५१ २ सन्ध्या से अर्घ्यशोधनपर्यन्त कार्यों में न्यास
को छोड़कर श्यामा की तरह कार्य विधि का
अतिदेश २३०
२५२ ३ सर्वसाधारण न्यास २३०
२५३ ४ चक्रनिर्माण २३०-२३१
२५४ ५ षडावरणी पूजा २३१
२५५ ६ सभी मन्त्रों में योजनीय बीज २३१
२५६ ७ आवाहनादि मन्त्र २३१-२३२
२५७ ८ रश्मिमाला २३२
२५८ ९ विनियोग २३२-२३३
२५९ १० रश्मिमाला के पुरुष मन्त्र २३३-२३४
२६० ११ चाक्षुषमती विद्या २३५
२६१ १२ कन्याविवाहदायिनी विद्या २३६
२६२ १३ सङ्कटहारिणी विद्या २३६
२६३ १४ जल-विपत्तिशमनी विद्या २३६-२३७
२६४ १५-१६ महाव्याधिविनाशिनी विद्या २३७
२६५ १७ प्रत्यूहशमनी महागणपतिविद्या २३७-२३८
२६६ १८ शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या २३८
२६७ १९ मृत्यु की भी मृत्यु (अपमृत्युनाशिनी विद्या) २३८-२३९

( २६ )
२६८ २० श्रुतधारिणी विद्या २३९
२६९ २१ सर्वज्ञताकरी विद्या २३९
२७० २२ पाँच रश्मियों का भावन २४०
२७१ २३ लोपामुद्रोपास्य शिवादि हादिविद्या स्वरूप-
प्रकाशनविद्या २४०
२७२ २४ षट्कूटा सम्पत्करी विद्या कालसङ्कर्षिणी २४०-२४१
२७३ २५ परमायुःप्रदायिनी विद्या २४१-२४२
२७४ २६ शुद्धज्ञानमयी शाम्भवी विद्या २४२-२४३
२७५ २७ पराविद्या २४३
२७६ २८ पञ्चमन्त्राधिष्ठान २४३
२७७ २९ बाला या कुमारी विद्या २४३-२४४
२७८ ३० अन्नपूर्णा विद्या २४४
२७९ ३१ अश्वारूढ़ा प्रत्यङ्गविद्या २४४
२८० ३२ श्रीपादुका विद्या २४५
२८१ ३३ मूलाधारविलोचनीया विद्या २४५-२४६
२८२ ३४ मूलविद्या २४६
२८३ ३५ लघुश्यामा २४६
२८४ ३६ वाग्वादिनी विद्या २४६-२४७
२८५ ३७ नकुली श्यामा विद्या २४७
२८६ ३८ श्यामा पादुकाविद्या २४७
२८७ ३९ हृदय में ध्यातव्य श्यामा २४८
२८८ ४० श्यामाविद्या (८९ वर्णमयी) २४८-२४९
२८९ ४१ लघुवार्त्ताली विद्या २४९
२९० ४२ स्वप्न वार्त्ताली २४९
२९१ ४३ तिरस्करिणी २४९-२५०
२९२ ४४ वार्त्ताली पादुका २५०

( २७ )
२९३ ४५ आज्ञा में भूदारमुखी २५०
२९४ ४६ वाराही विद्या २५०-२५१
२९५ ४७ श्रीपूर्त्ति विद्या (ब्रह्मरन्ध्र) २५१
२९६ ४८ महापादुका विद्या २५१-२५२
२९७ ४९ महासिद्धिप्रदायिनी (द्वादशान्त) २५२
२९८ ४९ अविद्यालयकर्त्री २५२
२९९ ५० रश्मिमालामन्त्र-प्रयोक्ता ही परमशिव २५२
३०० ५१ ललिता-जपविघ्ननिवारक मन्त्र २५३-२५४
३०१ ५२ श्यामाजपविघ्नहर मन्त्र २५४
३०२ ५३ वाराही-जपविघ्नहर मन्त्र २५४
३०३ ५४ उक्त मन्त्र जपारम्भ में ही जप्य २५४-२५५
३०४ ५५ ललिता, श्यामा, वार्त्ताली और परा विद्याओं
के जप समय २५५
३०५ ५६ मपञ्चक प्रातिनिध्य हेतु २५५-२५७
३०६ ५७ उपासक धर्म सर्वभूताविरोध २५७
३०७ ५८ परिपन्थियों का निग्रह २५७
३०८ ५९ संश्रितों पर अनुग्रह २५८
३०९ ६० गुरुपुत्र-कलत्र में गुरु भाव २५८
३१० ६१ दोषप्रद पदार्थ का त्याग २५८-२५९
३११ ६२ आदिम द्रव्य की ग्राह्यता का विमर्श २५९-२६०
३१२ ६३ पञ्चमकार-ग्राह्यता का विमर्श २६०
३१३ ६३ मकार के पाँचों द्रव्य २६१
३१४ ६४ कुलाचार धर्म-प्रवृत्ति २६१-२६२
३१५ ६५ दश कुलवृक्ष रक्षणीय २६२
३१६ ६६ विशिष्ट धर्मान्तर २६२-२६३
३१७ ६७ पञ्चपर्व की विशेष अर्चायें २६३

( २८ )
३१८ ६८ आयु स्तर के उल्लास के
विशिष्ट समयाचार २६३-२६४
३१९ ६९ अवशिष्ट उपासक धर्म २६४-२६५
३२० ७० आठ पाशों का अवसादन २६५
३२१ ७१ अन्य धर्म २६५-२६६
३२२ ७२ अभ्यर्हितों का आदर २६६
३२३ ७३ प्रकाश की विभावना २६६
३२४ ७४ स्वार्था, गुर्वर्था धारणा २६७
३२५ ७५ गुरु द्वारा उक्त ही कार्य २६७
३२६ ७६ अविचारणीय आदेश २६७
३२७ ७७ सत्य-पालन-दृढता २६८
३२८ ७८ परदार-धन में अनासक्ति २६८
३२९ ७९ आत्मश्लाघा आदि वर्जित सात व्यवहार २६८
३३० ८० सामयिक मुख्य धर्म २६८-२६९
३३१ ८१ शास्त्रान्तर में अनुशिष्ट धर्म भी ग्राह्य २६९
३३२ ८२ कुल-मार्गनिष्ठ की प्रशंसा २६९-२७०
३३३ ८३ दशखण्डी इस महोपनिषद् के अध्येता
की प्रशंसा २७०-२७१
३३४ ८४ पाँच अव्यय शब्दों से पाँच खण्ड
का आकलन २७१-२७२
३३५ ८५ ग्रन्थकार-स्तुति, वृत्तिकार-परिचय, ग्रन्थ-
रचनाकाल २७२-२७३

परशुरामकल्पसूत्रम्
दीक्षाविधिः
[ प्रथमः खण्डः ]
इह खलु श्रीभगवान् परशुरामस्तुरीयपुरुषार्थसाधनं
लघुमध्वानं दर्शयन् प्रतिजानीते—
अथातो दीक्षां व्याख्यास्यामः ।।१।।
अत्र अथशब्दः मङ्गलद्योतकः। अतःशब्दश्च आनन्तर्यद्योतकः। दीक्षा-
पदार्थं सूत्रकारोऽग्रे विवेचयिष्यति। व्याख्यापदार्थश्च निगूढाभिप्रायकशब्दस्य
विविच्य कथनम्। प्रकृते गूढार्थानां तन्त्राणामुपसंहारेण विविच्य कथनं कल्पसूत्रे
इति लक्षणसमन्वयः।।१।।
परशुरामकल्पसूत्र का यह प्रथम सूत्र है। इसमें चार शब्दों का प्रयोग किया
गया है— १. अथ, २. अतः, ३. दीक्षां और ४. व्याख्यास्यामः। अथ शब्द
मङ्गलवाचक है। प्रारम्भ में विषयप्रवर्त्तन 'अथ' शब्द से करने की भारतीय परम्परा
है। उसी का अनुसरण यहाँ किया गया है। अतः शब्द आनन्तर्य का बोधक
है। इसके पहले के कार्य की समाप्ति और उसके बाद नये कार्य के प्रारम्भ
की प्रवृत्ति का आकलन इससे होता है। दीक्षा आँख में अञ्जन की तरह
सर्वदोषनाशिका परमार्थपरिष्कारिका गुरुतः प्राप्त मन्त्रादि-वरद प्रक्रिया है। ग्रन्थ
में आगे चलकर इसका स्पष्टीकरण करेंगे। व्याख्या गूढ अभिप्राय से भरे शब्दों
का विवेकपूर्ण निर्वचन करती है। सूत्र में वर्तमान की उपेक्षा कर भविष्यत् प्रयोग
अभिप्रायगर्भ प्रयोग है।।१।।
भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः सर्वाणि
दर्शनानि लीलया तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय संविन्मय्या भगवत्या

२ परशुरामकल्पसूत्रम्
भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः पञ्चाम्नायान् परमार्थ-
सारभूतान् प्रणिनाय ।। २ ।।
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इति स्मृतः ।।
इत्येतादृशषड्गुणैश्वर्यसम्पन्नो भगवान् परमशिवभट्टारकः श्रुत्याद्यष्टादशविद्याः
(श्रुतयः चत्वारि, तदङ्गानि शिक्षा, व्याकरणं, कल्पः, छन्दः, ज्योतिषं,
निरुक्तं चेति षट्, मीमांसा, न्यायः, पुराणं, धर्मशास्त्रम् इति चतुर्दशविद्याः,
आयुर्वेदः, धनुर्वेदः, गान्धर्वं, नीतिशास्त्रम् इति चतस्रः, एवमष्टादशविद्याः),
सर्वाणि दर्शनानि, शाक्तदर्शनादीनि, दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्, ज्ञानसाधनम्,
शैवदर्शनम्, वैष्णवदर्शनम्, ब्राह्मदर्शनम्, सौरदर्शनम्, बौद्धदर्शनं चेति षट्
दर्शनानि, लीलयाऽनायासेन तत्तदावस्थापन्नः प्रणीय निर्माय, संविन्मय्या
भगवत्या भैरव्या स्वात्माभिन्नया पृष्टः पञ्चभिः मुखैः सद्योजात-वामदेव-अघोर-
तत्पुरुष-ईशान-संज्ञकैः मुखैः पञ्चाम्नायान् पूर्व-दक्षिण-पश्चिमोत्तराम्नायान्।
परमार्थः अकृत्रिमः तुरीयः पुरुषार्थः तस्मिन् सारभूतान् प्रणिनाय निर्ममे ।। २ ।।
समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन सर्वोत्कृष्ट गुणों
से सम्पन्न भगवान् परमशिव भट्टारक ने अनायास समस्त विद्याओं के अधिष्ठाता
होने के कारण तत्तदावस्थापन्न स्थिति में अष्टादश विद्याओं की रचना की।
साङ्ग चारों वेद, शिक्षा-व्याकरण-कल्प-छन्द-ज्योतिष-निरुक्त, पुराण-धर्मशास्त्र
और मीमांसा, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व और नीतिशास्त्र कुल मिलाकर ये
अष्टादश विद्यायें होती हैं। ये सभी भगवद्रचित विद्यायें हैं।
इनके अतिरिक्त छः दर्शन भी भगवत्प्रवर्त्तित हैं। जिनके द्वारा वास्तविक
दर्शन होता है, उन्हें दर्शन कहते हैं। ये छः माने जाते हैं— १. शैवदर्शन,
२. वैष्णवदर्शन, ३. ब्राह्मदर्शन, ४. सौरदर्शन, ५. शाक्तदर्शन और
६. बौद्धदर्शन। पाणिनि, व्यास आदि अवस्थापन्न होकर परमशिवभट्टारक ने
ही सर्वविद्याओं, शास्त्रों और दर्शनों का इस प्रकार प्रवर्त्तन किया। इसमें
उन्हें कोई प्रयास नहीं करना पड़ा वरन् लीलापूर्वक ही यह प्रणयन
सम्पन्न हुआ।

दीक्षाविधिः ३
अभी 'प्रणीय' रूप पूर्वकालिक क्रिया पूरी हुई और अग्रिम सक्रियता होने
ही वाली थी कि, एक लोकोत्तर अनुयोगात्मक स्पन्दन घटित हो गया।
स्वात्माभिन्न भाव से ऐकात्म्य में उल्लसित भगवती संवित् शक्ति ने आगे
की सक्रियता पर प्रश्नचिह्न उपस्थित कर दिया। उस अलौकिक अव्यक्त अनुयोग
का आन्तर ऊहन भगवान् भट्टारक ने तुरत कर लिया और परिणामस्वरूप उनके
पाँचों मुखों से वाणी की तरङ्गिणी ही फूट-सी पड़ी। उन्होंने सद्योजात, वामदेव,
अघोर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से पूर्वाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, पश्चिमाम्नाय,
उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वाम्नाय नामक पाँच आम्नायों का प्रवर्त्तन भी किया। ये पाँचों
आम्नाय परमार्थसारभूत माने जाते हैं॥२॥
तत्रायं सिद्धान्तः॥३॥
तत्र पञ्चाम्नायेषु, अयं वक्ष्यमाणः सिद्धान्तो विचार्य वादजनित-
निर्णयजनितविषयोऽर्थः॥३॥
उक्त पाँचों आम्नायों के व्यापक वैचारिक परिवेश की असीमता में वस्तु
तथ्य का आकलन कर भगवान् परशुराम ने यह सिद्धान्त निर्धारित किया। वाद
आदिकों के वैचारिक ऊहापोह के उपरान्त निर्णयात्मक सत्य-अर्थ ही 'सिद्धान्त'
की संज्ञा से विभूषित होता है॥३॥
सिद्धान्तप्रवर्त्तकसूत्राणि-
षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्॥४॥
तदित्थं केवलनिजरूपेण अवस्थितस्य 'बहु स्यां प्रजायेय' इति
इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः शक्तयस्ताभिर्योगे क्रमेण अर्थशब्दसृष्टी अङ्कुरच्छायावद्
युगपद् भवतः। तादृशसिसृक्षारूपोपाधिविशिष्टः परमशिव एव केवलशिव-
पदवाच्यो भवति। स एव तत्त्वानां मध्य आदिमः।
सा पूर्वोदिता सिसृक्षा द्वितीयं तत्त्वं शक्तिरिति। जगतः अहन्तया
यद्दर्शनं तदहमितिवृत्तिमान् सदाशिवपदवाच्यस्तृतीयं तत्त्वम्।
इदं जगदिति केवल-भेदविषयिणी सा वृत्तिस्तद्वान् ईश्वरपदवाच्यस्तुरीयं
तत्त्वम्। जगदहमेवेत्याकारिका या सदाशिवसम्बन्धिनी वृत्तिः सा विद्यापद-
वाच्या पञ्चमं तत्त्वम्।

४ परशुरामकल्पसूत्रम्
इदं जगदित्याकारिका ईश्वरनिष्ठा भेदविषयिणी वृत्तिर्मायापदवाच्या षष्ठं
तत्त्वम्।
पूर्वोक्त-विद्यातिरोधान-शक्तिमती तद्विरोधिनी अविद्यापदवाच्या सप्तमं
तत्त्वम्।
जीवनिष्ठं सर्वकर्तृत्वं यत्किञ्चित्कर्तृत्वेन संकुचितं तदेव कलापदवाच्यम्
अष्टमं तत्त्वम्।
पूर्वोक्तरीत्या जीवनिष्ठा या नित्यतृप्तिः सैव केषुचिद्विषयेषु अतृप्त्यां
संकुचिता राग-पदवाच्या नवमं तत्त्वम्।
जीवनिष्ठा या नित्यता तस्या आच्छादने सति सैव नित्यता अस्ति,
जायते, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यतीति षड्भावयोगात्
संकुचिता कालपदवाच्या दशमं तत्त्वम्।
परशिव-जीवयोरभेदाद् यथा परशिवे सर्वस्वातन्त्र्यं तथा जीवेऽप्यस्ति।
तस्य सर्वस्वातन्त्र्यस्य पिधानं पूर्वोक्तविद्यया कृतम्। तदेव कारणान्तरापेक्षं
यत्कारणमपेक्षते तन्नियतिपदवाच्यम् एकादशं तत्त्वम्।
एतादृश-नियति-काल-राग-कलाविद्याश्रयो जीवः, सत्त्वरजस्तमोगुणानां
साम्यरूपा प्रकृतिः चित्तापरपर्याया यदा सत्त्वतमसी अभिभूय रजःप्रधानं
तन्मनःपदवाच्यं संकल्पहेतुः, रजस्तमसी अभिभूय सत्त्वप्रधानमन्तःकरणं
तद्बुद्धिपदवाच्यं निश्चयहेतुः, यदा रजःसत्त्वे अभिभूय तमःप्रधानमन्तःकरणं
तदहंकारपदवाच्यं विकल्पकरणं षोडशं तत्त्वम्। शब्दग्राहकमिन्द्रियं श्रोत्रम्,
स्पर्शग्राहकं त्वक्, रूपग्राहकं चक्षुः, रसग्राहकं रसनं, गन्धग्राहकं घ्राणम्
एकविंशं तत्त्वम्, व्यक्तवागुच्चारणानुकूलं वागिन्द्रियम्, ग्रहणत्यागानुकूल-
मिन्द्रियं पायुः, मैथुनजनकमिन्द्रियमुपस्थः (क्रमेण) षड्विंशं तत्त्वम्,
सूक्ष्माकाशरूपशब्दः सप्तविंशं, सूक्ष्मवायुरूपः स्पर्शः अष्टाविंशं,
सूक्ष्मतेजोरूपं रूपम् एकोनत्रिंशं, सूक्ष्मजलरूपो रसः त्रिंशं, सूक्ष्मपृथिवीरूपो
गन्ध एकत्रिशम्, अवकाशात्मक आकाशः स्थूलः द्वात्रिंशं, सदागतिमत्त्वात्मक-
गुणवान् वायुः त्रयस्त्रिंशम्, उष्णवत् तेजः चतुस्त्रिशं, द्रवत्ववज्जलं पञ्चत्रिंशं,
काठिन्यगुणवती पृथ्वी षट्त्रिंशं चरमं तत्त्वम्। एतादृशतत्त्वसंघातो विश्वं
जगदिति व्यवहारविषयाभिन्नम्॥४॥

दीक्षाविधिः ५
सिद्धान्तप्रवर्त्तक सूत्रों में यह सर्वप्रथम और तत्त्वदृष्टि से महत्त्वपूर्ण सूत्र है।
पाँचों आम्नाय इसे सिद्धान्त रूप से स्वीकार करते हैं कि, यह जगत् ३६
तत्त्वात्मक है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। सर्वप्रथम केवल निजरूप में
ही परमशिव अवस्थित थे। उनमें "मैं एकाकी बहुरूपों अर्थात् अनन्तरूपों में व्यक्त
हो जाऊँ" इस प्रकार की इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक शक्तियाँ उल्लसित हो गयीं।
इन शक्तियों के योग से क्रमशः अर्थ और शब्द की सृष्टि, अङ्कुर और प्रतिबिम्ब
की तरह एक साथ उत्पन्न हो गयी। इस प्रकार की सिसृक्षा से सिसृक्षु उपाधिविशिष्ट
परमशिव ही केवल 'शिव' पदवी से विभूषित हो गया। उसका अभिधेय शिव
हो गया। शिव ३६ तत्त्वों में प्रथम आदिम तत्त्व माना जाता है।
सिसृक्षा की वह शक्ति जो परमशिव में आद्यस्पन्द रूप से उल्लसित हुई,
वही शक्ति नामक द्वितीय तत्त्व है।
समग्र विश्व को अहमात्मक अङ्गीकृत कर 'सर्वं विश्वम् अहम्' इस वृत्ति
से विद्योतित 'सदाशिव' नामक तृतीय तत्त्व है।
यह विश्व है। यह भेदविषयक वृत्ति है। इस वृत्तिवाला तत्त्व ईश्वरतत्त्व
है। यह चतुर्थ तत्त्व है।
विश्वात्मक यह विस्तार मैं ही हूँ, इस प्रकार की सदाशिव सम्बन्धिनी
वृत्ति ही 'विद्या' है। यह पाँचवाँ तत्त्व है।
यह जगत् पार्थक्य प्रथा से प्रथित है। इसमें व्यापक पृथक् वृत्तिमयी
भेदविषयिणी ईश्वरनिष्ठा वृत्ति पृथक् तत्त्व मानी जाती है। यह वृत्ति ही माया
है। यह छठवाँ तत्त्व है।
ऊपर कथित विद्या को तिरोहित करने वाली शक्ति और विद्या की
विरोधिनी शक्ति को अविद्या कहते हैं। यह सातवाँ तत्त्व है।
जीव-निष्ठ सारा कर्त्तृत्व किञ्चित्कर्त्तृत्व से नितान्त संकुचित है। यह
सङ्कोचमयी वृत्ति ही कला है। इसे आठवाँ तत्त्व कहते हैं।
जीवनिष्ठा नित्यतृप्ति ही किन्हीं विषयों में अतृप्ति के कारण किन्हीं विषयों
में संकुचित होकर 'राग' संज्ञा से विभूषित हो जाती है। यह नवाँ तत्त्व है।
जीवनिष्ठ नित्यता, आच्छादित होने पर अस्ति (है), जायते (उत्पन्न होती
है), वर्धते (बढ़ती है), विपरिणमते (अधेड़ होकर परिणत होती है), अपक्षीयते

६ परशुरामकल्पसूत्रम्
(क्षीण होती है) और विनश्यति (नष्ट हो जाती है) इस छः प्रकार की
अस्तित्वगत गतिशीलता से प्रभावित और संकुचित होती है। यही काल नामक
कञ्चुक है। यह दशवाँ तत्त्व है।
परशिव और जीव में अभेद है। जैसे परशिव में सर्वस्वातन्त्र्य है, वैसा
ही स्वातन्त्र्य जीव में भी है। इसका पिधान अविद्या करती है। यह कारणसापेक्ष
प्रक्रिया है। नियति ही वह कारण है। यह नियति ही ग्यारहवाँ तत्त्व है।
जीव इन नियति, काल, राग, कला और अविद्यारूप ५ कञ्चुकों का
आश्रय बन जाता है। यह बारहवाँ तत्त्व है।
सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। इसे एक-
दूसरे पर्याय चित्त शब्द से भी बोधित करते हैं। यह तेरहवाँ तत्त्व है। सत्त्व
और तमस् को अभिभूत कर वर्त्तमान रजःप्रधान संकल्प हेतु तत्त्व ही मन
कहलाता है। यह चौदहवाँ तत्त्व माना जाता है।
रजस् और तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित सत्त्वप्रधान अन्तःकरण निश्चय
का हेतु होता है। इसे बुद्धि तत्त्व कहते हैं। यह पन्द्रहवाँ तत्त्व है। रजस् और
तमस् को अभिभूत कर प्रवर्त्तित तमःप्रधान अहंकार तत्त्व विकल्पों का कारण
माना जाता है। यह सोलहवाँ तत्त्व है।
शब्दग्राहक इन्द्रिय श्रोत्र कहलाती है। यह सत्रहवाँ तत्त्व है।
स्पर्शग्राहक इन्द्रिय त्वक् अठारहवाँ तत्त्व है।
रूपग्राहक इन्द्रिय चक्षु उन्नीसवाँ तत्त्व हैं।
रसग्राहक इन्द्रिय रसना बीसवाँ तत्त्व है।
गन्धग्राहक इन्द्रिय नासिका इक्कीसवाँ तत्त्व है।
व्यक्तवागुच्चारक वागिन्द्रिय बाइसवाँ तत्त्व है।
ग्रहणत्यागानुकूल पाणि तेइसवाँ तत्त्व है।
गमनानुकूल पाद चौबीसवाँ तत्त्व है।
मलविसर्जनक पायु इन्द्रिय पचीसवाँ तत्त्व है।
मैथुनजनक उपस्थ इन्द्रिय छब्बीसवाँ तत्त्व है।

दीक्षाविधिः ७
सूक्ष्माकाशरूप शब्द सत्ताइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म वायुरूप स्पर्श अट्ठाइसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म तेजरूप रूप उन्तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म जलरूप रस तीसवाँ तत्त्व है।
सूक्ष्म पृथ्वीरूप गन्ध इकतीसवाँ तत्त्व है।
स्थूल अवकाशात्मक आकाश बत्तीसवाँ तत्त्व है।
सदागतिशीलता-गुणशाली वायु तैंतीसवाँ तत्त्व है।
उष्णतागुणशाली तेज चौंतीसवाँ तत्त्व है।
द्रवत्वगुणशाली तत्त्व जल पैंतीसवाँ तत्त्व है।
काठिन्यगुणवती पृथ्वी अन्तिम छत्तीसवाँ तत्त्व है।
इन छत्तीस तत्त्वों का संघात ही विश्व है। व्यवहार में इसे ही जगत् कहते
हैं। शास्त्रों में इसके अनन्त प्रमाण उपलब्ध हैं।।४।।
शरीरकञ्चुकितः शिवो जीवो निष्कञ्चुकः परशिवः।।५।।
एवं षट्त्रिंशत्तत्त्वानामपि सामान्यरूपेण पुनर्द्विस्वभावत्वम्-केषुचित् केवलं
दृश्यत्वम्, केषुचित् केवलं द्रष्टृत्वम्। आद्यं जडेषु। द्वितीयं केवलमिति।
ननु जीवस्य तत्त्वान्तःपातित्वात् परशिवस्यातथात्वाद् द्वयोर्भेद
आयातः। सर्वस्वतन्त्रः परशिवः स्वस्य मायया दुर्घटया स्वनिष्ठं यदन्यानपेक्ष-
त्त्वरूपं पूर्णं स्वातन्त्र्यं तदाच्छादयति। ततस्तिरोहितं यत् स्वातन्त्र्यं परिमितं
तदाणवमलमुच्यते। आणवमलमेव अविद्येत्यप्युच्यते।
एवमाणवेन मलेन छन्नः, तदा स्वयमणुदेहपरिमितः सन् अन्यान्
देहपरिमितान् अनन्तान् जीवान् स्वभिन्नत्वेन पश्यति। तन्मायिकं मलम्। एवं
भेदप्रथारूपमायिकमलेन मलिनाः शुभाशुभकर्म अनुतिष्ठन्तस्तज्जनित-
संस्कारवन्तो भवन्ति। तदेतत् कार्मं मलम्। एतादृशत्रिविधमलं शरीर-
पदेनोच्यते। तद्रूपं यत् कञ्चुकम् आच्छादनं तेन आवृतः शिव एव जीवः।
एतादृश-कञ्चुकरहितो यः स तत्त्वातीतः परशिव इत्यर्थः।।५।।

८ परशुरामकल्पसूत्रम्
छत्तीस तत्त्व भी सामान्यरूप से दृश्य और द्रष्टा रूप से दो भागों में
विभक्त हैं। जड़ों में दृश्यत्व और केवल तत्त्व में द्रष्टा का भाव। उसी तरह
निष्कञ्चुक परशिव और शरीर से कञ्चुकित जीव ये दो भाव होते हैं। जीव तत्त्व
भाव में परिगणित है। परशिव तत्त्ववाद से ऊपर है। यह दोनों में भेद है।
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र परशिव अघटितघटनापटीयसी अपनी ही माया शक्ति द्वारा अपने
परम निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य को स्वयम् आच्छादित करता है। परिणाम-स्वरूप
आच्छादित परस्वातन्त्र्य परिमित स्वातन्त्र्य में परिणत हो जाता है। यही पारिमित्य
आणव मल कहलाता है। आणव मल को ही अविद्या भी कहते हैं।
आणव मल से आच्छन्न शिव स्वयम् अणुशरीर से परिमित हो जाता
है। इस अवस्था में वह अन्य अनन्त परिमित शरीराच्छन्न जीवों को स्वात्म से
भिन्न रूप में देखने लगता है। यह उसकी माया-परिच्छिन्न अवस्था है। इसे
मायिक मल कहते हैं।
यही भेदप्रथा मानी जाती है। जीव भेद-प्रथा से प्रथित परिमित प्रमाता
बन जाता है। ये जीव अब मायामलिन होकर अनन्त अनन्त शुभकर्मों को
अनुष्ठित करते हुए कर्मों के संस्कारों से प्रभावित होते रहते हैं। विवशता की
एक ऐसी परम्परा चल पड़ती है, जिसमें जीवजगत् की सक्रियता ही अभिशाप
बन जाती है। इसे कार्म मल कहते हैं।
यही तीनों आणव, मायिक और कार्ममल ही शरीर बनकर शरीरी को
कञ्चुक की कमनीयता प्रदान करते हैं। इस तरह शिव ही जीव भाव में पड़ा
भेदवाद की विभीषिका का उपभोग कर रहा है। यही शरीर कञ्चुकित शिव जीव
है। निष्कञ्चुक अर्थात् ऐसे कञ्चुकों से रहित तत्त्वातीत शिव ही परमशिव है॥५॥
एवं जीवेश्वरयोः स्वरूपमुक्त्वा कः पुरुषार्थ इति निर्दिशति-
स्वविमर्शः पुरुषार्थः ॥६॥
स्वस्य परशिवरूपस्य विमर्शः प्रत्यभिज्ञानं सोऽहमित्याकारकम्। यथा
कण्ठस्थं चामीकरं विस्मृत्य तदन्वेषणाय देशाद्देशं धावन् केनचिद् उद्बुद्ध-
संस्कारः कण्ठस्थं पश्यति तथा विस्मृतस्वरूपज्ञानस्य पुनर्लाभः पुरुषार्थः
अकृत्रिम इत्यर्थः। एतादृशपुरुषार्थलाभश्च न भगवत्कृपामृते भविष्यति। तदुक्तं

दीक्षाविधिः ९
भगवता श्रीकृष्णेन—'मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' (श्री.भ.
७।१४)। भगवत्प्रीतिश्च भगवदाराधनेनैव भवति। अतो भगवदाराधनं
परम्परया मोक्षसाधनम्॥६॥
इस प्रकार जीव और ईश्वर के स्वरूप कथन के अनन्तर पुरुषार्थ क्या
होता है, इसका निर्देश कर रहे हैं कि,
स्वात्म का विमर्श ही पुरुषार्थ है।
अपने परशिवरूप का विमर्श अत्यन्त आवश्यक है। इसे प्रत्यभिज्ञान
कहते हैं। माया के प्रतीप आत्माभिमुख्यपूर्वक विमर्श से सोऽहम् अर्थात् मैं
परशिव हूँ, इस तरह का दृढ़ ज्ञान उत्पन्न होता है। इसे ही प्रत्यभिज्ञान कहते
हैं। विस्मृत ज्ञान का पुनः उपलब्ध करना ही पुरुषार्थ है।
जैसे गले का स्वर्णाभूषण वस्त्र से ढक जाय। उसे इधर-उधर खोजा जाने
लगे। किसी प्रबुद्ध दर्शक द्वारा निर्देश देने पर गले में है, यह ज्ञान हो जाय,
तो प्रसन्नता होती है। उसी तरह स्वात्मज्ञान उपलब्ध हो जाने पर परमपुरुषार्थ
की सिद्धि हो जाती है। ऐसा पुरुषार्थ-लाभ भगवत्कृपा के विना नहीं हो सकता।
इसी तथ्य को श्रीमद्भगवद्गीता (७।१४) द्वारा भगवान् कृष्ण कहते हैं कि, 'जो
मेरी शरण में आ जाते हैं, मेरी प्रपत्ति प्राप्त कर लेते हैं। वे ही इस दुस्तर
माया को पार कर पाते हैं।'
यह सत्य है कि, भगवत्प्रीति भगवान् की आराधना से ही होती है।
इसीलिये यह माना जाता है कि, भगवान् की आराधना परम्परा से मोक्ष-साधन
सिद्ध होती है॥६॥
वर्णात्मका नित्या शब्दाः॥७॥
वर्णात्मका वर्णसमुदायरूपाः शब्दा मन्त्रा नित्याः। मूलविद्या समसत्ताका
इत्यर्थः॥७॥
शब्द वर्णात्मक होते हैं। वर्णात्मकता का तात्पर्य वर्णसमुदायरूपात्मकता
से है। वर्णसमुदाय रूप शब्द ही मन्त्र होते हैं। ये नित्य होते हैं। मूल अविद्या
की समान-सत्ता वाले ये मन्त्र यद्यपि नित्य हैं फिर भी अज्ञान की निवृत्ति हो
जाने पर स्वात्मातिरिक्त किसी अन्य देवता के अनस्तित्व के कारण ज्ञानी के

१० परशुरामकल्पसूत्रम्
लिये इसके त्रैकालिक नित्यत्व का कोई महत्त्व नहीं रहता। यह ध्यान देने की
बात है कि, मन्त्र देवतावत् सूक्ष्म शरीररूप होते हैं। देवता के सूक्ष्म शरीर भी
अविद्या पर्यन्त ही अनुभूत होते हैं। अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर इनकी स्वतः
निवृत्ति स्वाभाविक है॥७॥
मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।।८।।
मन्त्राणामिति षष्ठी सप्तम्यर्थे, मन्त्रेष्वित्यर्थः। न चिन्त्या अचिन्त्या
शक्तिर्यत्र, ते अचिन्त्यशक्तयो मन्त्राः, तेषां भावस्तत्ता। अस्तीति शेषः। शक्तौ
अचिन्त्यत्वं च तर्काविषयत्वम्। एतेन पूर्वोदितमाया अतर्क्या दुर्वारा, तथापि
तन्निवारणे समर्था ततोऽपि अधिकशक्तिता मन्त्रेषु लीलया
ज्ञानावरकाविद्यानिर्वर्तकत्वशक्तिरस्तीति प्रतिपादितम् ।।८।।
सूत्र में मन्त्रशब्द से बहुवचन षष्ठी विभक्ति का प्रयोग वस्तुतः सप्तम्यर्थ
में है। अतः उसका अर्थ करते समय सप्तमीवाचक अर्थ करना चाहिये। मन्त्रों
में अचिन्त्यशक्तिता होती है। यही व्यावहारिक प्रचलित प्रयोग है। मन्त्रों में ऐसी
शक्ति होती है, जो अचिन्त्य होती है। इनकी शक्ति के सम्बन्ध में कोई तर्क
नहीं किया जा सकता, अर्थात् मन्त्रों की शक्ति तर्क से परे है। यहाँ यह ध्यान
देने की बात है कि, माया की शक्ति भी अतर्क्य होती है। अन्तर इतना ही
है कि, मन्त्र की अतर्क्य शक्ति, माया की ज्ञान को आवृत कर लेने वाली अविद्या
शक्ति का भी निवारण कर देती है। अतः मन्त्रों में रहने वाली शक्ति माया शक्ति
को भी अतिक्रान्त कर विद्यमान रहती है॥८॥
सम्प्रदायविश्वासाभ्यां सर्वसिद्धिः ।।९।।
सम्प्रदायः गुरुपरम्पराऽऽचारानुसरणम्। विश्वासो मन्त्रेषु
फलसाधनत्वविषयको निश्चयः। आभ्यां सहितेन मन्त्रेण सर्वसिद्धिर्भवतीति
शेषः। यद्यपि लोके एकेन दण्डेन एकव्यापारेण घट एव भवति, न पटः।
एवं तुरीवेमादिना पट एव न घट इति। एवं सर्वकारणेषु लोके
नियतैककार्यजनकत्वं दृष्टम्। तथापि मन्त्रेषु न तथा। एक एव मन्त्रो
यद्यदीप्सितं तत्सर्वं जनयति इति ज्ञापयितुं सर्वपदम्। एतेन श्रोतॄप्रवृत्तये
मन्त्रवर्त्तिगुणोऽपि प्रतिपादितो भवति ।।९।।

दीक्षाविधिः ११
मन्त्र-सिद्धि के सहकारी कारण होते हैं। मन्त्रों से अभीप्सित कार्य की
सिद्धि के उद्देश्य से उनका वर्णन कर रहे हैं।
सूत्र में तीन शब्द हैं—१. सम्प्रदाय, २. विश्वास, ३. सर्वसिद्धि। इन
तीनों शब्दों का औपासनिक दृष्टि से अप्रतिम महत्त्व है। क्रमशः इन शब्दों की
परिभाषा के साथ इनका विश्लेषण उचित है और प्रासङ्गिक
भी है—
१. सम्प्रदाय
गुरु परम्परा के अनुसार निर्धारित आचारों के समर्थक मान्य सिद्धान्त
अर्थात् आचार्य-प्रवर द्वारा प्रवर्त्तित परम्परा पद्धति। गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्त
आध्यात्मिक अनुभूतियों पर आधृत होते हैं। उनका अनुसरण स्वात्मोत्कर्ष का
साधक माना जाता है।
२. विश्वास
गुरु में, गुरु द्वारा प्रदत्त मन्त्रों में, शास्त्रों में और भगवत्सत्ता में सिद्धि
और साफल्य का निश्चय ही विश्वास माना जाता है।
३. सर्वसिद्धि
(गुरु द्वारा प्रवर्त्तित सिद्धान्तों और आचारों के अनुसरण और दृढ आस्था
से) सभी प्रकार की और सारी सिद्धियाँ अवश्य होती हैं। प्रकरण मन्त्रों का
है। इसलिये यह कह सकते हैं कि, सम्प्रदायानुसार विश्वासपूर्वक मन्त्रों के प्रयोग
से सारी सिद्धियाँ सम्भव हैं।
इसे एक उदाहरण से समझें। लोक में देखा जाता है कि, कुम्भकार द्वारा
एक दण्ड से घूर्णि देने के एक व्यापार से घट का ही निर्माण होता है, पट
का निर्माण नहीं होता। इसी तरह अनन्त कारणों से अनन्त कार्य (नियत कारण
से नियत कार्य रूप से ही) सम्पन्न होते हैं। जैसे तुरी और वेमा के प्रयोग
से पट रूप कार्य ही होते हैं, घड़ा रूप कार्य नहीं होता।
मन्त्रों में ऐसी बात नहीं। लोकदृष्ट व्यवहारवाद के विपरीत एक मन्त्र की
सिद्धि से ही सारी अभिलषित इच्छायें सिद्ध हो जातीं हैं। अर्थात् एक कारण

१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
से विनियोगानुसार समस्त ईप्सित कार्य पूर्ण हो जाते हैं। यह मन्त्रों की महती
गुणवत्ता है। मन्त्र-माहात्म्य को जानकर सम्प्रदाय और विश्वास के अनुसार सारी
सिद्धियाँ हस्तामलकवत् सिद्ध हो जाती हैं।।९।।
जिज्ञासु पूछता है कि, गुरुवर्य! लोकविरुद्ध अर्थ प्रदान करने वाला यह
सूत्र-वाक्य कैसे प्रामाणिक माना जा सकता है? गुरुदेव इस आशङ्का का समाधान
सूत्र के माध्यम से ही कर रहे हैं—
विश्वासभूयिष्ठं प्रामाण्यम्।।१०।।
प्रामाण्यं संवाद-प्रवृत्तिजनक-तद्धतितत्प्रकारकज्ञानजनकत्वम्। सर्वसिद्धि-
रिति वाक्यनिष्ठं विश्वासभूयिष्ठम्। अत्र विश्वासपदार्थश्च वाक्यप्रयोक्तरि आप्त-
त्वनिश्चयः। बहुशब्दाद् अतिशयार्थे इष्ठन्प्रत्ययः। तत्र पाणिनिसूत्रम्
“अतिशायने तमबिष्ठनौ” अतिशय-विशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थे एतौ स्तः।
“बहोर्लोपो भू च बहोः” इति इडागमे च भूयिष्ठशब्देन अत्यन्तबहुत्वविशिष्टः
पुरुषार्थः। पुरुषे विश्वासभूयिष्ठत्वं च स्वोत्तरोत्पन्नत्वस्वविषयविषयकत्वसम्बन्धेन
च विश्वासविशिष्टशङ्काऽनधिकरणत्वं, तदाश्रयपुरुषेण सममभेदान्वयस्य
बाधितत्वात्। भूयिष्ठपदस्य भूयिष्ठाश्रयज्ञानविषये लक्षणा। तस्य प्रामाण्ये
अभेदान्वयः अत्यन्तविश्वासवत्पुरुषैकवेद्यम् एतच्छास्त्रप्रामाण्यमित्यर्थः।
कुतर्कशालिनां शास्त्रप्रामाण्यं सर्वथा अगम्यमिति भावः। तदुक्तं भट्टपादैः—
“शास्त्रैकगम्या ये ह्यर्था न ताँस्तर्केण दूषयेत्” ।।१०।।
प्रमाण के भाव को प्रामाण्य कहते हैं। प्रामाण्य में ज्ञानजनकता होती है।
किसी वस्तुविषयक संवाद का प्रवर्तन व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
कोई वस्तु जिन विशेषणों से विशिष्ट है, उससे उसी प्रकार का ज्ञान होता है।
प्रामाण्य का ज्ञानजनकत्व स्वतःप्रामाण्यवाद के समर्थक कुमारिलभट्ट के अनुसार
सिद्ध माना जाता है। जैसे घड़ा मेरे द्वारा ज्ञात है। इस प्रयोग में ज्ञान की प्रमा
वाला मैं हूँ क्योंकि तथाविधज्ञातंता से मैं युक्त हूँ। यही तद्वान् में तत्प्रकारक
ज्ञान कहलाता है।
सर्वसिद्धि विश्वास पर निर्भर करती है। यह सूत्र सं. ९ में स्पष्ट किया
जा चुका है। गुरुवाक्य में विश्वास-भूयिष्ठता सिद्धि की हेतु मानी जाती है। जहाँ