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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

सर्वसाधारणक्रमः २४५
श्रीपादुकां तुरीयमाह
तारित्रिकं सप्तममुद्रा शिव-शक्ति-संवर्त्त-पुपञ्चम-पुरन्दरवरयूं,
शक्तिशिवक्षमान्ते वादिवरयीं शिवभृगुत्रिशूल-बिन्दु-भृगुशिव-
त्रिशूलविसृष्टयः, श्रीपूर्वं स्वगुरुनामतोऽष्टाक्षरी चेति पादुका
च ।। ३२ ।।
तारित्रिकं त्रितारी। सप्तममुद्रा बीजम्। शिवः हः, शक्तिः सः, संवर्त्तः
क्षः, पुपञ्चमो मकारः। पुरन्दरो लः। ततो वरयूं, ततः शक्तिः, सः शिवः,
हः क्षमौ, अन्ते वादिः, वात् पूर्ववर्णो मातृकासु लः, ततो वरयीं ततः शिवः
हः, भृगुः सः, त्रिशूलम् औ, बिन्दुः हसौः, इति सम्पन्नम्। भृगुशिवत्रिशूला
उक्ताः। विसृष्टिः विसर्गः। ततः स्वगुरोर्दीक्षा नाम। ततः श्रीपादुकां
इत्यष्टाक्षरमन्त्रः। अष्टाक्षरे आदौ यः श्रीवर्णस्तस्य पूर्वं श्रीगुरोर्नाम इत्यर्थः।
एषा श्रीपादुका।। ३२ ।।
यह सूत्र श्रीपादुका मन्त्र का प्रवर्त्तक है। इसमें बहुतलतया कूट शब्दों का
प्रयोग किया गया है। मन्त्रों को सुगुप्त रखने की यह एक परिपाटी है। क्रमशः
कूटों से मन्त्र इस प्रकार का बनता है—
१. तारित्रिक = त्रितारी = ऐं ह्रीं श्रीं, २. सप्तममुद्रा = खेचरी = हस्ख्फ्रे,
३. शिव = ह, ४. शक्ति = स, ५. संवर्त्त = प्रलयनाम = क्ष, ६. पु = पवर्ग का
पञ्चम = म, ७. पुरन्दर = ल, ८. वरयूं, ९. शक्ति = स, १०. शिव = ह,
११. क्ष, १२. म, १३. रादि व का आदिवर्ण ल, १४. वरयीं,
१५. शिव = ह, १६. भृगु = स, १७. त्रिशूल और १८. बिन्दु = हसौँ,
१९-२०-२१-२२. विसृष्टि = विसर्ग स्हौः, २३. अपने गुरु का दीक्षा नाम,
२४. श्रीपादुकां पूजयामि नमः। सबको मिलाकर बोलने से पूर्ण श्रीपादुका मन्त्र
बनता है। इसका पूरा नाम श्रीविद्यागुरुपादुका मन्त्र है।।३२।।
एताभिश्चतसृभिर्युक्ता मूलविद्या साम्राज्ञी मूलाधारे
विलोचनीया ।। ३३ ।।
बालादि चतसृभिर्युक्ता मूलविद्या वक्ष्यमाणा मूलाधारे
विलोचनीया।। ३३ ।।

२४६ परशुरामकल्पसूत्रम्
बाला से लेकर इन चारों से युक्त मूलविद्या का मूलाधार में भावन करना
चाहिये।।३३।।
मूलविद्यामाह
मादनशक्तिबिन्दुमालिनीवासवमायाघोषदोषाकरकन्दर्पगगन-
मघवद्भुवनभृगुपुष्पबाणभूमायेति सेयं तस्या महाविद्या ।।३४।।
तस्याः साम्राज्ञीनामिकायाः।।३४।।
सूत्रोक्त कूटशब्द— 'मादन; शक्ति, बिन्दु, मालिनी, वासव, माया, घोष,
दोषाकर, कन्दर्प, गगन, मघवद्, भुवन, भृगु, पुष्पबाण, भू, माया' इन सोलह
कूटों के माध्यम से मूलविद्या का कथन किया गया है। वृत्तिकार ने इसकी
व्याख्या न कर इसकी गोपनीयता को ही बल प्रदान किया है। अर्थात् यह विद्या
गुरु द्वारा ही ग्राह्य होनी चाहिये। पुस्तक से कदापि नहीं। इसे साम्राज्ञी श्रीविद्या
की मूलविद्या मानते हैं।।३४।।
अङ्गादियुक्ता श्यामाविद्या, अथ हृच्चक्रे ध्येयश्यामाऽङ्गविद्यामाह
वाङ्न

ऐं क्लीं सौः बाला मन्त्र है। इसके बाद दो बार वद वद बोलना चाहिये।
तत्पश्चात् वाग् और वादिनि के बाद स्वाहा बोलने से यह मन्त्र बनता है। श्यामा
की अङ्गरूपा यह वाग्वादिनी विद्या कहलाती है।।३६।।
अथ श्यामाप्रत्यङ्गमाह
प्रणव ओपिनाकुदंपवृषसस्यै च शाचामाहदशब्दाः ष्ठाधानलीतैः
रितार्विर्व्वाईनारुमिवार्येच्छेखरा नकुली श्यामाप्रत्यङ्गम्।।३७।।
ओ इत्यारभ्य दान्ता ये शब्दा वर्णाः षोडश तेषां क्रमेण
ष्ठावर्णमारभ्य येत् इति पर्यन्तं षोडश वर्णाः शेखरे अग्रभागे येषां ते। इदं
दशब्दा इत्यस्य विशेषणम्। इत्थं च ओ इत्यारभ्य ये दवर्णान्ताः षोडश तेषां
क्रमेण एकैकवर्णस्याग्रे ष्ठादिषोडशसु वर्णेषु क्रमेणैकैकं पठेत्। यथा आदौ
प्रणवः ततः ओ ततः ष्ठा, ततः पि एवञ्च द्वात्रिंशदक्षयनकुली श्यामाप्रत्यङ्गं
भवतीति भावः।।३७।।
३२ अक्षरों वाली नकुली विद्या 'श्यामा' की प्रत्यङ्ग-विद्या की संरचना
का अद्भुत क्रम भगवान् परशुराम ने इस सूत्र में अपनाया है। पहले प्रणव का
प्रयोग करना चाहिये। इसके बाद 'ओ' से लेकर 'द' तक सोलह शब्दों में से
एक-एक के साथ ष्ठा से लेकर येत् तक के सोलह अक्षरों में से एक-एक
को जोड़ना चाहिये। जैसे—प्रणव + ओ + ष्ठा + पि + धा + ना + न + कु
ली + दं + तैः + आदि। इसी तरह एक इस षोडश भाग से एक वर्ण और फिर
दूसरे षोडश भाग क्रमिक वर्ण मिलाने से पूरी विद्या बन जाती है।।३७।।
श्यामापादुकामाह
ललितापादुकादित्रिकस्थाने कुमारी योज्या शिष्टं तद्वद् इति
श्यामापादुका च।।३८।।
ललितापादुका या उद्धृता पूर्वं श्रीपादुकेति तस्याः प्रथमबीजत्रयस्थाने
बाला योज्या। शेषं पूर्ववत्। इयं श्यामापादुका।।३८।।
ललितापादुका मन्त्रविद्या में श्रीपादुका शब्द के पहले के तीन बीजों के
स्थान पर इसमें बाला मन्त्र लगा लेते हैं। वही मन्त्र श्यामापादुका मन्त्र बन
जाता है।।३८।।

२४८ परशुरामकल्पसूत्रम्
चतसृभिर्युक्ता हृच्चक्रे श्यामा यष्टव्या ।।३९।।
उक्ताभिश्चतसृभिर्युक्ता वक्ष्यमाणा श्यामा विद्या हृच्चक्रे अनाहते
यष्टव्या ।।३९।।
आगे श्यामा-विद्या का उल्लेख किया जा रहा है। इन चारों को मिलाकर
उसे अनाहत चक्र में भावन करना चाहिये।।३९।।
अथ श्यामाविद्यामाह
तद्विद्या तु त्रितारी कुमारी नभव श्री तं श्व स ज महासमुंरंनि
माया स रावक स स्त्री रु व क स दु मृ व क स स व क स
लो व क अ कं व माय हा वर्णाः ओं मो गति मा गी रि र्व न
नो रि र्व ख जि मदन श्रीं र्व ज शं विर्व पुष शं रि र्व ष्ट ग शं
रि र्व त्व शं रि र्व क शं रि मु मे श न स्वा ऽन्त मन्त्रादि बीजषट्कं
प्रातिलोम्यमिति अष्टनवतिवर्णाः ।।४०।।
तद्विद्या श्यामाविद्या। त्रितारी कुमारी च प्रागुक्ते। नश्च भश्चेति हावर्ण-
पर्यन्तं द्वन्द्वः। इत्थं ओं इत्यारभ्य स्वावर्णपर्यन्तं द्वन्द्वं। नकारमारभ्य हान्ता
ये वर्णास्तेषु क्रमेणैकैकवर्णोत्तरं योजयेत्। यथा ओं, तदुत्तरं नवर्णः, तदुत्तरं
मो, एतदुत्तरं भ इत्युत्तरेत्। एवं क्रमेण वर्णान् योजयित्वा स्वाहान्तं पठेत्।
न भ इत्यादि हावर्णान्तकूटे मायापदेन ह्रीं इति योज्यम्। एवं ओं इत्यारभ्य
स्वावर्णान्ते द्वितीयपदे कामपदे क्लीं इति वर्णं गृहीत्वा अष्टनवतिवर्णान्तर्गत-
पद्यत्रिंशद्वर्णः क्लीं इति योज्यः, कूटद्वयेऽपि शेषवर्णा उक्तरीत्या यथाश्रुता एव
पठितव्याः। एवं ग्रथनपूर्वकं स्वाहान्तं मन्त्रं पठित्वा ततः प्रथमषड्बीजानि
विपरीतानि पठेत्। एवञ्च सर्वं मिलित्वा अष्टनवतिवर्णा भवन्ति। अत्र ग्रथिते
मन्त्रे द्व्यशीति-त्र्यशीति-चतुरशीति-वर्णा अमुका इति भवन्ति। तत्स्थाने
विवक्षितनामनिर्देशः, सर्वनामत्वात्। विवक्षितनामप्रक्षेपे वर्णन्यूनाधिकभावो न
दोषाय।।४०।।
प्रथम मन्त्र की परिपाटी इसमें भी अपनायी गयी है। सर्वप्रथम त्रितारी
कुमारी ओं के बाद दो भागों में से क्रमशः एक-एक वर्ण लेकर मन्त्र बनता

सर्वसाधारणक्रमः २४९
है। बीज में माया पद के यहाँ हीं और दूसरे भाग में क्लीं योजन पर ध्यान
देना चाहिये। शेष सभी वर्ण उसी रीति पर जुटते हैं। अन्त में त्रितारी, कुमारी
को विपरीत क्रम से पढ़ना चाहिये। जहाँ नाम डालना अपेक्षित है, वहाँ मात्राओं
की घट-बढ़ में कोई दोष नहीं आता।।४०।।
अथ अनाहते ध्येयाया वाराहीविद्याया अङ्गमाह
हरः सबिन्दुर्वार्पूर्वंराहि स्थाणुः सबिन्दुरुन्मत्तपदं भैशब्दो
रविपादुकाभ्यां नम इति वार्त्ताल्यङ्गं लघुवार्त्ताली ।।४१।।
हरः अग्रे स्थाणुरिति दशमस्वरवाचकौ। इत्यं च प्रथमं लूं ततः पूर्वं
इत्यंशं त्यक्त्वा हिवर्णान्तः पुनः लूं ततः पदशब्द इत्येतावदंशमपहाय
नमोऽन्तं यथाश्रुतम्। इयं लघुवाराहा वाराह्यङ्गभूता ।।४१।।
'लूं वाराहि लूं उन्मत्तभैरवि पादुकाभ्यां नमः' यह लघुवाराही विद्या है।
यह वाराही माता की अङ्गभूत विद्या मानी जाती है।।४१।।
अथ वार्त्ताल्युपाङ्गविद्यामाह
वेदादिभुवनं नमो वाराहि घोरे स्वप्नं ठद्वितयं अग्निदारा इति
वार्त्ताल्युपाङ्गं स्वप्नवार्त्ताली स्वप्ने शुभाशुभफलवक्त्री ।।४२।।
'ॐ ह्रीं नमो वाराहि घोरे स्वप्नं ठः ठः स्वाहा' यह वार्ताली की
उपाङ्ग विद्या है। यह स्वप्न में शुभाशुभ फलों का निर्देश करती है। ऐसा
चाहने वाले इसकी स्वतन्त्र उपासना कर सकते हैं।।४२।।
तत्प्रत्यङ्गविद्यामाह
वाग्हृदयं भगवति तिरस्करिणि महामाये पशुपदाज्जनमनश्चक्षु-
स्तिरस्करणं कुरु द्वितयं वर्म फट् पावकपरिग्रह इति वार्त्ताली
प्रत्यङ्गतिरस्करिणी ।।४३।।
वाक् ऐं, हृदयं नमः। ततः पदादिति त्यक्त्वा तिरस्करणमित्यनन्तं
यथाश्रुतम्। ततः कुरु इति द्विवारम्। ततः वर्म हुम्। ततः फट् पावकपरिग्रहः
स्वाहा। इयं तिरस्करिणीविद्या प्रत्यङ्गभूता।।४३।।

२५० परशुरामकल्पसूत्रम्
'ॐ नमो भगवति तिरस्करिणि! महामाये पशुजनमनश्चक्षुस्तिरस्करणं
कुरु कुरु हुं फट् स्वाहा' यह तिरस्करिणी विद्या देवी की प्रत्यङ्गविद्या
है।।४३।।
अथ वाराहीपादुकां दर्शयति
श्यामापादुका मन्त्रादित्रीबीजमपहाय वाग्ग्लौम् इति योज्यम्
एषा वार्त्तालीपादुका ।।४४।।
श्यामापादुकाया आदिबीजत्रयमपसार्य तत्स्थाने ऐं ग्लौम् इति पठित्वा
शेषम् अधिकृतं पठेत्। इयं वाराहीपादुका भवति।।४४।।
श्यामापादुका मन्त्र के आदि बीजत्रय 'ऐं ह्रीं श्रीं' को छोड़कर 'वाक् ऐं'
के साथ 'ग्लौं' जोड़ देने से वही मन्त्र वाराहीपादुका मन्त्र बन जाता है।।४४।।
विद्याभिरेताभिर्युक्तफालचक्रे परिपूज्या भगवतीयं
भूदारमुखी ।।४५।।
एताभिरुक्ताभिर्विद्याभिर्युक्ता भूदारमुखी वाराही तद्विद्येत्यर्थः। सा
फालचक्रे आज्ञायां परिपूज्या ध्येयेत्यर्थः।।४५।।
आज्ञाचक्र में अङ्गादि विद्याओं से युक्ता वाराही विद्या का ध्यान करना
चाहिये। इससे वाराही विद्या देवी प्रसन्न होती है।।४५।।
अथ वाराहीविद्यामाह
मनुरिदमीयोऽयं वाक्पुटितं ग्लौं न भ व वा र्त्ता वा हि रा
व ह खि रा मु अं अं नि मः धेधि न जं जं नि मः हे हि नस्तं
स्तं नि मः र्वष्ट दु नां वें स वा क त्त क्षु ख ति ह्ला भ कु कु
शी व शब्दाः यथाक्रमं मो ग ति र्त्ता वा लि रा वा हि रा मु व
ह खि धे धि न रुं रुं नि भः भे भि न मो मो नि मः भे भि
न सदुप्र ष्टा स षां र्व चि च मु र्ग जि स्तं नं रु रु भ्रं श्यं शब्दोपेता
वाग् ग्लौं विसृष्ट्यन्ताश्च सप्तमाश्चत्वारो वर्मास्त्राय फडिति
द्वादशोत्तरशताक्षरा ।।४६।।

सर्वसाधारणक्रमः २५१
अस्या वाराह्या अयं इदमीयः। मनुः मन्त्रः। प्रथमं ऐं, ततः ग्लौं, ततः
ऐं इति तदर्थः। ततो नेत्यारभ्य वान्ता ये वर्णास्तेषु क्रमेणैकैकवर्णोत्तरं मो
इत्यारभ्य श्यं इति वर्णान्ताः क्रमेण पूर्ववद् एकैकान् पठेत्। एवं ग्रथनपूर्वकं
वश्यंपर्यन्तं पठित्वा। ततो वाक् ऐं। ततो ग्लौं पठित्वा इति। ततश्चवर्णात्
सप्तमा ठकारा विसृष्ट्यन्ताश्चत्वारः पठित्वा। वर्म हुम्। ततो अस्त्राय फट्
इति पठेत्। इयं वाराही-विद्या। द्वादशोत्तरशताक्षरी ज्ञेया।।४६।।
पूर्वपरिपाटी अपनाकर मन्त्र की गोपनीयता का प्रदर्शन इस सूत्र में भी
है। सूत्रोक्त ग्लौं के बाद के सभी अक्षरों में 'यथाक्रमं' के बाद पठित मोसेश्यं
तक के एक-एक के साथ एक को जोड़ने से पूरा मध्यगत मन्त्र अभिव्यक्त हो
जाता है। उसके बाद च से सातवें चार ठकार विसर्ग सहित बोलने के बाद
हुं अस्त्राय फट् लगाकर मन्त्र पूरा करते हैं। यह एक सौ बारह अक्षरों का मन्त्र
है।।४६।।
अथ ब्रह्मरन्ध्रे यष्टव्यां श्रीपूर्त्तिविद्यामाह
पञ्चमैकादशबीजवर्ज्जा श्रीरेव श्रीपूर्त्तिविद्या ब्रह्मकोटरे
यष्टव्या ।।४७।।
पूर्वं मादनशक्त्यादिना दर्शिता या श्रीविद्या तस्यां यः पञ्चम एकादशश्च
वर्णो मायाबीजं तावपहाय श्रीविद्यैवोर्वरिता श्रीपूर्त्तिविद्या। सा ब्रह्मकोटरे
ब्रह्मरन्ध्रे ध्येयेति यावत् ।।४७।।
सूत्र ३४ में मूल श्रीविद्या की विद्या का कूट विधि से उल्लेख किया
गया है। वही विद्या श्रीपूर्त्तिविद्या हो जाती है। उसमें कुछ परिवर्तन भी कर देते
हैं। पाँचवें और ग्यारहवें वर्णों का परित्याग कर देने से ही यह अन्तर हो जाता
है। इसका ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिये।।४७।।
महापादुका
श्यामापादुका प्रथमत्रिकस्थाने तारत्रयं कुमारी वाक् ग्लौं इति
योज्यम्। ततः परस्तात्। शेषं समानम् ।।४८।।
स्पष्टम् ।।४८।।

२५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
श्यामापादुका के पहले तीन शब्दों के स्थान पर त्रितारी, कुमारी ऐं ग्लौं
जोड़ने से यह मन्त्र बनता है।।४८।।
इमां लोकप्रवृत्तसर्वोत्तमज्ञानाय स्तौति
इयं महापादुका सर्वमन्त्रसमष्टिरूपिणी स्वैक्यविमर्शिनी
महासिद्धिप्रदायिनी द्वादशान्ते यष्टव्या ।।४९।।
सर्वमन्त्रसमष्टिरूपिणी सर्वमन्त्रैः प्रत्येकं यद्यत् साध्यं फलं तत्सर्वमनेनैव
साधितुं शक्यमिति भावः। एवम् इहलोके क्षुल्लकफलसाधनत्वमुक्त्वा
साध्याणिमादिसाधनत्वमप्यस्तीत्याह—महासिद्धिप्रदायिनीति। महासिद्धयोऽ-
णिमादयः। एवं कृत्रिमपुरुषार्थसाधनत्वमुक्त्वा परमपुरुषार्थसाधनत्वमप्याह—
स्वैक्येति। स्वैक्यविमर्शो ब्रह्मात्मैक्यज्ञानं जनकतासम्बन्धेन तद्वती।
ब्रह्मात्मैक्यविमर्शाभासनरूपा, अविद्यालयकर्त्रीति यावत् ।।४९।।
महापादुका मन्त्र की इस सूत्र में प्रशंसा की गयी है। उसके दो महत्त्वपूर्ण
फल हैं—
१. यह ब्रह्मतादात्म्य का विमर्श प्रदान करती है। वृत्तिकार ने विमर्श का अर्थ
ज्ञान लिखा है। वस्तुतः स्वात्मैक्यविमर्श ज्ञान से ऊपर की आनुभूतिक
स्फुरत्ता की आनन्ददायिका स्थिति का प्रतीक है।
२. अणिमादि सभी सिद्धियों को प्रदान करती है। वृत्तिकार ने स्वैक्यविमर्श के बाद
महासिद्धि की बात को असङ्गत माना है। वस्तुतः पहले साधकों के लिये
सर्वोत्तम फल की चर्चा की गयी है। पुनः भोगेच्छुओं के लिये सामान्येतर
सांसारिक फल की भी चर्चा है। अतः सङ्गति का व्यतिरेक नहीं है।
इसका एक तीसरा गुण यह है, कि यह सभी मन्त्रों की समष्टिरूपा विद्या
है। अतः साधक इसे द्वादशान्त में भावन करें और तादात्म्य में अवस्थित होने
का आनन्द लें।।४९।।
एवं रश्मिमालामन्त्रकलापमुक्त्वा यथोक्तस्थानेषु उत्तररश्मिमालाध्यानकर्त्तारं
प्रशंसति
एवं रश्मिमाला सम्पूर्णा। सर्वगात्रः शुद्धविद्यामयतनुः स एव
परमशिवः ।।५०।।

सर्वसाधारणक्रमः २५३
स्पष्टार्थः ॥५०॥
अथ जपपूर्वाङ्गभूतान् जपविघ्ननिवारकान् मन्त्रानाह
अथ विघ्नदेवताः। इरि-मिलि-फिरि-किलिपदात् परिमिरोम्
इत्येकः। प्रणवो माया नमो भगवति महात्रिपुराद्वैवर्णाद् रविपदमनु
मम त्रैपुररक्षां कुरु कुरु, इति द्वितीयः।
संहर संहर विघ्नरक्षोविभीषकान् कालय हुं फट् स्वाहा, इति
तृतीयः। ब्लूं रक्ताभ्यो योगिनीभ्यो नमः, इति चतुर्थः। सां सारसाय
बह्नाशनाय नमः, इति पञ्चमः। दुमुलुपुमुलुपु माया चामुण्डायै नमः,
इति षष्ठः। एते मनवो ललिताजपविघ्नदेवताः ॥५१॥
अथेति प्रकरणान्तरज्ञापकम्। विघ्नहर्त्र्यो देवता विघ्नदेवताः,
मध्यमपदलोपी समासः। अत्र देवतापदेन तत्तद्देवतावाचकमन्त्रा लक्षणीयाः।
तेन देवताकथनं प्रतिज्ञाय अग्रे मन्त्रकथनं न विरुद्धम्।
अत्र श्रीविद्याङ्गभूताः षण्मन्त्रास्तेष्वाद्यं मन्त्रमाह—इरिमिलीति। द्वितीयं
मन्त्रमाह—प्रणव इति। प्रणवं मायोत्तरं त्रिपुरपर्यन्तं पठित्वात् ततो भैरवि मम
त्रैपुररक्षां कुरु कुरु इति पठितव्यम्।
तृतीयमाह — संहर संहरेति स्वाहान्तं पठनीयः।
चतुर्थमाह — ब्लूमिति। अयमपि यथाश्रुतः पठनीयः।
पञ्चममाह — सामिति। अयमपि यथाश्रुतः पठनीयः।
षष्ठमाह — दुमुलु इति। षष्ठ्यां माया इति ह्रीं-वर्णग्रहणम्। शेषं
यथाश्रुतम्। ललितामनुसमाप्तिं द्योतयति—एत इति। एते उक्ताः ॥५१॥
ललिता विद्या मन्त्रों के जप करने में जितने विघ्न आते हैं, उनको
निराकृत करने वाले छः मन्त्र इसमें दिये गये हैं। ललिता मन्त्र जप से पहले
इनका जप एक बार कर लेने से विघ्न नहीं आ सकते। वे इस प्रकार हैं—
१. इरि मिलि किरि किलि परिमिरोम्।
२. ॐ ह्रीं नमो भगवति महात्रिपुरभैरवि मम त्रैपुररक्षां कुरु कुरु।

२५४ परशुरामकल्पसूत्रम्
३. संहर संहर विघ्नरक्षोविभीषिकान् कालय हुं फट् स्वाहा।
४. ब्लूं रक्ताभ्यो योगिनीभ्यो नमः।
५. सां सारसाय बह्वाशनाय नमः।
६. दुमुलुपुमुलुपु ह्रीं चामुण्डायै नमः।
ये मन्त्र ललिता जप में आने वाले विघ्नों के हरण करने वाले देवता
हैं॥५१॥
श्यामाविघ्नहरमन्त्रमाह
हसन्ति हसितालापे मातमुक्त्वा गीपरिचारिके मम भयविघ्न-
नाशं कुरुद्वितयं सविसर्गठत्रयमिति श्यामाविघ्नदेवी ॥५२॥
हसन्तीत्यारभ्य नाशमिति पर्यन्तं पदं उक्त्वेत्यंशमपहाय। शेषं समानम्।
नाशम् इत्येतदुत्तरं कुरुद्वयम्। ततः सविसर्गठत्रितयं पठेत्। इयं हसन्ती विद्या
श्यामा जपाङ्गम् ॥५२॥
श्यामा मन्त्र जप में आने वाले विघ्नों को दूर करने वाली इस विद्या
का नाम हसन्ती विद्या है। इसका मन्त्र—'हसन्ति हसितालापे मातङ्गिपरिचारिके
मम भयविघ्ननाशं कुरु कुरु ठः ठः ठः' इस प्रकार का है। श्यामा मन्त्र जप
से पहले इसका जप कर लेना चाहिये ॥५२॥
अथ वाराहीविघ्नहरविद्यामाह
स्तं स्तम्भिन्यै नमः इति कोलमुखीविघ्नदेवी ॥५३॥
यथाश्रुतं स्पष्टम् ॥५३॥
वाराही मन्त्र जप के पूर्व विघ्नविनाशिनी इस विद्या का जप करना चाहिये।
इसका स्वरूप सूत्र में स्पष्ट इस प्रकार है—
'स्तं स्तम्भिन्यै नमः'।
इसे वाराही विघ्नदेवी कहते हैं॥५३॥
एतेषां तत्तज्जपाव्यवहितप्राक्कालेन सम्बन्धं दर्शयति
एते तत्तज्जपारम्भे जप्तव्याः ॥५४॥

सर्वसाधारणक्रमः २५५
संख्याया अनुक्तत्वात् जपात् पूर्वं सकृत्पाठः ।।५४।।
विघ्नहर जपनीय मन्त्रों की संख्या नहीं दी गयी है। वृत्तिकार के अनुसार
मात्र एक-एक बार उच्चारण ही पर्याप्त है।।५४।।
अथ ललितादि-परान्तानां जपकालमाह
ललिता प्राह्ने। अपराह्ने श्यामा। वार्त्ताली रात्रौ। ब्राह्मे मुहूर्त्ते
परा।।५५।।
प्राह्नः सूर्यपरावृत्तिप्राक्कालः। अपराह्नः परावृत्त्यपरभागः। तयोर्मध्यः
अतिसूक्ष्मः कालो मध्याह्नः। 'प्राह्नापराह्नमध्याह्नाः' इति कोशात्। अस्तोत्तरम्
अर्धयाममुदयात् प्रागर्धयामं चापहाय शेषं यामत्रयं रात्रिपदवाच्यम्। अत एव
रात्रिस्रियामा इति पर्यायोऽपि कोशेऽस्ति। ब्राह्मो मुहूर्त्तः प्रागुक्तः।।५५।।
सूर्य का रात्रि के बाद परावर्त्तन ही परावृत्ति काल है, अर्थात् सूर्योदय
होने के समय ललिता मन्त्र जप करना चाहिये। श्यामा का मन्त्र जप मध्याह्न
के बाद अर्थात् अपराह्न में करना उचित है। वार्त्ताली का जप रात्रि में होना
चाहिये। रात्रि का जप समय तीन पहर की रात्रि से नहीं, अपि तु निशीथ सन्ध्या
समय से लेना उचित है, परामन्त्र जप सर्वदा ब्राह्म मुहूर्त्त में करना चाहिये।
'रात्रेश्च पश्चिमे यामे मुहूर्त्तो ब्राह्म उच्यते' के अनुसार रात्रि का अन्तिम भाग
उषःकाल समेत ब्राह्ममुहूर्त्त में परिगणित है ।।५५।।
श्रीनित्यापूजायां मपञ्चकप्रतिनिधिना पूजनं मुख्यालाभे उक्तम्। इदानीं
प्रतिनिध्यादरे अन्यानपि हेतूनाह
व्यवहारदेशस्वात्म्यप्राणोद्वेगसहायामयवयांसि प्रविचार्यैव
तदनुकूलः पञ्चमादिपरामर्शः ।।५६।।
व्यवहारः पूजाऽव्यवहितोत्तरकाले पशुजनैः सह कर्तव्यो लौकिक
आवश्यकः कार्यविशेषः। तत्तद्द्रव्यसेवनाव्यवहितोत्तरं तद्विकारं दृष्ट्वा पशव
एनं दूषयेयुः। क्रतावश्यकं रहस्यं भिद्येत। अतः प्रतिनिधिसेवनमिति
भावः।

२५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवं यस्मिन् देशे द्रव्यसेवनेन धातुवैषम्यजनितः शरीरविकारस्तत्र
प्रतिनिध्याश्रयः। अयं द्वितीयो हेतुः। एवं समीचीनश्चासावात्मा च स्वात्मा।
स्वात्मनो भावः स्वात्म्यम्। तत्त्वं च सात्त्विकवृत्तिमत्त्वम्।
प्राणोद्वेगः सहनशक्तिः। सहायाः प्रसिद्धाः। आमयो रोगः। वयांसि
बालादिः। एतानि सर्वाणि पञ्चमादिपरिग्रहे अनुकूलानि, उत प्रतिकूलानि इति
प्रविचार्य सम्यग्विचार्य अनुकूलत्वयाथार्थ्यग्रह एव मुख्यपञ्चमादि परिग्रहः।
अन्यथा प्रतिनिधिनैव नित्यक्रमविमृष्टिरिति भावः।।५६।।
मपञ्चक के प्रतिनिधि द्रव्यों से पूजन किया जा सकता है। इसके अन्य
कई कारण प्रस्तुत कर रहे हैं—
१. व्यवहार—पूजा के तत्काल बाद सांसारिक व्यक्तियों की सामाजिकता का
निर्वाह करते हुए आवश्यक कार्य निर्वाह ही व्यवहार कहलाता है। इस दृष्टि
से प्रतिनिधि का प्रयोग अपेक्षित है। कहीं कोई इस सम्बन्ध में दूषण की
बात न करे।
२. देश—देश का प्रभाव भी विचारणीय है। द्रव्य सेवन का प्रभाव अक्षांश,
देशान्तर की दूरियों पर बहुत पड़ता है। इससे धातुदोष भी उत्पन्न हो जाते
हैं। शरीर में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। अतः इस दृष्टि से भी प्रातिनिध्य
स्वीकरणीय है।
३. स्वात्म्य—आत्मा का स्तर भी विचारणीय है। आत्मा आवरण से जितना
आवृत/अनावृत होता है, उतना ही मनुष्य की प्रवृत्तियाँ निवृत्ति की
स्तरीयता प्रकट करती हैं। आत्मा को मन भी कहते हैं। मन भी बन्ध
और मोक्ष का कारण बनता है। यह मनोभाव पर निर्भर करता है कि,
उस साधक का मन मुख्य द्रव्य या प्रतिनिधि द्रव्य से कितनी परतृप्ति
का अनुभव कर रहा है। वस्तुतः सात्त्विक वृत्ति का ही महत्त्व होना
चाहिये।
४. प्राणोद्वेग—प्राण में द्रव्य सेवन का कितना बल है। कितनी सहनशीलता
है। यह अवश्य विचारणीय है।

सर्वसाधारणक्रमः २५७
५. सहाय—वृत्तिकार ने प्रसिद्ध लिखकर इसे टाल दिया है। वस्तुतः इस क्रिया
में गुरु, शिष्य, मित्र, परिवार, समाज सब की सदाशयता आवश्यक होती है।
६. आमय—रोग को कहते हैं। रोगी क्या सेवन करे क्या न करे; इसका निर्णय
चिकित्सक कर सकता है, पूजा-प्रबन्धक नहीं।
७. वय—उम्र या अवस्था का ध्यान रखना भी आवश्यक है। बालक, वृद्ध,
आतुर और विशेष परिस्थितियों पर निर्भर वयस्क भी मुख्य द्रव्य सेवन के
स्थान पर प्रतिनिधि द्रव्य से कार्य निर्वाह कर सकते हैं। इन तथ्यों पर
सम्यक् विचार कर ही कोई निर्णय करना श्रेयस्कर हो सकता है॥५६॥
प्रसङ्गाद् उपासकधर्मान् वक्तुमारभते
सर्वभूतैरविरोधः ॥५७॥
सर्वभूतैरविरोधः स्वमार्गगुप्त्यर्थम्। अन्यथा द्वेषेण एतदीयं दोषं
गुप्तरूपेण छद्मनाछद्मना वा दृष्ट्वा सभायां प्रकटं कुर्युः। अविरोधे
तादृशदोषान्वेषणयत्नं न कुर्युरीति भावः ॥५७॥
उपासक का यह सबसे प्रमुख कर्तव्य है कि, वह सभी प्राणियों से
समभाव और नेह रखे। सर्वत्र परमेश्वर की सत्ता का समादर करना ही इस सूत्र
का लक्ष्य है॥५७॥
ननु सर्वभूतैरविरोधेन वर्त्तमानेऽपि 'मक्षिकाव्रणमिच्छन्ति' इति न्यायेन
कश्चन द्वेषान्वेषणन्यायेन प्रवृत्तश्चेत् तत्र किं कार्यम्। अत आह
परिपन्थिषु निग्रहः ॥५८॥
तादृशदुर्जनुषु निग्रहः। यथा तन्नाशः स्यात् तथा वर्त्तितव्यम्। लौकिकेन
अलौकिकेन व्यापारेण तस्य निरासः कार्य इति भावः ॥५८॥
परिपन्थी विरोधी या शत्रुवत् व्यवहार करने वाले को कहते हैं। शास्त्र
इनसे लोहा लेने की बात करता है। अविरोध का यह तात्पर्य नहीं कि, अधर्मी
की दुष्प्रवृत्ति का उपासक विरोध ही न करे। वरन् इसे बलपूर्वक विरोध ही नहीं
अपि तु उसका निग्रह करे अर्थात् उसे दुष्प्रवृत्ति से रोककर उसे शासन में
रखने का प्रयत्न करे ॥५८॥

२५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवं परिपन्थिषु निग्रहं प्रदर्श्य भक्तिभूमिकामारुरुक्षूणां सेवादिना सम्यक्
श्रितानां प्रसादं सम्पादितवतामुपरि किं कार्यमित्याशङ्कायामाह
अनुग्रहः संश्रितेषु ।।५९।।
संश्रितेषु चिरकालं प्रसादयितेषु तेषु अनुग्रहः, विद्याप्रदानादिना तेषां
मनोरथपूरणं कर्तव्यमिति शेषः।।५९।।
सम्यक् रूप से आश्रित शिष्यवत् विनम्र और अनुशासित पर अनुग्रह
करना चाहिये।।५९।।
एवं गुरोधर्मानुक्त्वा प्राप्तविद्येन शिष्येण कथं वर्तितव्यम्? इति तं
प्रकारमाह
गुरुवद् गुरुपुत्रकलत्रादिषु वृत्तिः ।।६०।।
आदिपदेन गुरुपूज्यानां ग्रहणम्। या गुरौ वृत्तिः सा गुरुपुत्रे तत्पत्न्यां
च कार्या।।६०।।
गुरु के प्रति शिष्य की निष्ठा स्वाभाविक है। सारे शास्त्र इसका उपदेश
करते हैं। उसी तरह गुरु-पुत्र, गुरु-पत्नी, गुरु के भाई और गुरु द्वारा आदरणीय
व्यक्तियों के प्रति भी गुरु के समान ही व्यवहार करना चाहिये।।६०।।
'शिष्टैः सार्धम्' इति वाक्येन प्राप्तमादिमस्वीकारमनूद्य त्याज्यांशं विधत्ते
आदिमस्य स्वयं सेवनमागमदृष्ट्या दोषदं त्याज्यम् ।।६१।।
आगमस्तन्त्रादिः, तेषां दृष्ट्या यद् दोषदं तत् त्याज्यम्। पूर्वं कर्तृत्वेन
आदिमसेवनं कर्तव्यमिति तन्त्रे प्रतिपादितम्। तथापि तद् यद् दोषदं
तत्त्याज्यम्। अयं विषयो विस्तरशः प्राक् निरूपितोऽस्ति।।६१।।
आगम तन्त्र का ही पर्याय है। तन्त्रों की दृष्टि से भी मपञ्चक का आदिम
द्रव्य मद्य स्वयं दोषपूर्ण है। इसलिये इसका त्याग आवश्यक है। जो दोषपूर्ण
है, उसका परित्याग करना ही श्रेयस्कर माना जाता है। यद्यपि इसकी प्रमुखता
भी सिद्ध है, पर इसके गुण-दोष पर विचार कर उचित निर्णय करना चाहिये।

सर्वसाधारणक्रमः २५९
इस विषय में श्रीललिता-क्रम के सूत्र २२ में भी कुछ चर्चा की गयी है। वहाँ
भी देखना चाहिये ॥६१॥
अथ प्रसङ्गाद् आदिमं कीदृशं किं प्रकृतिकं ग्राह्यम्, इति पारिशिष्टा-
काङ्क्षायां वचनेन पूरयति
सानन्दस्य रुचिरस्यामोदिनो लघुनो वार्क्षस्य गौडस्य पिष्ट-
प्रकृतिनः अन्धसो वाल्कलस्य कौसुमस्य वा यथादेशसिद्धस्य वा
तस्य परिग्रहः ।।६२।।
द्रव्ये आनन्दसाहित्यजनकतासम्बन्धेन आनन्दविशिष्टत्वम्, आनन्दा-
विर्भावसाधनम्, रुचिरस्य यद्दर्शनमात्रेण मनःप्रसादस्तस्य। आमोदिनः
सुगन्धयुक्तस्य। लघुनो धातुवैषम्याजनकस्य।
अथ तत्प्रकृतीराह—वार्क्षस्येत्यादिना (वृक्ष + अण्)। वृक्षोद्भवस्य
गौडस्य गुडमयस्य, अन्धसः अन्नप्रकृतिकस्य। वाल्कलं वृक्षत्वक्सम्बन्धि।
कौसुमस्य मधूकादिपुष्पोद्भवस्य। यथादेशसिद्धस्य यस्मिन् देशे यद्यत्प्रकृतिकं
द्रव्यं तद्वा ग्राह्यमित्यर्थः। तस्य आदिमस्य द्रव्यस्य परिग्रहः। आदिमप्रतिनिधिः
अष्टगन्धादिकम् ।।६२।।
प्रसङ्गवश यह सोचना आवश्यक है कि, आदिम द्रव्य अर्थात् मद्य का
सेवन यदि आवश्यक हो, तो कैसी या किस प्रकृति की मदिरा सेवन की जा
सकती है? इसी का उत्तर देते हुए सूत्रकार कह रहे हैं कि—
१. यदि मद्य किसी पेड़-पौधे, वनस्पति आदि से निर्मित हो।
२. गुड़ से बनायी गयी हो।
३. ओषधियों या अन्नों को पीस कर उनसे तैयार की गयी है।
४. वृक्षों की छाल से निर्मित की गयी हो।
५. फूलों से महुवा के वृक्ष से चूने वाले फूलों से निर्मित हो।
६. देश के अनुकूल प्रभाव उत्पन्न करने वाली हो।
७. देखते ही मन प्रसन्न हो जाय ऐसी आनन्ददायिनी और मदमत्त न बनाकर
आनन्दविह्वल रखने में सक्षम हो। अष्टगन्ध आदि इसके प्रतिनिधि रूप माने
जाते हैं।

२६० परशुरामकल्पसूत्रम्
इस प्रकार के मद्य ग्रहण में किसी दोष की सम्भावना नहीं होती। इससे
सेवन करने वाले में धातुवैषम्य भी उत्पन्न नहीं होता।।२२।।
अथ द्वितीयतृतीयसम्पादनप्रकारमाह
तदनन्तरं मध्यमयोरस्वयमसुविमोचनम्। उपादिमे नायं नियमः।
मध्यमे तु स्वयं संज्ञापने तत्रायं मन्त्रः-
उद्बुध्यस्व पशो त्वं हि नाशिवस्त्वं शिवो ह्यसि।
शिवोत्कृत्तमिदं पिण्डं मत्तस्त्वं शिवतां व्रज।।इति।।६३।।
तदनन्तरं प्रथम समादानान्तरं मध्यमयोर्द्वितीयतृतीययोः। अस्वयम्
आत्मभिन्नम्। असुविमोचनं प्राणविमोचनं प्राणमोचनसाधनम्। कुर्यादिति शेषः।
द्वितीयतृतीयप्रकृतिभूतपशुप्राणवियोगं स्वयं न कुर्याद् इति फलितोऽर्थः।
अथान्यस्य संज्ञप्तुरभावे किं कार्यम्? तत्राह—
उपादिम इति। उपादिमस्य द्वितीयस्य असुविमोचनं स्वयमप्यन्याभावे
कुर्यात्। तृतीयस्य स्वयमसुविमोचने 'उद्बुध्यस्व' इति मन्त्रं पठित्वा
असुविमोचनं कुर्याद् इति भावः। भूचरं खेचरं चैव द्वितीयं द्विविधं भवेत्।
तृतीयप्रकृतिः— अथ तृतीयमुख्यभेदो योगिनीतन्त्रे—
मत्स्यः कूर्मश्च देवेशि तृतीयं द्विविधं भवेत्।
तदनुकल्पो रहस्यार्णवे—
संवित्संयुक्तं चणकपिष्टजं बटकं शिवे ।
मीनाकृतिकृतं वापि मूलकं वापि वा शिवे ।।
अलाभे तु तृतीयस्य द्वितीये त्र्यम्बकं यजेत् ।।
चतुर्थद्रव्यम्—
चणकोत्था माषजा वा मुद्राः स्युर्घृतपाचिताः।
पञ्चमप्रकारः—
पञ्चममुख्यस्य प्रकारस्त्रिविधः। तत्राद्यं दूतीजनरूपम्। तत्राधिकारिणः
सदाशिवादयः। द्वितीयं स्वयोषित्स्वेव।

सर्वसाधारणक्रमः २६१
रक्तं तु करवीरं वै तथा कृष्णापराजिता ।
एतत्प्रोक्तं लिङ्गयोन्योः पुष्पं तत्र तु योजयेत् ।।६३ ।। इति ।
पञ्चमकार सम्बन्धी अनुकल्पों की चर्चा यहाँ की गयी है। मकार 'म' अक्षर
आदि में आये द्रव्यों की क्रमिकता इस प्रकार है—
१. मद्य, २. मांस, ३. मत्स्य, ४. मुद्रा, ५. मैथुन।
१. मद्य का अनुकल्प अष्टगन्ध निर्मित द्रव्य है। काँस्य में नारिकेलोदक, ताम्रपात्र
में दूध, गुडमिश्र तक्र भी इसमें स्वीकृत हैं।
२. मांस—प्रथम सम्पादन के बाद द्वितीय और तृतीय पशु के प्राण का वियोग
स्वयं नहीं करना चाहिये। स्वयं सम्पादित करने पर उद्बुद्ध्यस्व मन्त्र का
प्रयोग करना चाहिये। मांस दो प्रकार के स्वीकृत हैं—१. भूचर, २. खेचर।
इन दोनों के न मिलने पर 'मालपूआ' चढा कर पूजा सम्पादित करनी
चाहिये।
३. मत्स्य—इसमें भी दो प्रकार हैं—१. मत्स्य और २. कूर्म अनुकल्पचने के
चूर्ण की मत्स्याकृति बाटी या 'बड़ी' अथवा 'मूली'।
४. मुद्रा—योगिनीतन्त्र के अनुसार चने से निर्मित अथवा माष से निष्पन्न विशेष
मुद्राकृति पदार्थ घी में पकाने पर इसका अनुकल्प बन जाते हैं। अङ्गुलि
मुद्रायें तो प्रसिद्ध हैं।
५. मैथुन— तीन प्रकार के स्वीकृत हैं—
१. दूती सम्बन्धी— इसमें सदाशिव स्तरीय योगिराज ही अधिकृत हैं।
२. दूत की पूजा और कुण्ड योनि में शुद्ध हवि का अर्पण करने से भी
सुफल। यह स्वपत्नी के साथ भी स्वीकृत है।
३. प्रार्थना करने पर शिष्या आदि के अनुकल्प लाल करवीर पुष्प और
अपराजिता पुष्प दोनों लिङ्ग योनि के प्रतीक हैं। वास्तविकता यह है
कि, इनमें भौतिक दृष्टि का अभाव होना आवश्यक है।।६३।।
अथ पूर्वोक्तावशिष्टाः कुलाचारधर्माः, तानाह सर्वत्र वचनपूर्व
प्रवृत्तिः ।।६४।।

२६२ परशुरामकल्पसूत्रम्
सर्वत्र कुलशास्त्रविहितक्रियासामान्ये अस्मिन् शास्त्रे विहितं किं
अविहितं किम् इति परिशोध्य सप्रमाणं कर्म अनुष्ठेयमिति भावः।।६४।।
वचन का अर्थ शास्त्रोक्त प्रमाण वाक्य है। उपासक विहित और अविहित
के सम्बन्ध में शास्त्र वचनों के आधार पर ही आचरण करे।।६४।।
अन्यं धर्ममाह
दशकुलवृक्षानुपप्लवः ।।६५।।
श्लेष्मातककरञ्जाम्रनिम्बाश्वत्थकदम्बका बिल्ववटोडुम्बरौ च तिन्तिण्या
सहिता दश। श्लेष्मातक (लिसोडे का वृक्ष) करञ्ज (ओषधिवृक्ष) आम्र (आम)
निम्ब (नीम) अश्वत्थ (पीपल) कदम्बक (कदम्ब) बिल्व (श्रीफल) वट
(बरगद) उदुम्बर (गूलर) ये दश वृक्ष कुल वृक्ष माने जाते हैं। इनका काटना
नितान्त निषिद्ध है।।६५।।
धर्मान्तरमाह
स्त्रीवृन्दादिमकलशसिद्धलिङ्गिक्रीडाऽऽकुलकुमारीकुलसहकारा-
शोकैकतरुपरेतावनिप्रमत्तवेश्याश्यामारक्तवसनामत्तेभानां दर्शने
वन्दनम्।।६६।।
स्त्रीवृन्दं सुवासिनीवृन्दं न तु विधवानाम्, सुवासिनी-कुमारीणां समूहं
मदिराघटम् इति तन्त्रान्तरवचनात्। आदिमकलशं मदिरापूर्णघटः। सिद्धाः
मन्त्रसिद्धिमन्तः, तेषां लिङ्गानि तच्छालीनः सिद्धलिङ्गिनः। क्रीडासु आकुलाः
व्यासक्ता कुमार्यस्तासां कुलं समूहः। सहकारः अतिसुगन्धिचूतः। अशोकः
प्रसिद्धः। एकतरुः। परेतावनिः श्मशानम्। मत्तवेश्या। श्यामा यौवनमध्यस्था
तारुण्यनिर्भरा। रक्तवसना। मत्तेभः प्रसिद्धः। एतेषां दर्शने वन्दनं नमनं
कुर्यात् ।।६६।।
सुवासिनी स्त्रियों का समूह, कुमारियों का समूह, मदिरा कलश, मन्त्रसिद्ध
योगियों के चिह्न, क्रीडाकुमारियाँ, आम, अशोक और 'एकतरु' नाम से प्रसिद्ध
एक विशेष वृक्ष, श्मशान, मदविह्वल वेश्या, पूर्ण-यौवना षोडशी और रक्तवस्त्र-

सर्वसाधारणक्रमः २६३
धारिणी युवती तथा मदमस्त हाथी देखकर परमेश्वर की कौतुकमयी सुरुचिपूर्ण
रचना का ध्यान कर इनका वन्दन करना चाहिये।।६६।।
अथ नैमित्तिक-पूजामाह
पञ्चपर्वसु विशेषार्चा ।।६७।।
पञ्चपर्वाणि १. कृष्णाष्टमी, २. कृष्णचतुर्दशी, ३. अमा, ४. पूर्णिमा,
५. सङ्क्रान्तिश्च। देवीभागवते यथा—
“कृष्णाष्टमी च तद्भूता पूर्णिमासंक्रमो रवेः। एतानि पञ्चपर्वाणि दुर्लभं
तत्र पूजनम्”। ‘पञ्चपर्वसु’ इति कथनात् पञ्चपर्वसु सूत्रानुयायिनः पूजन-
मावश्यकम्। दमनपवित्रारोपणाद्यकरणे न प्रत्यवायः। करणे अभ्युदय इति
सिद्धम् ।।६७।।
कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति मिलाकर
पाँच पर्व माने जाते हैं। देवीभागवत भी इसी मत का प्रतिपादन करता है।
कल्पसूत्रानुयायी उपासक इसकी अवश्यकरणीयता स्वीकार करते हैं ।।६७।।
अथैषां कुलधर्माणामनुष्ठानविधिं वक्तुं तदुपोद्घातभूतान् उल्लासान् विभजते
आरम्भतरुणयौवनप्रौढतदन्तोन्मनानवस्थोल्लासेषु प्रौढान्ताः
समयाचाराः। ततः परं यथा कामी। स्वैरव्यवहारेषु वीरावीरेष्व-
यथामननादधःपातः ।।६८।।
आरम्भः, तरुणः, यौवनः, प्रौढः, तदन्तः, उन्मनः, अनवस्थः,
उपासकस्य सप्त दशाविशेषाः। तत्र—
१. आरम्भो नाम उपासनाविषयकेच्छामात्रवत्त्वे सति तन्त्रशास्त्रा
नभिज्ञत्वम्।
२. सम्यग्गुरुं सम्पाद्य दीक्षितस्तदनन्तरं तन्त्रशास्त्रपिपठिषाशालित्वं
तस्योल्लासः।
३. ततस्तच्छास्त्रविषयकज्ञानवत्त्वं यौवनोल्लासः।

२६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
४. ततस्तच्छास्त्रविषयकतत्त्वज्ञानवत्त्वं सम्पाद्य शास्त्रप्रतिपादितध्यानंकर्तु-
मीहमानत्वं प्रौढोल्लासः।
५. तदिच्छानन्तरं किञ्चिदभ्यस्ते ध्यानवत्त्वे तदन्तोल्लासः।
६. ततो ध्यानेन कञ्चित्कालं मनोलयशक्तिमत्त्वमुन्मनोल्लासः।
७. पूर्णारूढत्वमनवस्थोल्लासः।
उपासकस्य निरुक्तोल्लासरूपा दशाविशेषाः स्वान्तःकरणैकवेद्याः। स्वयं
विद्वान् स्वीयां दशां सूक्ष्मधिया सम्यक् परिशोधयेत्। एवं परिशोध्य
तुरीयप्रौढोल्लासपर्यन्तं शास्त्रप्रथिताः समयाचाराः कार्याः। अत ऊर्ध्वं
यथाकामो विहरेद् इति भावः।
स्वैरव्यवहारेषु वीरावीरयोः अयथामननाद् याथाथ्र्यम् अविदित्त्वैव यदि
स्वैराचारी भवेत् तर्हि पतेदेव निरय इत्यर्थः ।।६८।।
आरम्भ, तरुण, यौवन, प्रौढ, तदन्त, उन्मना और अनवस्थ ये सात
उपासक के क्रमिक विकास की अवस्थायें हैं। आरम्भ में उपासनाविषयक इच्छा
होती है; किन्तु शास्त्र के प्रति अनभिज्ञता रहती है। तरुण उल्लास में गुरु
द्वारा दीक्षित होकर तन्त्रशास्त्र के पढ़ने की इच्छा उत्पन्न होती है। यौवन
उल्लास में तन्त्र के रहस्य का ज्ञान हो जाता है। ज्ञान-प्राप्ति के साथ शास्त्र
में प्रतिपादित ध्यान में प्रवृत्ति होना प्रौढोल्लास का लक्षण है। अभ्यासपूर्वक
पूर्ण ध्यानसत्ता का अनुसन्धान तदन्त में मनोलय की शक्ति उन्मना में आ जाती
है। पूरा आरूढ भाव हो जाना अवस्थाओं से भी ऊपर उठा देता है। यही
अनवस्थ उल्लास है।
प्रौढ तक समयाचार पालन आवश्यक माना जाता है। इसके बाद स्वतन्त्र
क्रियाशीलता का अधिकारी हो जाता है। उन्नत स्तर पर उपासक द्वारा अपनी
पहुँच बना लेने पर वीर वर्ग की अवमानना नहीं करनी चाहिये। इससे अधःपात
होने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है।।६८।।
अवशिष्टा उपासकधर्माः
रक्तात्यागविरक्ताऽऽक्रमणोदासीना प्रलोभनवर्जनम् ।।६९।।