परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐं क्लीं सौः बाला मन्त्र है। इसके बाद दो बार वद वद बोलना चाहिये।
तत्पश्चात् वाग् और वादिनि के बाद स्वाहा बोलने से यह मन्त्र बनता है। श्यामा
की अङ्गरूपा यह वाग्वादिनी विद्या कहलाती है।।३६।।
अथ श्यामाप्रत्यङ्गमाह
प्रणव ओपिनाकुदंपवृषसस्यै च शाचामाहदशब्दाः ष्ठाधानलीतैः
रितार्विर्व्वाईनारुमिवार्येच्छेखरा नकुली श्यामाप्रत्यङ्गम्।।३७।।
ओ इत्यारभ्य दान्ता ये शब्दा वर्णाः षोडश तेषां क्रमेण
ष्ठावर्णमारभ्य येत् इति पर्यन्तं षोडश वर्णाः शेखरे अग्रभागे येषां ते। इदं
दशब्दा इत्यस्य विशेषणम्। इत्थं च ओ इत्यारभ्य ये दवर्णान्ताः षोडश तेषां
क्रमेण एकैकवर्णस्याग्रे ष्ठादिषोडशसु वर्णेषु क्रमेणैकैकं पठेत्। यथा आदौ
प्रणवः ततः ओ ततः ष्ठा, ततः पि एवञ्च द्वात्रिंशदक्षयनकुली श्यामाप्रत्यङ्गं
भवतीति भावः।।३७।।
३२ अक्षरों वाली नकुली विद्या 'श्यामा' की प्रत्यङ्ग-विद्या की संरचना
का अद्भुत क्रम भगवान् परशुराम ने इस सूत्र में अपनाया है। पहले प्रणव का
प्रयोग करना चाहिये। इसके बाद 'ओ' से लेकर 'द' तक सोलह शब्दों में से
एक-एक के साथ ष्ठा से लेकर येत् तक के सोलह अक्षरों में से एक-एक
को जोड़ना चाहिये। जैसे—प्रणव + ओ + ष्ठा + पि + धा + ना + न + कु
ली + दं + तैः + आदि। इसी तरह एक इस षोडश भाग से एक वर्ण और फिर
दूसरे षोडश भाग क्रमिक वर्ण मिलाने से पूरी विद्या बन जाती है।।३७।।
श्यामापादुकामाह
ललितापादुकादित्रिकस्थाने कुमारी योज्या शिष्टं तद्वद् इति
श्यामापादुका च।।३८।।
ललितापादुका या उद्धृता पूर्वं श्रीपादुकेति तस्याः प्रथमबीजत्रयस्थाने
बाला योज्या। शेषं पूर्ववत्। इयं श्यामापादुका।।३८।।
ललितापादुका मन्त्रविद्या में श्रीपादुका शब्द के पहले के तीन बीजों के
स्थान पर इसमें बाला मन्त्र लगा लेते हैं। वही मन्त्र श्यामापादुका मन्त्र बन
जाता है।।३८।।