परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
श्यामापादुका के पहले तीन शब्दों के स्थान पर त्रितारी, कुमारी ऐं ग्लौं
जोड़ने से यह मन्त्र बनता है।।४८।।
इमां लोकप्रवृत्तसर्वोत्तमज्ञानाय स्तौति
इयं महापादुका सर्वमन्त्रसमष्टिरूपिणी स्वैक्यविमर्शिनी
महासिद्धिप्रदायिनी द्वादशान्ते यष्टव्या ।।४९।।
सर्वमन्त्रसमष्टिरूपिणी सर्वमन्त्रैः प्रत्येकं यद्यत् साध्यं फलं तत्सर्वमनेनैव
साधितुं शक्यमिति भावः। एवम् इहलोके क्षुल्लकफलसाधनत्वमुक्त्वा
साध्याणिमादिसाधनत्वमप्यस्तीत्याह—महासिद्धिप्रदायिनीति। महासिद्धयोऽ-
णिमादयः। एवं कृत्रिमपुरुषार्थसाधनत्वमुक्त्वा परमपुरुषार्थसाधनत्वमप्याह—
स्वैक्येति। स्वैक्यविमर्शो ब्रह्मात्मैक्यज्ञानं जनकतासम्बन्धेन तद्वती।
ब्रह्मात्मैक्यविमर्शाभासनरूपा, अविद्यालयकर्त्रीति यावत् ।।४९।।
महापादुका मन्त्र की इस सूत्र में प्रशंसा की गयी है। उसके दो महत्त्वपूर्ण
फल हैं—
१. यह ब्रह्मतादात्म्य का विमर्श प्रदान करती है। वृत्तिकार ने विमर्श का अर्थ
ज्ञान लिखा है। वस्तुतः स्वात्मैक्यविमर्श ज्ञान से ऊपर की आनुभूतिक
स्फुरत्ता की आनन्ददायिका स्थिति का प्रतीक है।
२. अणिमादि सभी सिद्धियों को प्रदान करती है। वृत्तिकार ने स्वैक्यविमर्श के बाद
महासिद्धि की बात को असङ्गत माना है। वस्तुतः पहले साधकों के लिये
सर्वोत्तम फल की चर्चा की गयी है। पुनः भोगेच्छुओं के लिये सामान्येतर
सांसारिक फल की भी चर्चा है। अतः सङ्गति का व्यतिरेक नहीं है।
इसका एक तीसरा गुण यह है, कि यह सभी मन्त्रों की समष्टिरूपा विद्या
है। अतः साधक इसे द्वादशान्त में भावन करें और तादात्म्य में अवस्थित होने
का आनन्द लें।।४९।।
एवं रश्मिमालामन्त्रकलापमुक्त्वा यथोक्तस्थानेषु उत्तररश्मिमालाध्यानकर्त्तारं
प्रशंसति
एवं रश्मिमाला सम्पूर्णा। सर्वगात्रः शुद्धविद्यामयतनुः स एव
परमशिवः ।।५०।।