परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ परशुरामकल्पसूत्रम्
३. संहर संहर विघ्नरक्षोविभीषिकान् कालय हुं फट् स्वाहा।
४. ब्लूं रक्ताभ्यो योगिनीभ्यो नमः।
५. सां सारसाय बह्वाशनाय नमः।
६. दुमुलुपुमुलुपु ह्रीं चामुण्डायै नमः।
ये मन्त्र ललिता जप में आने वाले विघ्नों के हरण करने वाले देवता
हैं॥५१॥
श्यामाविघ्नहरमन्त्रमाह
हसन्ति हसितालापे मातमुक्त्वा गीपरिचारिके मम भयविघ्न-
नाशं कुरुद्वितयं सविसर्गठत्रयमिति श्यामाविघ्नदेवी ॥५२॥
हसन्तीत्यारभ्य नाशमिति पर्यन्तं पदं उक्त्वेत्यंशमपहाय। शेषं समानम्।
नाशम् इत्येतदुत्तरं कुरुद्वयम्। ततः सविसर्गठत्रितयं पठेत्। इयं हसन्ती विद्या
श्यामा जपाङ्गम् ॥५२॥
श्यामा मन्त्र जप में आने वाले विघ्नों को दूर करने वाली इस विद्या
का नाम हसन्ती विद्या है। इसका मन्त्र—'हसन्ति हसितालापे मातङ्गिपरिचारिके
मम भयविघ्ननाशं कुरु कुरु ठः ठः ठः' इस प्रकार का है। श्यामा मन्त्र जप
से पहले इसका जप कर लेना चाहिये ॥५२॥
अथ वाराहीविघ्नहरविद्यामाह
स्तं स्तम्भिन्यै नमः इति कोलमुखीविघ्नदेवी ॥५३॥
यथाश्रुतं स्पष्टम् ॥५३॥
वाराही मन्त्र जप के पूर्व विघ्नविनाशिनी इस विद्या का जप करना चाहिये।
इसका स्वरूप सूत्र में स्पष्ट इस प्रकार है—
'स्तं स्तम्भिन्यै नमः'।
इसे वाराही विघ्नदेवी कहते हैं॥५३॥
एतेषां तत्तज्जपाव्यवहितप्राक्कालेन सम्बन्धं दर्शयति
एते तत्तज्जपारम्भे जप्तव्याः ॥५४॥