सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 300

२५८ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवं परिपन्थिषु निग्रहं प्रदर्श्य भक्तिभूमिकामारुरुक्षूणां सेवादिना सम्यक्
श्रितानां प्रसादं सम्पादितवतामुपरि किं कार्यमित्याशङ्कायामाह
अनुग्रहः संश्रितेषु ।।५९।।
संश्रितेषु चिरकालं प्रसादयितेषु तेषु अनुग्रहः, विद्याप्रदानादिना तेषां
मनोरथपूरणं कर्तव्यमिति शेषः।।५९।।
सम्यक् रूप से आश्रित शिष्यवत् विनम्र और अनुशासित पर अनुग्रह
करना चाहिये।।५९।।
एवं गुरोधर्मानुक्त्वा प्राप्तविद्येन शिष्येण कथं वर्तितव्यम्? इति तं
प्रकारमाह
गुरुवद् गुरुपुत्रकलत्रादिषु वृत्तिः ।।६०।।
आदिपदेन गुरुपूज्यानां ग्रहणम्। या गुरौ वृत्तिः सा गुरुपुत्रे तत्पत्न्यां
च कार्या।।६०।।
गुरु के प्रति शिष्य की निष्ठा स्वाभाविक है। सारे शास्त्र इसका उपदेश
करते हैं। उसी तरह गुरु-पुत्र, गुरु-पत्नी, गुरु के भाई और गुरु द्वारा आदरणीय
व्यक्तियों के प्रति भी गुरु के समान ही व्यवहार करना चाहिये।।६०।।
'शिष्टैः सार्धम्' इति वाक्येन प्राप्तमादिमस्वीकारमनूद्य त्याज्यांशं विधत्ते
आदिमस्य स्वयं सेवनमागमदृष्ट्या दोषदं त्याज्यम् ।।६१।।
आगमस्तन्त्रादिः, तेषां दृष्ट्या यद् दोषदं तत् त्याज्यम्। पूर्वं कर्तृत्वेन
आदिमसेवनं कर्तव्यमिति तन्त्रे प्रतिपादितम्। तथापि तद् यद् दोषदं
तत्त्याज्यम्। अयं विषयो विस्तरशः प्राक् निरूपितोऽस्ति।।६१।।
आगम तन्त्र का ही पर्याय है। तन्त्रों की दृष्टि से भी मपञ्चक का आदिम
द्रव्य मद्य स्वयं दोषपूर्ण है। इसलिये इसका त्याग आवश्यक है। जो दोषपूर्ण
है, उसका परित्याग करना ही श्रेयस्कर माना जाता है। यद्यपि इसकी प्रमुखता
भी सिद्ध है, पर इसके गुण-दोष पर विचार कर उचित निर्णय करना चाहिये।