परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २५५
संख्याया अनुक्तत्वात् जपात् पूर्वं सकृत्पाठः ।।५४।।
विघ्नहर जपनीय मन्त्रों की संख्या नहीं दी गयी है। वृत्तिकार के अनुसार
मात्र एक-एक बार उच्चारण ही पर्याप्त है।।५४।।
अथ ललितादि-परान्तानां जपकालमाह
ललिता प्राह्ने। अपराह्ने श्यामा। वार्त्ताली रात्रौ। ब्राह्मे मुहूर्त्ते
परा।।५५।।
प्राह्नः सूर्यपरावृत्तिप्राक्कालः। अपराह्नः परावृत्त्यपरभागः। तयोर्मध्यः
अतिसूक्ष्मः कालो मध्याह्नः। 'प्राह्नापराह्नमध्याह्नाः' इति कोशात्। अस्तोत्तरम्
अर्धयाममुदयात् प्रागर्धयामं चापहाय शेषं यामत्रयं रात्रिपदवाच्यम्। अत एव
रात्रिस्रियामा इति पर्यायोऽपि कोशेऽस्ति। ब्राह्मो मुहूर्त्तः प्रागुक्तः।।५५।।
सूर्य का रात्रि के बाद परावर्त्तन ही परावृत्ति काल है, अर्थात् सूर्योदय
होने के समय ललिता मन्त्र जप करना चाहिये। श्यामा का मन्त्र जप मध्याह्न
के बाद अर्थात् अपराह्न में करना उचित है। वार्त्ताली का जप रात्रि में होना
चाहिये। रात्रि का जप समय तीन पहर की रात्रि से नहीं, अपि तु निशीथ सन्ध्या
समय से लेना उचित है, परामन्त्र जप सर्वदा ब्राह्म मुहूर्त्त में करना चाहिये।
'रात्रेश्च पश्चिमे यामे मुहूर्त्तो ब्राह्म उच्यते' के अनुसार रात्रि का अन्तिम भाग
उषःकाल समेत ब्राह्ममुहूर्त्त में परिगणित है ।।५५।।
श्रीनित्यापूजायां मपञ्चकप्रतिनिधिना पूजनं मुख्यालाभे उक्तम्। इदानीं
प्रतिनिध्यादरे अन्यानपि हेतूनाह
व्यवहारदेशस्वात्म्यप्राणोद्वेगसहायामयवयांसि प्रविचार्यैव
तदनुकूलः पञ्चमादिपरामर्शः ।।५६।।
व्यवहारः पूजाऽव्यवहितोत्तरकाले पशुजनैः सह कर्तव्यो लौकिक
आवश्यकः कार्यविशेषः। तत्तद्द्रव्यसेवनाव्यवहितोत्तरं तद्विकारं दृष्ट्वा पशव
एनं दूषयेयुः। क्रतावश्यकं रहस्यं भिद्येत। अतः प्रतिनिधिसेवनमिति
भावः।