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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 320 में से

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पृष्ठ 293

सर्वसाधारणक्रमः २५१
अस्या वाराह्या अयं इदमीयः। मनुः मन्त्रः। प्रथमं ऐं, ततः ग्लौं, ततः
ऐं इति तदर्थः। ततो नेत्यारभ्य वान्ता ये वर्णास्तेषु क्रमेणैकैकवर्णोत्तरं मो
इत्यारभ्य श्यं इति वर्णान्ताः क्रमेण पूर्ववद् एकैकान् पठेत्। एवं ग्रथनपूर्वकं
वश्यंपर्यन्तं पठित्वा। ततो वाक् ऐं। ततो ग्लौं पठित्वा इति। ततश्चवर्णात्
सप्तमा ठकारा विसृष्ट्यन्ताश्चत्वारः पठित्वा। वर्म हुम्। ततो अस्त्राय फट्
इति पठेत्। इयं वाराही-विद्या। द्वादशोत्तरशताक्षरी ज्ञेया।।४६।।
पूर्वपरिपाटी अपनाकर मन्त्र की गोपनीयता का प्रदर्शन इस सूत्र में भी
है। सूत्रोक्त ग्लौं के बाद के सभी अक्षरों में 'यथाक्रमं' के बाद पठित मोसेश्यं
तक के एक-एक के साथ एक को जोड़ने से पूरा मध्यगत मन्त्र अभिव्यक्त हो
जाता है। उसके बाद च से सातवें चार ठकार विसर्ग सहित बोलने के बाद
हुं अस्त्राय फट् लगाकर मन्त्र पूरा करते हैं। यह एक सौ बारह अक्षरों का मन्त्र
है।।४६।।
अथ ब्रह्मरन्ध्रे यष्टव्यां श्रीपूर्त्तिविद्यामाह
पञ्चमैकादशबीजवर्ज्जा श्रीरेव श्रीपूर्त्तिविद्या ब्रह्मकोटरे
यष्टव्या ।।४७।।
पूर्वं मादनशक्त्यादिना दर्शिता या श्रीविद्या तस्यां यः पञ्चम एकादशश्च
वर्णो मायाबीजं तावपहाय श्रीविद्यैवोर्वरिता श्रीपूर्त्तिविद्या। सा ब्रह्मकोटरे
ब्रह्मरन्ध्रे ध्येयेति यावत् ।।४७।।
सूत्र ३४ में मूल श्रीविद्या की विद्या का कूट विधि से उल्लेख किया
गया है। वही विद्या श्रीपूर्त्तिविद्या हो जाती है। उसमें कुछ परिवर्तन भी कर देते
हैं। पाँचवें और ग्यारहवें वर्णों का परित्याग कर देने से ही यह अन्तर हो जाता
है। इसका ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिये।।४७।।
महापादुका
श्यामापादुका प्रथमत्रिकस्थाने तारत्रयं कुमारी वाक् ग्लौं इति
योज्यम्। ततः परस्तात्। शेषं समानम् ।।४८।।
स्पष्टम् ।।४८।।