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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

२६४ परशुरामकल्पसूत्रम्
४. ततस्तच्छास्त्रविषयकतत्त्वज्ञानवत्त्वं सम्पाद्य शास्त्रप्रतिपादितध्यानंकर्तु-
मीहमानत्वं प्रौढोल्लासः।
५. तदिच्छानन्तरं किञ्चिदभ्यस्ते ध्यानवत्त्वे तदन्तोल्लासः।
६. ततो ध्यानेन कञ्चित्कालं मनोलयशक्तिमत्त्वमुन्मनोल्लासः।
७. पूर्णारूढत्वमनवस्थोल्लासः।
उपासकस्य निरुक्तोल्लासरूपा दशाविशेषाः स्वान्तःकरणैकवेद्याः। स्वयं
विद्वान् स्वीयां दशां सूक्ष्मधिया सम्यक् परिशोधयेत्। एवं परिशोध्य
तुरीयप्रौढोल्लासपर्यन्तं शास्त्रप्रथिताः समयाचाराः कार्याः। अत ऊर्ध्वं
यथाकामो विहरेद् इति भावः।
स्वैरव्यवहारेषु वीरावीरयोः अयथामननाद् याथाथ्र्यम् अविदित्त्वैव यदि
स्वैराचारी भवेत् तर्हि पतेदेव निरय इत्यर्थः ।।६८।।
आरम्भ, तरुण, यौवन, प्रौढ, तदन्त, उन्मना और अनवस्थ ये सात
उपासक के क्रमिक विकास की अवस्थायें हैं। आरम्भ में उपासनाविषयक इच्छा
होती है; किन्तु शास्त्र के प्रति अनभिज्ञता रहती है। तरुण उल्लास में गुरु
द्वारा दीक्षित होकर तन्त्रशास्त्र के पढ़ने की इच्छा उत्पन्न होती है। यौवन
उल्लास में तन्त्र के रहस्य का ज्ञान हो जाता है। ज्ञान-प्राप्ति के साथ शास्त्र
में प्रतिपादित ध्यान में प्रवृत्ति होना प्रौढोल्लास का लक्षण है। अभ्यासपूर्वक
पूर्ण ध्यानसत्ता का अनुसन्धान तदन्त में मनोलय की शक्ति उन्मना में आ जाती
है। पूरा आरूढ भाव हो जाना अवस्थाओं से भी ऊपर उठा देता है। यही
अनवस्थ उल्लास है।
प्रौढ तक समयाचार पालन आवश्यक माना जाता है। इसके बाद स्वतन्त्र
क्रियाशीलता का अधिकारी हो जाता है। उन्नत स्तर पर उपासक द्वारा अपनी
पहुँच बना लेने पर वीर वर्ग की अवमानना नहीं करनी चाहिये। इससे अधःपात
होने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है।।६८।।
अवशिष्टा उपासकधर्माः
रक्तात्यागविरक्ताऽऽक्रमणोदासीना प्रलोभनवर्जनम् ।।६९।।