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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

२४६ परशुरामकल्पसूत्रम्
बाला से लेकर इन चारों से युक्त मूलविद्या का मूलाधार में भावन करना
चाहिये।।३३।।
मूलविद्यामाह
मादनशक्तिबिन्दुमालिनीवासवमायाघोषदोषाकरकन्दर्पगगन-
मघवद्भुवनभृगुपुष्पबाणभूमायेति सेयं तस्या महाविद्या ।।३४।।
तस्याः साम्राज्ञीनामिकायाः।।३४।।
सूत्रोक्त कूटशब्द— 'मादन; शक्ति, बिन्दु, मालिनी, वासव, माया, घोष,
दोषाकर, कन्दर्प, गगन, मघवद्, भुवन, भृगु, पुष्पबाण, भू, माया' इन सोलह
कूटों के माध्यम से मूलविद्या का कथन किया गया है। वृत्तिकार ने इसकी
व्याख्या न कर इसकी गोपनीयता को ही बल प्रदान किया है। अर्थात् यह विद्या
गुरु द्वारा ही ग्राह्य होनी चाहिये। पुस्तक से कदापि नहीं। इसे साम्राज्ञी श्रीविद्या
की मूलविद्या मानते हैं।।३४।।
अङ्गादियुक्ता श्यामाविद्या, अथ हृच्चक्रे ध्येयश्यामाऽङ्गविद्यामाह
वाङ्न