सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 320 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

सर्वसाधारणक्रमः २४५
श्रीपादुकां तुरीयमाह
तारित्रिकं सप्तममुद्रा शिव-शक्ति-संवर्त्त-पुपञ्चम-पुरन्दरवरयूं,
शक्तिशिवक्षमान्ते वादिवरयीं शिवभृगुत्रिशूल-बिन्दु-भृगुशिव-
त्रिशूलविसृष्टयः, श्रीपूर्वं स्वगुरुनामतोऽष्टाक्षरी चेति पादुका
च ।। ३२ ।।
तारित्रिकं त्रितारी। सप्तममुद्रा बीजम्। शिवः हः, शक्तिः सः, संवर्त्तः
क्षः, पुपञ्चमो मकारः। पुरन्दरो लः। ततो वरयूं, ततः शक्तिः, सः शिवः,
हः क्षमौ, अन्ते वादिः, वात् पूर्ववर्णो मातृकासु लः, ततो वरयीं ततः शिवः
हः, भृगुः सः, त्रिशूलम् औ, बिन्दुः हसौः, इति सम्पन्नम्। भृगुशिवत्रिशूला
उक्ताः। विसृष्टिः विसर्गः। ततः स्वगुरोर्दीक्षा नाम। ततः श्रीपादुकां
इत्यष्टाक्षरमन्त्रः। अष्टाक्षरे आदौ यः श्रीवर्णस्तस्य पूर्वं श्रीगुरोर्नाम इत्यर्थः।
एषा श्रीपादुका।। ३२ ।।
यह सूत्र श्रीपादुका मन्त्र का प्रवर्त्तक है। इसमें बहुतलतया कूट शब्दों का
प्रयोग किया गया है। मन्त्रों को सुगुप्त रखने की यह एक परिपाटी है। क्रमशः
कूटों से मन्त्र इस प्रकार का बनता है—
१. तारित्रिक = त्रितारी = ऐं ह्रीं श्रीं, २. सप्तममुद्रा = खेचरी = हस्ख्फ्रे,
३. शिव = ह, ४. शक्ति = स, ५. संवर्त्त = प्रलयनाम = क्ष, ६. पु = पवर्ग का
पञ्चम = म, ७. पुरन्दर = ल, ८. वरयूं, ९. शक्ति = स, १०. शिव = ह,
११. क्ष, १२. म, १३. रादि व का आदिवर्ण ल, १४. वरयीं,
१५. शिव = ह, १६. भृगु = स, १७. त्रिशूल और १८. बिन्दु = हसौँ,
१९-२०-२१-२२. विसृष्टि = विसर्ग स्हौः, २३. अपने गुरु का दीक्षा नाम,
२४. श्रीपादुकां पूजयामि नमः। सबको मिलाकर बोलने से पूर्ण श्रीपादुका मन्त्र
बनता है। इसका पूरा नाम श्रीविद्यागुरुपादुका मन्त्र है।।३२।।
एताभिश्चतसृभिर्युक्ता मूलविद्या साम्राज्ञी मूलाधारे
विलोचनीया ।। ३३ ।।
बालादि चतसृभिर्युक्ता मूलविद्या वक्ष्यमाणा मूलाधारे
विलोचनीया।। ३३ ।।