परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २५९
इस विषय में श्रीललिता-क्रम के सूत्र २२ में भी कुछ चर्चा की गयी है। वहाँ
भी देखना चाहिये ॥६१॥
अथ प्रसङ्गाद् आदिमं कीदृशं किं प्रकृतिकं ग्राह्यम्, इति पारिशिष्टा-
काङ्क्षायां वचनेन पूरयति
सानन्दस्य रुचिरस्यामोदिनो लघुनो वार्क्षस्य गौडस्य पिष्ट-
प्रकृतिनः अन्धसो वाल्कलस्य कौसुमस्य वा यथादेशसिद्धस्य वा
तस्य परिग्रहः ।।६२।।
द्रव्ये आनन्दसाहित्यजनकतासम्बन्धेन आनन्दविशिष्टत्वम्, आनन्दा-
विर्भावसाधनम्, रुचिरस्य यद्दर्शनमात्रेण मनःप्रसादस्तस्य। आमोदिनः
सुगन्धयुक्तस्य। लघुनो धातुवैषम्याजनकस्य।
अथ तत्प्रकृतीराह—वार्क्षस्येत्यादिना (वृक्ष + अण्)। वृक्षोद्भवस्य
गौडस्य गुडमयस्य, अन्धसः अन्नप्रकृतिकस्य। वाल्कलं वृक्षत्वक्सम्बन्धि।
कौसुमस्य मधूकादिपुष्पोद्भवस्य। यथादेशसिद्धस्य यस्मिन् देशे यद्यत्प्रकृतिकं
द्रव्यं तद्वा ग्राह्यमित्यर्थः। तस्य आदिमस्य द्रव्यस्य परिग्रहः। आदिमप्रतिनिधिः
अष्टगन्धादिकम् ।।६२।।
प्रसङ्गवश यह सोचना आवश्यक है कि, आदिम द्रव्य अर्थात् मद्य का
सेवन यदि आवश्यक हो, तो कैसी या किस प्रकृति की मदिरा सेवन की जा
सकती है? इसी का उत्तर देते हुए सूत्रकार कह रहे हैं कि—
१. यदि मद्य किसी पेड़-पौधे, वनस्पति आदि से निर्मित हो।
२. गुड़ से बनायी गयी हो।
३. ओषधियों या अन्नों को पीस कर उनसे तैयार की गयी है।
४. वृक्षों की छाल से निर्मित की गयी हो।
५. फूलों से महुवा के वृक्ष से चूने वाले फूलों से निर्मित हो।
६. देश के अनुकूल प्रभाव उत्पन्न करने वाली हो।
७. देखते ही मन प्रसन्न हो जाय ऐसी आनन्ददायिनी और मदमत्त न बनाकर
आनन्दविह्वल रखने में सक्षम हो। अष्टगन्ध आदि इसके प्रतिनिधि रूप माने
जाते हैं।