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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 298

२५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवं यस्मिन् देशे द्रव्यसेवनेन धातुवैषम्यजनितः शरीरविकारस्तत्र
प्रतिनिध्याश्रयः। अयं द्वितीयो हेतुः। एवं समीचीनश्चासावात्मा च स्वात्मा।
स्वात्मनो भावः स्वात्म्यम्। तत्त्वं च सात्त्विकवृत्तिमत्त्वम्।
प्राणोद्वेगः सहनशक्तिः। सहायाः प्रसिद्धाः। आमयो रोगः। वयांसि
बालादिः। एतानि सर्वाणि पञ्चमादिपरिग्रहे अनुकूलानि, उत प्रतिकूलानि इति
प्रविचार्य सम्यग्विचार्य अनुकूलत्वयाथार्थ्यग्रह एव मुख्यपञ्चमादि परिग्रहः।
अन्यथा प्रतिनिधिनैव नित्यक्रमविमृष्टिरिति भावः।।५६।।
मपञ्चक के प्रतिनिधि द्रव्यों से पूजन किया जा सकता है। इसके अन्य
कई कारण प्रस्तुत कर रहे हैं—
१. व्यवहार—पूजा के तत्काल बाद सांसारिक व्यक्तियों की सामाजिकता का
निर्वाह करते हुए आवश्यक कार्य निर्वाह ही व्यवहार कहलाता है। इस दृष्टि
से प्रतिनिधि का प्रयोग अपेक्षित है। कहीं कोई इस सम्बन्ध में दूषण की
बात न करे।
२. देश—देश का प्रभाव भी विचारणीय है। द्रव्य सेवन का प्रभाव अक्षांश,
देशान्तर की दूरियों पर बहुत पड़ता है। इससे धातुदोष भी उत्पन्न हो जाते
हैं। शरीर में विकार उत्पन्न हो जाते हैं। अतः इस दृष्टि से भी प्रातिनिध्य
स्वीकरणीय है।
३. स्वात्म्य—आत्मा का स्तर भी विचारणीय है। आत्मा आवरण से जितना
आवृत/अनावृत होता है, उतना ही मनुष्य की प्रवृत्तियाँ निवृत्ति की
स्तरीयता प्रकट करती हैं। आत्मा को मन भी कहते हैं। मन भी बन्ध
और मोक्ष का कारण बनता है। यह मनोभाव पर निर्भर करता है कि,
उस साधक का मन मुख्य द्रव्य या प्रतिनिधि द्रव्य से कितनी परतृप्ति
का अनुभव कर रहा है। वस्तुतः सात्त्विक वृत्ति का ही महत्त्व होना
चाहिये।
४. प्राणोद्वेग—प्राण में द्रव्य सेवन का कितना बल है। कितनी सहनशीलता
है। यह अवश्य विचारणीय है।