परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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५. सहाय—वृत्तिकार ने प्रसिद्ध लिखकर इसे टाल दिया है। वस्तुतः इस क्रिया
में गुरु, शिष्य, मित्र, परिवार, समाज सब की सदाशयता आवश्यक होती है।
६. आमय—रोग को कहते हैं। रोगी क्या सेवन करे क्या न करे; इसका निर्णय
चिकित्सक कर सकता है, पूजा-प्रबन्धक नहीं।
७. वय—उम्र या अवस्था का ध्यान रखना भी आवश्यक है। बालक, वृद्ध,
आतुर और विशेष परिस्थितियों पर निर्भर वयस्क भी मुख्य द्रव्य सेवन के
स्थान पर प्रतिनिधि द्रव्य से कार्य निर्वाह कर सकते हैं। इन तथ्यों पर
सम्यक् विचार कर ही कोई निर्णय करना श्रेयस्कर हो सकता है॥५६॥
प्रसङ्गाद् उपासकधर्मान् वक्तुमारभते
सर्वभूतैरविरोधः ॥५७॥
सर्वभूतैरविरोधः स्वमार्गगुप्त्यर्थम्। अन्यथा द्वेषेण एतदीयं दोषं
गुप्तरूपेण छद्मनाछद्मना वा दृष्ट्वा सभायां प्रकटं कुर्युः। अविरोधे
तादृशदोषान्वेषणयत्नं न कुर्युरीति भावः ॥५७॥
उपासक का यह सबसे प्रमुख कर्तव्य है कि, वह सभी प्राणियों से
समभाव और नेह रखे। सर्वत्र परमेश्वर की सत्ता का समादर करना ही इस सूत्र
का लक्ष्य है॥५७॥
ननु सर्वभूतैरविरोधेन वर्त्तमानेऽपि 'मक्षिकाव्रणमिच्छन्ति' इति न्यायेन
कश्चन द्वेषान्वेषणन्यायेन प्रवृत्तश्चेत् तत्र किं कार्यम्। अत आह
परिपन्थिषु निग्रहः ॥५८॥
तादृशदुर्जनुषु निग्रहः। यथा तन्नाशः स्यात् तथा वर्त्तितव्यम्। लौकिकेन
अलौकिकेन व्यापारेण तस्य निरासः कार्य इति भावः ॥५८॥
परिपन्थी विरोधी या शत्रुवत् व्यवहार करने वाले को कहते हैं। शास्त्र
इनसे लोहा लेने की बात करता है। अविरोध का यह तात्पर्य नहीं कि, अधर्मी
की दुष्प्रवृत्ति का उपासक विरोध ही न करे। वरन् इसे बलपूर्वक विरोध ही नहीं
अपि तु उसका निग्रह करे अर्थात् उसे दुष्प्रवृत्ति से रोककर उसे शासन में
रखने का प्रयत्न करे ॥५८॥