परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० परशुरामकल्पसूत्रम्
'ॐ नमो भगवति तिरस्करिणि! महामाये पशुजनमनश्चक्षुस्तिरस्करणं
कुरु कुरु हुं फट् स्वाहा' यह तिरस्करिणी विद्या देवी की प्रत्यङ्गविद्या
है।।४३।।
अथ वाराहीपादुकां दर्शयति
श्यामापादुका मन्त्रादित्रीबीजमपहाय वाग्ग्लौम् इति योज्यम्
एषा वार्त्तालीपादुका ।।४४।।
श्यामापादुकाया आदिबीजत्रयमपसार्य तत्स्थाने ऐं ग्लौम् इति पठित्वा
शेषम् अधिकृतं पठेत्। इयं वाराहीपादुका भवति।।४४।।
श्यामापादुका मन्त्र के आदि बीजत्रय 'ऐं ह्रीं श्रीं' को छोड़कर 'वाक् ऐं'
के साथ 'ग्लौं' जोड़ देने से वही मन्त्र वाराहीपादुका मन्त्र बन जाता है।।४४।।
विद्याभिरेताभिर्युक्तफालचक्रे परिपूज्या भगवतीयं
भूदारमुखी ।।४५।।
एताभिरुक्ताभिर्विद्याभिर्युक्ता भूदारमुखी वाराही तद्विद्येत्यर्थः। सा
फालचक्रे आज्ञायां परिपूज्या ध्येयेत्यर्थः।।४५।।
आज्ञाचक्र में अङ्गादि विद्याओं से युक्ता वाराही विद्या का ध्यान करना
चाहिये। इससे वाराही विद्या देवी प्रसन्न होती है।।४५।।
अथ वाराहीविद्यामाह
मनुरिदमीयोऽयं वाक्पुटितं ग्लौं न भ व वा र्त्ता वा हि रा
व ह खि रा मु अं अं नि मः धेधि न जं जं नि मः हे हि नस्तं
स्तं नि मः र्वष्ट दु नां वें स वा क त्त क्षु ख ति ह्ला भ कु कु
शी व शब्दाः यथाक्रमं मो ग ति र्त्ता वा लि रा वा हि रा मु व
ह खि धे धि न रुं रुं नि भः भे भि न मो मो नि मः भे भि
न सदुप्र ष्टा स षां र्व चि च मु र्ग जि स्तं नं रु रु भ्रं श्यं शब्दोपेता
वाग् ग्लौं विसृष्ट्यन्ताश्च सप्तमाश्चत्वारो वर्मास्त्राय फडिति
द्वादशोत्तरशताक्षरा ।।४६।।