परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २६१
रक्तं तु करवीरं वै तथा कृष्णापराजिता ।
एतत्प्रोक्तं लिङ्गयोन्योः पुष्पं तत्र तु योजयेत् ।।६३ ।। इति ।
पञ्चमकार सम्बन्धी अनुकल्पों की चर्चा यहाँ की गयी है। मकार 'म' अक्षर
आदि में आये द्रव्यों की क्रमिकता इस प्रकार है—
१. मद्य, २. मांस, ३. मत्स्य, ४. मुद्रा, ५. मैथुन।
१. मद्य का अनुकल्प अष्टगन्ध निर्मित द्रव्य है। काँस्य में नारिकेलोदक, ताम्रपात्र
में दूध, गुडमिश्र तक्र भी इसमें स्वीकृत हैं।
२. मांस—प्रथम सम्पादन के बाद द्वितीय और तृतीय पशु के प्राण का वियोग
स्वयं नहीं करना चाहिये। स्वयं सम्पादित करने पर उद्बुद्ध्यस्व मन्त्र का
प्रयोग करना चाहिये। मांस दो प्रकार के स्वीकृत हैं—१. भूचर, २. खेचर।
इन दोनों के न मिलने पर 'मालपूआ' चढा कर पूजा सम्पादित करनी
चाहिये।
३. मत्स्य—इसमें भी दो प्रकार हैं—१. मत्स्य और २. कूर्म अनुकल्पचने के
चूर्ण की मत्स्याकृति बाटी या 'बड़ी' अथवा 'मूली'।
४. मुद्रा—योगिनीतन्त्र के अनुसार चने से निर्मित अथवा माष से निष्पन्न विशेष
मुद्राकृति पदार्थ घी में पकाने पर इसका अनुकल्प बन जाते हैं। अङ्गुलि
मुद्रायें तो प्रसिद्ध हैं।
५. मैथुन— तीन प्रकार के स्वीकृत हैं—
१. दूती सम्बन्धी— इसमें सदाशिव स्तरीय योगिराज ही अधिकृत हैं।
२. दूत की पूजा और कुण्ड योनि में शुद्ध हवि का अर्पण करने से भी
सुफल। यह स्वपत्नी के साथ भी स्वीकृत है।
३. प्रार्थना करने पर शिष्या आदि के अनुकल्प लाल करवीर पुष्प और
अपराजिता पुष्प दोनों लिङ्ग योनि के प्रतीक हैं। वास्तविकता यह है
कि, इनमें भौतिक दृष्टि का अभाव होना आवश्यक है।।६३।।
अथ पूर्वोक्तावशिष्टाः कुलाचारधर्माः, तानाह सर्वत्र वचनपूर्व
प्रवृत्तिः ।।६४।।