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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 320 में से

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सर्वसाधारणक्रमः २४९
है। बीज में माया पद के यहाँ हीं और दूसरे भाग में क्लीं योजन पर ध्यान
देना चाहिये। शेष सभी वर्ण उसी रीति पर जुटते हैं। अन्त में त्रितारी, कुमारी
को विपरीत क्रम से पढ़ना चाहिये। जहाँ नाम डालना अपेक्षित है, वहाँ मात्राओं
की घट-बढ़ में कोई दोष नहीं आता।।४०।।
अथ अनाहते ध्येयाया वाराहीविद्याया अङ्गमाह
हरः सबिन्दुर्वार्पूर्वंराहि स्थाणुः सबिन्दुरुन्मत्तपदं भैशब्दो
रविपादुकाभ्यां नम इति वार्त्ताल्यङ्गं लघुवार्त्ताली ।।४१।।
हरः अग्रे स्थाणुरिति दशमस्वरवाचकौ। इत्यं च प्रथमं लूं ततः पूर्वं
इत्यंशं त्यक्त्वा हिवर्णान्तः पुनः लूं ततः पदशब्द इत्येतावदंशमपहाय
नमोऽन्तं यथाश्रुतम्। इयं लघुवाराहा वाराह्यङ्गभूता ।।४१।।
'लूं वाराहि लूं उन्मत्तभैरवि पादुकाभ्यां नमः' यह लघुवाराही विद्या है।
यह वाराही माता की अङ्गभूत विद्या मानी जाती है।।४१।।
अथ वार्त्ताल्युपाङ्गविद्यामाह
वेदादिभुवनं नमो वाराहि घोरे स्वप्नं ठद्वितयं अग्निदारा इति
वार्त्ताल्युपाङ्गं स्वप्नवार्त्ताली स्वप्ने शुभाशुभफलवक्त्री ।।४२।।
'ॐ ह्रीं नमो वाराहि घोरे स्वप्नं ठः ठः स्वाहा' यह वार्ताली की
उपाङ्ग विद्या है। यह स्वप्न में शुभाशुभ फलों का निर्देश करती है। ऐसा
चाहने वाले इसकी स्वतन्त्र उपासना कर सकते हैं।।४२।।
तत्प्रत्यङ्गविद्यामाह
वाग्हृदयं भगवति तिरस्करिणि महामाये पशुपदाज्जनमनश्चक्षु-
स्तिरस्करणं कुरु द्वितयं वर्म फट् पावकपरिग्रह इति वार्त्ताली
प्रत्यङ्गतिरस्करिणी ।।४३।।
वाक् ऐं, हृदयं नमः। ततः पदादिति त्यक्त्वा तिरस्करणमित्यनन्तं
यथाश्रुतम्। ततः कुरु इति द्विवारम्। ततः वर्म हुम्। ततः फट् पावकपरिग्रहः
स्वाहा। इयं तिरस्करिणीविद्या प्रत्यङ्गभूता।।४३।।