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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

होमविधिः २२१
२. परिस्तरण—श्रुति का वचन है कि, चारों ओर मिलकर १६ दर्भों से अग्नि
का परिस्तरण होना चाहिये। इसलिये चार-चार दर्भ चारों ओर परिस्तृत
करना चाहिये। इसके बाद पूजा की जानी चाहिये।
३. परिधाय—इस प्रक्रिया में स्रुक्, स्रुवा इत्यादि का रखना, स्थाली आदि
की प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये। साथ ही कुण्ड में समिधाओं की किस
प्रकार व्यवस्था हो, इसको ध्यान में रखना चाहिये। यज्ञ में ये विधियाँ
प्रचलित हैं ॥१९५॥
साधिताग्नेर्ध्यानम्
त्रिनयनमरुणाभं बद्धमौलिं सुशुक्लां
शुकमरुणमनेकाकल्पमम्भोजसंस्थम् ।।
अभिमतवरशक्तिस्वस्तिकाभीतिहस्तं
नमत कनकमालालङ्कृतांसं कृशानुम् ।।
इति ध्यात्वा ।।१९६।।
यह अग्नि के ध्यान का मन्त्रात्मक श्लोक स्वयं ग्रन्थकार की स्वोपज्ञ
रचना है। इससे अग्नि का ध्यान करना चाहिये। इसका अर्थ इस प्रकार है—
तीन नेत्रों वाले, ताम्रवर्णी, बद्धमौलि, शुक्ल अंशुकधारी, सुन्दर, अरुण कमल
में अवस्थित, अभीष्टवरमुद्रा, शक्ति, स्वस्तिक और अभय मुद्रा में विराजमान
स्कन्ध पर शोभमान स्वर्णहार समन्वित हुताशन अग्निदेव को सभी प्रणति
निवेदन करें।।१९६।।
पूर्वकल्पिताग्निचक्राष्टकोणादिषु देवतास्थापनमाह
अष्टकोणे जातवेदसे सप्तजिह्वाय, हव्यवाहाय अश्वोदराय
वैश्वानराय कौमारतेजसे विश्वमुखाय देवमुखाय नमः, इति षट्कोणे
षडङ्गं, त्रिकोणे अग्निमन्त्रेण अग्निं पूजयित्वा ।।१९७।।
अष्टकोणे अनुक्तत्वात् प्रागादिप्रादक्षिण्यक्रमः। षट्कोणेऽपि तथैव।
अग्निमन्त्रेण 'अग्निं प्रज्वलितम्' इत्युपस्थापनमन्त्रेण, अग्निलिङ्गस्य
स्पष्टत्वात्। पूजने च पञ्चोपचारैर्मन्त्रावृत्त्या ज्ञेयम् ।।१९७।।

२२२ परशुरामकल्पसूत्रम्
आठ कोणों में कहाँ किसकी पूजा की जाय, इसका स्पष्ट निर्देश नहीं
है। अतः परम्परा के अनुसार आचरण करना चाहिये। पूरब से अग्नि होते हुए
ईशान तक के क्रमिक कोणों में पूजा का प्रचलन है। षट्कोण में भी यही क्रम
अपनाना चाहिये। इसमें षडङ्ग पूजन करना होता है। त्रिकोण में अग्नि मन्त्र से
पूजा की जाती है। पूजन में पञ्चोपचार विधि अपनायी जाती है।।१७।।
सप्तजिह्वाहुतीराह
हिरण्यायै, कनकायै, रक्तायै, कृष्णायै, सुप्रभायै, अतिरक्तायै,
बहुरूपायै नम इत्यग्नेः सप्तजिह्वासु मूलशुद्धेनाज्येन सप्ताहुतीः
कुर्यात् ।।१८।।
नम इति सर्वत्रानुषज्यते। मूलशुद्धेन मूलाभिमन्त्रणेन संस्कृतेन।
अभिमन्त्रणं संख्यानुक्तेः सकृन्मूलेन। नमःपदोत्तरं स्वाहायोगः, होमरूप-त्वात्।
'स्वाहा होमे तर्पणे तु तर्पयामीति योजयेत'। इति योगिनीतन्त्र-
वचनात् ।।१८।।
अग्नि की सात जिह्वायें प्रसिद्ध हैं। इनके नाम क्रमशः हिरण्या, कनका,
रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता, बहुरूपा हैं। इन सातों जिह्वाओं में मूलमन्त्र
से अभिमन्त्रित आज्य (शुद्ध घी) से सात आहुतियाँ दी जानी चाहिये।
आहुति देते समय सूत्र में लिखित नमः शब्द के बाद 'स्वाहा' अवश्य
जोड़ना चाहिये। एक नियम है कि, होम में स्वाहा और तर्पण में तर्पयामि क्रिया
का योग करना चाहिये। यह योगिनीतन्त्र का निर्देश है।।१८।।
कर्मशेषमुपदिशति सूत्रान्तरेण
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरग्नेस्त्रिधाहुतिं विधाय ।।१९।।
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरिति पूर्वपठितैस्त्रिभिर्मन्त्रैरित्यर्थः। त्रिधात्रिवारम्।
अनेन कर्माभ्यासः, नाहुतिभेदः। वैश्वानरादिमन्त्रत्रये स्वाहाकारोऽस्ति।
तथाप्यन्यस्वाहाकारो होमकाले योज्यः। तदुक्तं शक्तिसङ्गमतन्त्रे—"मन्त्रान्ते या
वह्निजात्या सा तु मन्त्रस्वरूपिणी। तदन्ते प्रत्युञ्जीत सा होमाङ्गतया
मता"।।१९।।

होमविधिः २२३
इसी खण्ड के ९-१२ और १३वें सूत्रों में पठित तीन मन्त्रों से तीन
बार आहुति देनी चाहिये। त्रिधा का तात्पर्य भेदमयी आहुति नहीं, अपि तु
आहुतिरूप कर्म का अभ्यास मात्र है। एक विशेष तथ्य की ओर वृत्तिकार ने
ध्यान आकृष्ट किया है। वह यह कि, उक्त तीनों मन्त्र स्वाहान्त मन्त्र हैं। शक्ति-
संगम-तन्त्र कहता है कि, मन्त्रोक्त स्वाहा शब्द मन्त्र के अङ्ग हैं। आहुति करते
समय स्वाहा पृथक् प्रयोग भी आहुति के अङ्गरूप में उचित है॥१९॥
अथ इष्टदेवतावाहनमाह
बहुरूपजिह्वायामिष्टां देवतामावाह्य पञ्चोपचारैरुपचर्य ॥२०॥
आवाहनं पूजाप्रकरणोक्तसरण्या। पञ्चोपचारैर्गन्धादिभिः ॥२०॥
वस्तुतः जहाँ तक पाँच उपचारों का प्रश्न है— ये गन्ध, पुष्प, धूप,
दीप, नैवेद्य में ही चरितार्थ हो जाते हैं॥२०॥
चक्रदेवीनामाहुतयः
सर्वासां चक्रदेवीनामेकाहुतिं हुत्वा, नमोऽन्तान् पादुकान्तान्
शेषान् मन्त्रान् स्वाहान्तान् विधाय जुहुयात्॥२१॥
सर्वासामिति तत्तदावरणदेवताषडङ्गौघत्रयनित्याऽऽदीनां मध्ये यस्मिन्
पूजाप्रकरणे यावत्यो विहितास्तासां सर्वासामित्यर्थः। द्रव्यानुक्तत्वाद् आज्यम्।
नमोन्तान् इति ये च नमोऽन्ता बाणमन्त्रा वशिन्यादिमन्त्राश्च पादु-कान्ता मन्त्रा
गुरुपादुकामन्त्रादयः, एतदुभयभिन्नाः केवलं नाम्नैवोद्धृताः। अणिमासिद्ध्यादयः
शेषाः, एतान् सर्वान् स्वाहान्तान् कृत्वा तेन होतव्य-मित्यर्थः। श्रीक्रमे
पञ्चदशनित्यानन्तरं सर्वरोगहरचक्रे कामेश्वर्याद्यनन्तरं मूलेन पूजनवन्न होमः।
तेन तस्याः प्रधानदेवतारूपत्वेन तस्या आहुतेर्वक्ष्यमाणत्वात् ॥२१॥
सभी चक्र-देवियों के लिये (सप्तमसूत्रोक्त) एक-एक आहुति देने का
निर्देश सूत्रकार दे रहे हैं। पुनः नमः अन्त वाले बाणमन्त्र और पादुकान्त
शेष मन्त्रों के साथ स्वाहा लगाकर हवन करना चाहिये। ये दो प्रकार के
भेदयुक्त मन्त्र यहाँ निर्दिष्ट हैं। इन्हीं मन्त्रों से स्वाहान्त बनाकर हवन करना
चाहिये॥२१॥

२२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवमग्निसंस्कारानुक्त्वा प्रधानहोमधर्मानुपदिशति
अथ प्रधानदेवतायै दशाहुतीर्जुहुयात् ॥२२॥
अथेत्यनेन अङ्गदेवताहोमविच्छेदः सूचितः। एतावत्पर्यन्तं सर्वप्रयोग-
साधारणम्। पुरश्चरणाङ्गहोमः काम्यहोमो वा सर्वोऽप्येतदुत्तरं भवति ॥२२॥
अथ अव्यय का प्रयोग पूर्ववर्ण्य के विच्छेद और नव वर्णनीय के आरम्भ
का सूचक है। इस सूत्र में अङ्गदेवताओं से सम्बद्ध होम की समाप्ति की सूचना
और प्रधान देवता को दश आहुति देने का निर्देश है। पुरश्चरणाङ्ग होम या काम्य
होम इसके बाद ही होते हैं॥२२॥
काम्यहोमविधिः
यदि काम्यमीप्सेदभीष्टदेवतायै विज्ञाप्य सङ्कल्पं कृत्वैतावत्कर्म-
सिद्ध्यर्थमेतावदाहुतीः करिष्यामीति ॥२३॥
विज्ञाप्य प्रार्थ्य, एतावत्कार्यसिद्ध्यर्थम् अमुकफलसिद्ध्यर्थम् एता-
वत्कर्मामुकसंख्याकाहुतीः, कार्यतारतम्येन आहुतिसंख्यातारतम्यं ज्ञेयम्॥२३॥
काम्य कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होने पर इसकी सूचना इष्टदेवता को
देनी चाहिये। बिना प्रार्थना के काम्यकर्म नहीं करना चाहिये। आज्ञा लेकर
सर्वप्रथम संकल्प करना उचित है। काम्यकर्मों में फलाकांक्षा स्वाभाविक है।
फलानुसार आहुति की संख्या का निर्धारण करना पड़ता है। इस तारतम्य के
अनुसार काम्यकर्म करे॥२३॥
ससाधनं होमं विधत्ते
तिलाज्यैः शान्त्या, अन्नेनान्नायामृताय, समिच्चूतपल्ल-
वैर्ज्वरशमाय, दूर्वाभिरायुषे, कृतमालैर्धनाय, उत्पलैर्भोगाय,
बिल्वदलैराज्याय, पद्मैः साम्राज्याय, शुद्धलाजैः कन्यायै, नन्द्यावर्त्तैः
कवित्वाय, वञ्जुलैः पुष्ट्यै, मल्लिकाजातीपुन्नागैर्भाग्याय, बन्धूक-
जपाकिंशुकबकुलमधुकैरैश्वर्याय, लवणैराकर्षणाय, कदम्बैः
सर्ववश्याय, शालितण्डुलैर्धान्याय, कुङ्कुमगोरोचनादिसुगन्धैः
सौभाग्याय, पलाशपुष्पैः कपिलाघृतैर्वा तेजसे, धत्तूर-

होमविधिः २२५
कुसुमैरुन्मादाय, विषवृक्षैर्निम्बश्लेष्मातकविभीतकसमिद्भिः
शत्रुनाशाय, निम्बतैलाक्तलवणैर्मरणाय, काकोलूकपक्षैर्विद्वेषणाय,
तिलतैलाक्तमरीचैः कासश्वासनाशाय जुहुयात्।।२४।
तिलाज्यैस्तिलसहिताज्यैः। यावत्संख्याज्याहुतयस्तावत्संख्याक-
तिलाहुतयः कार्या इति निष्कर्षः। शान्त्यै शान्तिर्नाम उत्पत्स्यमानानिष्ट-
प्राग्भावसंरक्षणम्। समिधश्च यज्ञीयवृक्षसम्बन्धिन्यो ग्राह्याः। दूर्वाः प्रसिद्धाः।
कृतमालैः आरेवतैः। 'आरेवतव्याधिघातकृतमालसुपर्णकाः' इत्यमरः।
शुद्धलाजैः शुद्धत्वं गृहे निर्मितत्वम्। वञ्जुलैः चित्रकृद्भिः, 'वञ्जुलश्चित्रकृत्तवाथ'
इत्यमरः। बन्धूकः किंशुकः पलाशः। मधुकैरिति योगेन मधुपुष्पाणां ग्रहणम्।
श्लेष्मातकः शेलुः। विभीतकः अक्षः। विषवृक्षसमिधो निम्बादिसमिद्भिः सह
विकल्प्यन्ते। शत्रुनाशकर्मणि द्वयोः तुल्यसाधनत्वम्। विद्वेषः स्वशत्रोर्यः
प्रबलाश्रयभूतस्तेन साकम्।।२४।।
काम्य होम का निर्देश यह सूत्र करता है। इसमें उत्तम, मध्यम और नीच
सभी काम्य कर्म गिनाये गये हैं। साधना की दृष्टि से ये सभी हेय हैं। मात्र
उपासना से सभी सिद्धियाँ समुपलब्ध हो सकती हैं; किन्तु सामान्य जन इनका
भी प्रयोग करते हैं। ये सभी प्रयोग ऐसे ही लोगों के लिये हैं। जैसे—
क्रमसंख्या अभीष्ट काम्यकर्म हवनयोग्य समिधाप्रकार
१. शान्ति तिल और आज्य
२. अमृत अन्न अन्न
३. ज्वरनाश चूतपल्लव
४. आयुष्य दूर्वा
५. धन कृतमाल
६. भोग उत्पल
७. राज्यप्राप्ति बिल्वपत्र
८. साम्राज्य-रक्षा पद्म (रक्तकमल)
९. कन्याप्राप्ति शुद्ध लावा

२२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
१०. कवित्व नन्द्यावर्त्त (तगर)
११. पुष्टि वञ्जुल (अशोक)
१२. भाग्य मल्लिका, चमेली, पुन्नाग
१३. ऐश्वर्य बन्धूक, जपा, किंशुक, बकुल और
मधूक (महुवा)
१४. आकर्षण लवण
१५. सर्ववशीकरण कदम्बपुष्प
१६. धान्यवृद्धि शालितण्डुल
१७. सौभाग्य-संवर्धन कुङ्कुम-गोरोचन
१८. तेजोवृद्धि पलाशपुष्प अथवा कपिला घी
१९. उन्माद धतूर का फूल
२०. शत्रुनाश विषवृक्ष, नीम, श्लेष्मातक (बहुआर),
विभीतक (भिलावा)
२१. मारण नीमतेल में सने नमक
२२. विद्वेषण काक और उलूक पक्ष
२३. कासश्वासनाश तिलतेल में सने मरिच (काली मिर्च)
इन त्रयोविंश काम्य पूर्ति के लिये सामने दिये गये पुष्प या समिधाओं
से हवन करना चाहिये॥२४॥
अथोत्तराङ्गमाह (बलिदानम्)
बलिं प्रदाय॥२५॥
बलिदानं तत्तत्पूजाक्रमोक्तविधिना॥२५॥
विशिष्ट-विशिष्ट पूजा के अन्त में विविध प्रकार के बलि विधान शास्त्रों
में वर्णित हैं। उन्हीं के अनुसार यहाँ भी बलि करनी चाहिये॥२५॥
महाव्याहृतिहोममाह
१. ॐ भूरग्नये च पृथिव्यै च महते च स्वाहा।

होमविधिः २२७
२. ॐ भुवो वायवे चान्तरिक्षाय च महते च स्वाहा।
३. ॐ सुवरादित्याय च दिवे च महते च स्वाहा।
४. ॐ भूर्भुवस्सुवश्चन्द्रमसे च नक्षत्रेभ्यश्च दिग्भ्यश्च महते च
स्वाहा। इति चतुर्भिर्मन्त्रैर्महाव्याहृतिहोमं कृत्वा।।२६।।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः (सुवः) (ॐभूर्भुवस्सुवः) इनको
महाव्याहृतियाँ कहते हैं। ये तीन होती हैं। इनसे सूत्रानुसार हवन करना
चाहिये।।२६।।
ब्रह्मार्पणाहूतिमाह
इतः पूर्वं प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नावस्थासु
मनसा, वाचा, कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना यत् स्मृतं,
यदुक्तं, यत्कृतं तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा इति ब्रह्मार्पणाहूतिं
कृत्वा।।२७।।
प्राण, बुद्धि और देह इन तीनों से अणु पुरुष बद्ध है। इसमें जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं का प्रभाव पड़ता है। इससे प्रभावित
पुरुष मन, वाणी और कर्म के संस्कार ग्रहण करता है। मन से स्मरण करता
है। वाणी से बोलता है और तदनुसार हाथ, पैर, उदर, शिश्न इन चारों से
काम करता है। निष्काम भाव से इनका समर्पण ब्रह्म में होना ही चाहिये।
ब्रह्मार्पण सर्वश्रेयस्कर कार्य माना जाता है। अन्त में यह करना ही
चाहिये।।२७।।
अग्निदेवतयोरुद्वासनमाह
चिदग्निं देवतां चात्मन्युद्वासयामि नम इत्युद्वास्य ।।२८।।
उद्वासनं खेचरीमुद्रया।।२८।।
पहले आवाहित चिदग्नि और आवाहित देवता का उद्वासन कर
देना चाहिये। उद्वासन की यह प्रक्रिया खेचरी मुद्रा द्वारा सम्पन्न होती
है।।२८।।

२२८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भस्मधारणादिकमाह
तद्भस्मतिलकधरो लोकसम्मोहनकरः सुखी विहरेत्। इति
शिवम्॥२९॥
तद्भस्म अग्नेर्भस्म। अग्निविसर्जनानन्तरं परिस्तरणपरिधीना-मपि
विसर्गः। प्रतिपत्तिसंस्कारस्यानुक्तत्वात्। शिवमिति व्याख्यातम्॥२९॥
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ
सौभाग्योदयनाम्यां (मुख्यांशमात्रायां) होमविधिर्नाम
नवमः खण्डः सम्पूर्णः॥९॥
भस्म धारण एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसमें सभी पाप भस्मसात् हो जाते
हैं। लोग उसे देखकर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार विश्वविहार सिद्ध हो जाता
है॥२९॥
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का होमविधि नामक नवम खण्ड परिपूर्ण ॥९॥
।। शुभं भूयात्।।

सर्वसाधारणक्रमः
[ दशमः खण्डः ]
अथ सामान्यकर्माधिकारः
प्रथमखण्डे दीक्षानन्तरं सर्वमन्त्राधिकारी भवतीत्युक्तत्वात्
श्रीत्रिपुरसुन्दर्युपास्तेर्निष्कामरूपतया यदा सङ्कटे कामनावशात्
सूर्यविष्णुभैरवाद्युपास्तिप्रसक्तिस्तदितिकर्त्तव्यताज्ञानार्थं तन्त्रान्त-
रोपास्तिं सूत्रानुयायी मा करोतु, इति तदुपासनासिद्धये किञ्च
रश्मिमालादिषु प्रत्येकं मन्त्राणां फलश्रवणात् तत्तत्कामनया
तत्तदुपास्तिप्रसक्तौ, अपि च कश्चन उपासनायां श्रद्धावान् ललितो-
पास्तौ च अनधिकारी तस्य शिवविष्ण्वाद्युपासनां प्रवर्त्तयतु इति
परमकृपालुः श्रीपरशुरामः सर्वसाधारणीम् उपासनासरणिं दर्शयति।
अथातः सर्वेषां मन्त्राणां सामान्यपद्धतिं व्याख्यास्यामः॥१॥
अथ त्रिपुरसुन्दर्युपास्तिप्रकारदर्शनानन्तरम्। अतोऽवतरणि-
कायामुक्तहेतोः। सर्वेषां गणपतिललिताश्यामावार्त्तालीभिन्नानां यावतां मन्त्राणाम्।
सामान्यपद्धतिं साधारणसरणिम्॥१॥
अथ अव्यय त्रिपुरसुन्दरी की उपासना के बाद के क्रम का निर्देशक है।
इस सूत्र में सर्वसाधारण-क्रम विषयक उपासना की व्याख्या की प्रतिज्ञा कर रहे
हैं। वास्तव में दीक्षा के बाद सभी मन्त्रों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। यह
भी निश्चित तथ्य है कि, माँ की उपासना निष्काम रूप होती है। ऐसी प्रवृत्ति
काम्य कर्म की ओर ही यदि झुकने लगे, तो उस दशा में साधक क्या करे?
संमर्शी सूत्रकार इसी का संविधान इस खण्ड में दे रहे हैं। इसीलिये इस खण्ड

२३० परशुरामकल्पसूत्रम्
का नाम ही सर्वसाधारण-क्रम रखा गया है। इसमें गणपति, ललिता, श्यामा,
वार्त्ताली मन्त्रों के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण किया गया है॥१॥
अथ श्यामाक्रमे पठितानि कानिचिदङ्गानि अतिदिशति वचनेन
श्यामावत् सन्ध्याद्यर्घ्यशोधनपर्यन्तं न्यासवर्जम् ॥२॥
सन्ध्यादीत्यनेन सन्ध्यातः प्राक् पठितानां व्यावृत्तिः। अर्घ्यशोधन-
पर्यन्तम् इत्यनेन तदग्रिमव्यावृत्तिः। उभयमध्यतनानां मध्ये न्यासवर्जम् इत्यनेन
तद्व्यावृत्तिः। अर्घ्यशोधनम् इत्यविशेषोक्त्या विशेषार्घ्यशोधनान्तं कार्यम्। तेन
ब्राह्मे मुहूर्त्ते यत्कृत्यं स्नानदन्तधावनविंशतिगण्डूषादि सर्वं निवर्त्तते॥२॥
सन्ध्या से लेकर अर्घ्यशोधन पर्यन्त सारे कार्य श्यामा की तरह किये
जाने चाहिये। सूत्रकार ने इसके बीच में आये न्यास का वर्जन कहकर मध्य
के अन्य कार्य ही करणीय हैं, ऐसा इङ्गित किया है॥२॥
सर्वसाधारणन्यासमाह
अनुक्तषडङ्गस्य षड्जातियुक्तमायया षडङ्गम्॥३॥
अनुक्तेत्यनेन अज्ञातमप्युपलक्षणीयम्। इत्थं च यस्य मन्त्रस्य
षडङ्गमुक्तम्, तेन स्वषडङ्गे श्यामाक्रमे न्याससमये न्यसेत्। यस्यानुक्तमज्ञातं वा
तत्र षड्जातियुक्तमायया षडङ्गन्यासः। षड्जातिमाया च 'हां हीं हूं हैं हौं हः'
इति क्रमेण षडङ्गेषु योज्यम्॥३॥
वृत्तिकार के अनुसार अनुक्त शब्द से अज्ञात अर्थ भी लगाना चाहिये।
इस प्रकार जिस मन्त्र का षडङ्ग कहा गया है, उस स्थान पर श्यामा क्रम
में अपने ६ अङ्गों पर न्यास करना चाहिये। जिसका षडङ्ग अनुक्त या अज्ञात
हो वहाँ षड्जातियुक्त माया (हां हीं हूं हैं हौं हः) से न्यास करना
चाहिये॥३॥
चक्रनिर्माणमाह
बिन्दुत्रिषडरनागदलचतुष्पत्रचतुरस्रमयं चक्रम्॥४॥
अष्टदलं चतुर्दलं, पद्मद्वयं शेषं स्पष्टम्॥४॥

सर्वसाधारणक्रमः २३१
मध्य में बिन्दु, तीन षट्कोणयुक्त भाग के चारों ओर अष्टदल और पुनः
चतुर्दल, दो कमल एक चतुष्कोण (चतुर्भुज सम) के अभ्यन्तर भाग में बनाकर
चक्र पूरा करना चाहिये।।४।।
षडावरणीपूजा
बिन्दौ मुख्यदेवतेच्छाज्ञानक्रियाशक्तयस्त्र्यस्रे। षडरे तत्तत्षडङ्गा-
न्यष्टदले ब्राह्मयाद्याः, चतुर्दले गणपति-दुर्गा-वटुकक्षेत्रेशाश्चतुरस्रे
दिक्पालाः ।।५।।
बिन्दौ मुख्यदेवता। द्वितीयावरणम् इच्छेति। क्रमः स्वाग्रादिप्रादक्षिण्येन।
तृतीयमाह—षडर इति। क्रमः पूर्ववत्। चतुर्दले पञ्चमावरणे। चतुरस्रेऽपि
तथैव प्रागादीशानान्तम् ऊर्ध्वम् अधश्च ज्ञेयम्। एवं षडावरणीपूजा।।५।।
सर्वत्र प्रधान देवता की पूजा अन्त में होती है; किन्तु सूत्र में प्रधान
देवता की बिन्दु में पूजा का निर्देश है। द्वितीय आवरण में इच्छा, ज्ञान और
क्रिया शक्तियों की पूजा करनी चाहिये। तृतीय आवरण में षडर पूजा सम्पन्न
होती है। इसमें अग्नि से ईशानान्त पूजन क्रम में ब्राह्मी आदि आठ देवियों
की पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरण की पूजा चतुर्दल में की जाती है।
छठें आवरण की पूजा दिक्पालों की पूजा होती है। पूर्व से ईशान कोण तक
आठ दिक्पाल ऊर्ध्व और अधस्तात् मिलकर दश दिशाओं के दश दिक्पाल
होते हैं।।५।।
सर्वमन्त्रेषु योज्यानि बीजान्याह
त्रितारीकुमारीभ्यां सर्वे क्रममन्त्राः प्रयोक्तव्याः ।।६।।
त्रितारी श्रीक्रमोक्ता। कुमारी बाला।।६।।
त्रितारी ‘ऐं ह्रीं श्रीं’ और कुमारी ‘ऐं क्लीं सौः’ को कहते हैं। सभी क्रम
मन्त्रों में इनका प्रयोग किया जा सकता है।।६।।
आवाहनादि-मन्त्राः
तत्तन्मूलेनावाहनं, कलामनुना बलिरनेन क्रमेणाहुतीः ।।७।।

२३२ परशुरामकल्पसूत्रम्
आवाहनमन्त्रमाह—तत्तदिति। बलिदानमन्त्रमाह—कलेति। कलामनु-
र्व्याख्यातः। अत्र बलिदानं पात्रोद्वासनदेवतोद्वासनादीनामुपलक्षणम्। आहुति-
र्यजनं पूजनम्। सर्वदेवानां तत्तन्मन्त्रजपः श्रीक्रमोक्तजपसमये कार्य इति
सर्वसाधारणक्रमः॥७॥
एवं सामान्यक्रममुक्त्वा पुनः सिंहगुहावलोकनन्यायेन ललिताक्रमशेषमेव
वक्तुं प्रक्रमते
अथ रश्मिमाला ॥८॥
रश्मिरिति प्रकाशापरपर्यायः। मालेति मन्त्रविशेषसंज्ञा। तदुक्तं नित्यातन्त्रे
'मन्त्रा एकाक्षराः पिण्डाः कर्त्तव्या द्व्यक्षरा मताः। बहुवर्ष समारम्भ नवार्णाविधि
बीजकाः।। ततो दशार्णमारभ्य यावत् विंशतिमन्त्रकाः। तत ऊर्ध्वं गता
मालास्तासु भेदो न विद्यते।।' इत्थं च गायत्र्यादिमहापादुकान्तस्य
प्रकाशकत्वाद् विंशतिवर्णा

सर्वसाधारणक्रमः २३३
उस महत्त्वपूर्ण क्षण में इसके स्मरण से नया आयाम खुलता है। इसके
तुरत बाद ब्रह्मरन्ध्र में गुरु के ध्यान का भी विधान है। यह प्रातःकालीन
कृत्य है॥९॥
अथ रश्मिमालासंज्ञकान् पुंमन्त्रान् दर्शयति
१. प्रणवो भूर्भुवस्सुवस्तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो
नः प्रचोदयात्। इति त्रिंशद्वर्णा गायत्री।
२. यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कुरु मघवञ्छग्धि तव तन्न
ऊतये विद्विषो विमृधो जहि।। स्वस्तिदा विशस्पतिर्वृत्रहा विमृधो
वशी। वृषेन्द्र पुर एतु नः स्वस्तिदा अभयङ्करः। इत्यैन्द्री
सप्तषष्ठ्यर्णा सङ्कटे भयनाशिनी।
३. प्रणवो घृणिः सूर्य आदित्य इत्यष्टाण्णा भयनाशिनी।
४. प्रणवः केवलो ब्रह्मविद्या मुक्तिदा। सौरी तेजोदा।
५. तारः परोरजसे सावदोम् इति नवार्णा तुर्यगायत्री
स्वैक्यविमर्शिनी। रश्मिपञ्चकमेतन्मूलहृत्फालविधिबिल-
द्वादशान्तबीजतया विमृष्टव्यम्॥१०॥
'त्रिंशद्वर्णा गायत्री' इत्यादिभिर्वक्ष्यमाणे रश्मिमालाऽवयवमन्त्रसंज्ञा
दर्शिता। ऐन्द्री इन्द्रदैवत्या। सङ्कटे दावाग्निव्याघ्रादिप्राणसङ्कटे। तेजोदातेजः
स्वदर्शनेन परेषां स्वस्मिन् उत्कर्षप्रतिपादिका शक्तिः, तस्या दायिनी। प्रणवः
केवलः प्रणवोच्चारणमेव। ब्रह्मविद्या ब्रह्मविद्याप्रतिपादिका। तारः प्रणवः।
तदुक्तं विश्वामित्रकल्पे—
गायत्र्यास्तुर्यपादोऽयं त्रिपदाया ह्युदाहृता। इति। स्वैक्यविमर्श आत्मरूपं
ज्ञानम्। तत्रदायिका। एतत्-तत्सवितुरिति गायत्रीमारभ्य गायत्रीतुर्यपादपर्यन्तं
यद् रश्मिपञ्चकं रश्मीनां प्रकाशशक्तिमत्वाद् अमीष्वपि तत्त्वे रश्मिशब्देन
व्यवहारः। क्रमेण मूले मूलाधारे हृदि, ललाटे, विधिबिले ब्रह्मरन्ध्रे, द्वादशान्ते
विमृष्टव्यं भावयितव्यम्॥१०॥

२३४ परशुरामकल्पसूत्रम्
रश्मिमाला के अन्तर्गत आने वाले मन्त्र रश्मिपञ्चक मन्त्र कहलाते हैं।
ये ब्रह्मरूप स्वप्रकाश तत्त्व की वागात्मक रश्मियाँ हैं। इनका साक्षात्कार मन्त्रद्रष्टा
मनीषी ऋषियों ने किया है। ये पाँच हैं—
१. गायत्री मन्त्र—इसमें २४ अक्षर होते हैं। जब ओङ्कार भूः भुवः और सुवः
रूप छः वर्णों को इसके साथ लगाकर बोलते हैं, तो यह तीस वर्णों वाली
हो जाती है। यह मूलाधार की बीजरूप से विमृष्टव्य है।
२. ऐन्द्री रश्मि—यह इन्द्रदैवत्या रश्मि है। इन्द्र एक वैदिक देवता है। यह
सङ्कटों से रक्षा करता है। श्रीपाददामोदर सातवलेकर ने 'इन्द्रशक्ति का
विकास' एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें इन्द्रशक्ति का विशद विवेचन है।
यह रश्मि ६७ वर्णों में पूर्ण होती है। ऋग्वेद का यह मन्त्र है। वहाँ
से इसकी व्याख्या देखनी चाहिये। इसको हृदय बीज के रूप में विमृष्ट
करना चाहिये।
३. सौरी रश्मि—इसके विमर्श से स्वात्म में तैजसिकता का विकास होता है।
इसमें प्रणव, घृणि, सूर्य और आदित्य रूप शब्दों के आठ वर्ण सौरी
दिव्यता के प्रतीक वर्ण हैं। यह आज्ञा बीज रूप से ही विमृश्य है।
४. प्रणवरश्मि—यद्यपि गीता इसे एकाक्षर ब्रह्म ही मानती है। फिर भी
वर्णात्मिका विद्या होने के कारण रश्मि भी है। इसे ब्रह्मरन्ध्र में विमृष्ट करना
चाहिये।
५. तुर्यगायत्री—नवार्णा विद्या है। चिदैक्य-समापत्ति की मूल हेतु है। गायत्री
के चतुर्थ चरण के रूप में इसका जप करना गायत्री साधक के लिये
अनिवार्य माना जाता है। आठ माला गायत्री मन्त्र जप कर एक माला
इस मन्त्र का जप करना विश्वामित्रकल्प का निर्देश है। इसका उच्चारण
नहीं किया जाता। इसे द्वादशान्त बीज रूप से विमृष्ट करते हैं। शरीरस्थ
जिन चक्रों में विमर्श करने का निर्देश है, उनका ज्ञान साधक को होना
चाहिये। विशेष रूप से ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त शब्दों का ज्ञान और प्रयोग
रूप से वहाँ तक पहुँचना साधना का विषय है। इसे सद्गुरु से जानना
चाहिये।।१०।।

सर्वसाधारणक्रमः २३५
चाक्षुष्मतीविद्यादि द्वितीयं रश्मिपञ्चकम्
सूर्याक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय। उष्णो भगवान्
शुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिप्रतिरूपः।
विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं ज्योतिरेकं तपन्तं
सहस्ररश्मिः शतधा वर्त्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः। ॐ नमो
भगवते सूर्याय अहोवाहिनि वाहिन्यहो वाहिनि वाहिनि स्वाहा।।
वयस्सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियं मेधा ऋषयो नाथमानाः।
अपध्वान्तमूर्णहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान्।।
पुण्डरीकाक्षाय नमः। पुष्करेक्षणाय नमः।
अमलेक्षणाय नमः। कमलेक्षणाय नमः।
विश्वरूपाय नमः। श्रीमहाविष्णवे नमः।
इति षोडशमन्त्रसमष्टिरूपिणी दूरदृष्टिप्रदा चाक्षुष्मती
विद्या।।१९।।
सूर्येत्यारभ्य घृणिं जातवेदसम् अप्रतिरूप इति पर्यन्तं सप्तवाक्यानि।
सप्तमन्त्राः। ततो हिरण्मयं विश्वरूपम् इत्यारभ्य एष सूर्य इत्यन्तोऽष्टमः। ॐ
नम इत्यारभ्य स्वाहान्तो नवमः। वयस्सुपर्णा इत्यारभ्य बद्धान् इत्यन्तो
दशमः। तदग्रिमाणि नमोऽन्तानि षट् वाक्यानि प्रत्येकं षण्मन्त्राः। इत्थं
षोडशमन्त्राणां समष्टिः, तद्रूपिणी या प्रकृतविद्या सा उपासकानां दूरदृष्टिप्रदा
द्वीपान्तरस्थं वस्त्वपि करस्थामलकवद् दृष्टिगोचरी करोतीति भावः।।१९।।
वृत्तिकार ने प्रारम्भ के सब वाक्यों के दो विकल्प रूप को स्वीकार किया
है। १. सूर्य से प्रतिरूप पर्यन्त सात वाक्य हैं। २. विश्वरूप से एष सूर्यः तक
आठवाँ वाक्य। ३. ॐ नमः से स्वाहा तक नवाँ वाक्य ४. वयः सुपर्णा से
बद्धान् तक दशवाँ वाक्य। ५. पुण्डरीक से विष्णवे नमः तक छः मन्त्र। इस
तरह १६ मन्त्रों की समष्टि वाली यह विद्या चाक्षुष्मती विद्या है। यह भी माला
मन्त्र है। इसे उपनिषद् में परिगणित किया गया है।।१९।।

२३६ परशुरामकल्पसूत्रम्
द्वितीयपञ्चके द्वितीयमन्त्रमाह
प्रणवो गन्धर्वराज विश्वावसो मम अभिलषितामुकां कन्यां
प्रयच्छ ततोऽग्निवल्लभेत्युत्तमकन्याविवाहदायिनी विद्या ।।१२।।
अमुकेत्यत्र अभिलषितकन्यानामनिक्षेपः। नात्रोहः सर्वनाम्ना निर्देशात्,
'अदीक्षितायं ब्राह्मणः' इतिवत्। अग्निवल्लभा स्वाहा।।१२।।
द्वितीय रश्मिमाला मन्त्र में सर्वप्रथम चाक्षुषमती विद्या का प्रयोग था।
उसका दूसरा उत्तम कन्याविवाहदायिनी विद्या से सम्बद्ध मन्त्र है। इसका मन्त्र
'ॐ गन्धर्वराज विश्वावसो मम अभिलषितामुकां कन्यां प्रयच्छ स्वाहा' है। इस
मन्त्र में अमुकां की जगह अभीप्सित कन्या का नाम लगाकर बोलना चाहिये।
यह सच्ची विद्या है। इसमें किसी प्रकार का तर्क व्यर्थ है।।१२।।
तृतीयमन्त्रमाह
तारो नमो रुद्राय पथिपदे स्वस्ति मा सम्पारय इति मार्ग-
सङ्कटहारिणी विद्या।।१३।।
मार्गे यत् सङ्कटं चोरादिजनितं तस्य हारिणी।।१३।।
मन्त्र 'ॐ नमो रुद्राय पथिषदे स्वस्ति मा सम्पारय' इस विद्या को
मार्गसङ्कटहारिणी विद्या कहते हैं। अभिघात या चोर आदि को मार्ग-सङ्कट
कहते हैं। आधुनिक सङ्कटों का ओर-छोर नहीं। गाड़ियों की टक्कर, गोली,
लूट, छिनैती और अपहरण आदि तो साधारण हैं। विष पिलाकर मार डालने
की बातें भी सङ्कट में ही आती हैं। इस विद्या के प्रयोग से सारे सङ्कट
नष्ट हो जाते हैं।।१३।।
चतुर्थमन्त्रमाह
तारस्तारे पदमुक्त्वा तुत्तारे तुरे शब्दं च दहनदयितेति
जलापच्छमनी विद्या।।१४।।
पदमुक्त्वेति शब्दं चेति त्यक्त्वा शेषं 'ॐ तारे तुत्तारे तुरे' इति
पठित्वा दहनदयितां पठेत्।।१४।।

सर्वसाधारणक्रमः २३७
इस विद्या का नाम जलापच्छमनी विद्या है। इसके प्रयोग से जल में डूबने
से आदमी बच जाता है। मन्त्र ‘ॐ तारे तुत्तारे तुरे स्वाहा’ तैरते समय इसका
जप करना चाहिये।।१४।।
पञ्चममन्त्रमाह
अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नम इति
महाव्याधिविनाशिनी नामत्रयविद्या पञ्चमा रश्मयो मूलादिपरिकरतया
प्रपञ्च्य ।।१५-१६।।
इमा उक्ता रश्मयः। परिकरतया तदाधारतया प्रपञ्च्या योज्या
इत्यर्थः।।१५-१६।।
‘अच्युताय नमः’ ‘अनन्ताय नमः’ ‘गोविन्दाय नमः’ यह नामत्रयी विद्या
है। इसमें ॐकार का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके प्रयोग से महाव्याधियाँ
भी निराकृत हो जाती हैं। व्याधि के स्थान पर पञ्चकोणीय प्रयोग करते रहना
चाहिये। तथा इसे पढ़ते रहना चाहिये।।१५-१६।।
अथ तृतीयपञ्चके प्रथममाह
१. प्रणवः कमला भुवना मदनो ग्लाचतुर्दशपञ्चदशौ गं
गणपतये वरयुगलं द सर्वजनं मे शब्दो वशमानयाग्निवामलोचनेति
महागणपतिविद्या प्रत्यूहशमनी।।१७।।
कमला श्रीं, भुवना ह्रीं, मदनः क्लीं ग्लात् चतुर्दशः औ,
पञ्चदशोऽनुस्वारश्च, मिलित्वा ग्लौं। वरयुगलं वरद्वयम्। ततः शब्दं इति शब्दं
च त्यजेत्। अवशिष्टाः सर्वे वर्णा मन्त्रावयवाः। वह्निवामलोचना स्वाहा इति
चरमं पठेत्। प्रत्यूहशमनी विघ्नविनाशिनी।।१७।।
यह तीसरे पञ्चक का पहला मन्त्र है। इसे महागणपति विद्या कहते हैं।
यह विघ्नों का विनाश करती है। इसके कूट शब्दों में मन्त्र छिपा हुआ है।
जैसे—
१. प्रणव = ॐ, २. कमला = श्रीं, ३. भुवना = ह्रीं, ४. मदन = क्लीं,
५. ‘ग्ल’ से चौदहवाँ स्वर = औ पन्द्रहवाँ = अनुस्वार, कुल मिलाकर ग्लौं,

२३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
६. गं गणपतये, ७. वर युगल के साथ द अर्थात्—'वरद वरद सर्वजनं मे
वशमानय', ८. वामलोचना = स्वाहा। यहाँ मन्त्र पूरा हो जाता है। पूरा मन्त्र
इस प्रकार बोलना चाहिये।
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय
स्वाहा'।
महागणापतिविद्या सिद्धविद्या है। इसके प्रयोग से सारे विघ्न नष्ट हो
जाते हैं।।१७।।
द्वितीयमन्त्रमाह
२. प्रणवो नमः शिवायै प्रणवो नमः शिवायेति द्वादशार्णा
शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या।।१८।।
शिवरूपं यत् चरमं तत्त्वं तस्य यो विमर्शः प्रकाशशक्तिः
तत्सम्पादिनी।।१८।।
द्वादशार्णा शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या का अप्रतिम महत्त्व है। शिवैक्य-
संभूतिप्रदायिनी यह विद्या नित्य जपनीय है। अभ्यास से इसका अनवरत उच्चार
होने लगता है। विद्या का मान्त्रिक रूप इस प्रकार है।
'ॐ नमः शिवायै ॐ नमः शिवाय'। इस महाशक्ति का महोच्चार तन,
मन और अस्तित्व को पुलकित कर देता है।।१८।।
तृतीयमाह
३. प्रणवः काष्टमदक्षश्रुतिबिन्दुपिण्डो भृगुषोडशो मां
पालयद्वन्द्वम् इति दशार्णा मृत्योरपि मृत्युरेषा विद्या।।१९।।
ककारादष्टमो जकारः, दक्षश्रुतिरुकारः, मातृकान्यासे तत्स्थानत्वात्।
बिन्दुः प्रसिद्धः। त्रितयपिण्डः समुदायः ‘जुं’ इति। भृगुः सकारः षोडशो
विसर्गः स इति। तदनन्तरं मां पालय पालय इति। मृत्योरपि मृत्युः,
अपमृत्युनाशिनीत्यर्थः।।१९।।
कूट अक्षरार्थ १. प्रणव = ॐ, २. क से आठवाँ वर्ण = 'ज',
३. दक्षश्रुति = उकार, ४. बिन्दु = अनुस्वार। इनका पिण्ड समुदाय—'जुं',

सर्वसाधारणक्रमः २३९
५. भृगु = 'स', ६. षोडश सोलहवाँ अर्थात् विसर्ग = 'सः' उसके बाद मां
पालय पालय दो बार लगाना चाहिये। पूरा मन्त्र 'ॐ जूं सः मां पालय पालय'
यह दशार्ण मन्त्र है। परम्परा के अनुसार अन्त में 'सः जूं ॐ' से सम्पुटित
मन्त्र जपा जाता है।।१९।।
चतुर्थमाह
४. तारः नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयित्वा
भूयासं कर्णयोः श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ॐ इति श्रुतधारिणी
विद्या।।२०।।
श्रुतस्य अधीतस्य धारिणी दृढसंस्कारजनिका विद्या।।२०।।
यह श्रुतधारिणी विद्या विद्यार्थी को पहले ही वेदारम्भ के समय देनी
चाहिये। पूरा मन्त्र इस प्रकार बनता है—
ॐ नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्तु निराकरणं धारयित्वा भूयासं कर्णयोः
श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ॐ'। इसे ब्रह्मरन्ध्र में धारण करते हैं। इसके धारण
से सारे अधीत की धारणा निश्चित रूप से होती है।।२०।।
पञ्चममाह
५. श्रीकण्ठादिक्षान्ता सर्वे वर्णा बिन्दुसहिताः मातृका
सर्वज्ञताकरी विद्या।।२१।।
श्रीकण्ठः अकारः। तदादिक्षान्ता एकपञ्चाशद्वर्णा बिन्दुसहिता मातृका-
वाच्या सर्वज्ञताकरी।।२१।।
अ से लेकर क्ष पर्यन्त सारे मातृका के वर्ण बिन्दु सहित ५० होते हैं।
'ळं' यह एक अतिरिक्त वर्ण भी परम्परा में है। इसीलिये वृत्तिकार ने इसे
एकपञ्चाशद्वर्णात्मिका लिखा है।
वस्तुतः ५० वर्णों की ही मातृका होती है। २० बार आवृत्ति करने
पर बिन्दु सहित सारे वर्ण १००० होते हैं। निशीथ संध्या में इन्हें सहस्रार
के सहस्रदलों पर न्यस्त करना चाहिये। द्वादशान्त में ध्यान की तन्मयता
होती है।।२१।।

२४० परशुरामकल्पसूत्रम्
रश्मयः पञ्च मूलादिरक्षाऽऽत्मकतया यष्टव्याः ।।२२।।
मूलाधारादि-द्वादशान्तान्तरक्षाकर्त्र्य इमा यष्टव्या भावयितव्या इति
भावः ।।२२।।
ये पाँच रश्मियाँ मूलाधार, हृत् (अनाहत), फाल (ललाट, आज्ञाचक्र),
विधिबिल, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में क्रमिक रूप से भावित की जाती हैं। ये
इन चक्रों की रक्षा करती हैं। रक्षिका होने के कारण इनका महत्त्व बढ़ जाता
है। त्रिसन्ध्य इनका भावन करने वाला पुरुष प्रकाश के बोध के रहस्य को जान
लेता है। इसलिये इस मौलिक तथ्य पर विशिष्ट ध्यान देना चाहिये।।२२।।
शिवादि-विद्यादि-चतुर्थरश्मिपञ्चकं तत्र चतुर्थपञ्चके प्रथमं मन्त्रमाह
शिवशक्तिकामक्षितिमायारवीन्दुस्मरहंसपुरन्दरभुवनापरामन्मथ-
वासवभौवनाश्च शिवादिविद्या स्वस्वरूपविमर्शिनी ।।२३।।
इयमेव लोपामुद्रोपास्या। इयम् अग्रिमा कामराजोपास्या च
श्रीगुरुवक्त्रैकलभ्येति द्वयोरतिगोप्यत्वात् तद्विवरणं न करोमि। शिवादिविद्या
हादिविद्या। स्वस्यात्मनः स्वरूपप्रकाशकर्त्री।।२३।।
यह लोपामुद्रा के द्वारा उपास्य विद्या है। यह अग्रिमा कामराज द्वारा
भी उपास्य है। यह विद्या केवल गुरुमुखारविन्द से प्राप्त की जा सकती है।
वृत्तिकार द्वारा भी यही विद्या उपास्य प्रतीत होती है। इसी हेतु इन्होंने इसकी
व्याख्या नहीं की है। शिवादिविद्या ही हादिविद्या कहलाती है। यह स्वात्मस्वरूप
का साक्षात्कार कराने में समर्थ है।।२३।।
(हसकल ह्रीं, हसकहल ह्रीं, सकल ह्रीं)
द्वितीयमाह
क्लशब्दाद्वामेक्षणबिन्दुरेकोऽनन्तयोनिबिन्द्वोऽन्यः शङ्कर-
परत्रिशूलविसृष्ट्योऽपरश्चैत एव खण्डाः प्रतिलोमाः षट्कूटा
सम्पत्करी विद्या ।।२४।।
क्ल इति वर्णादुपरि वामेक्षणम् ईकारः, मातृकान्यासे तत्स्थानत्वात्।
ततो बिन्दुः, क्लीम् इति सम्पन्नम्। अयमेकोऽंशः। अनन्तो हकारः। योनिः