परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोमविधिः २२३
इसी खण्ड के ९-१२ और १३वें सूत्रों में पठित तीन मन्त्रों से तीन
बार आहुति देनी चाहिये। त्रिधा का तात्पर्य भेदमयी आहुति नहीं, अपि तु
आहुतिरूप कर्म का अभ्यास मात्र है। एक विशेष तथ्य की ओर वृत्तिकार ने
ध्यान आकृष्ट किया है। वह यह कि, उक्त तीनों मन्त्र स्वाहान्त मन्त्र हैं। शक्ति-
संगम-तन्त्र कहता है कि, मन्त्रोक्त स्वाहा शब्द मन्त्र के अङ्ग हैं। आहुति करते
समय स्वाहा पृथक् प्रयोग भी आहुति के अङ्गरूप में उचित है॥१९॥
अथ इष्टदेवतावाहनमाह
बहुरूपजिह्वायामिष्टां देवतामावाह्य पञ्चोपचारैरुपचर्य ॥२०॥
आवाहनं पूजाप्रकरणोक्तसरण्या। पञ्चोपचारैर्गन्धादिभिः ॥२०॥
वस्तुतः जहाँ तक पाँच उपचारों का प्रश्न है— ये गन्ध, पुष्प, धूप,
दीप, नैवेद्य में ही चरितार्थ हो जाते हैं॥२०॥
चक्रदेवीनामाहुतयः
सर्वासां चक्रदेवीनामेकाहुतिं हुत्वा, नमोऽन्तान् पादुकान्तान्
शेषान् मन्त्रान् स्वाहान्तान् विधाय जुहुयात्॥२१॥
सर्वासामिति तत्तदावरणदेवताषडङ्गौघत्रयनित्याऽऽदीनां मध्ये यस्मिन्
पूजाप्रकरणे यावत्यो विहितास्तासां सर्वासामित्यर्थः। द्रव्यानुक्तत्वाद् आज्यम्।
नमोन्तान् इति ये च नमोऽन्ता बाणमन्त्रा वशिन्यादिमन्त्राश्च पादु-कान्ता मन्त्रा
गुरुपादुकामन्त्रादयः, एतदुभयभिन्नाः केवलं नाम्नैवोद्धृताः। अणिमासिद्ध्यादयः
शेषाः, एतान् सर्वान् स्वाहान्तान् कृत्वा तेन होतव्य-मित्यर्थः। श्रीक्रमे
पञ्चदशनित्यानन्तरं सर्वरोगहरचक्रे कामेश्वर्याद्यनन्तरं मूलेन पूजनवन्न होमः।
तेन तस्याः प्रधानदेवतारूपत्वेन तस्या आहुतेर्वक्ष्यमाणत्वात् ॥२१॥
सभी चक्र-देवियों के लिये (सप्तमसूत्रोक्त) एक-एक आहुति देने का
निर्देश सूत्रकार दे रहे हैं। पुनः नमः अन्त वाले बाणमन्त्र और पादुकान्त
शेष मन्त्रों के साथ स्वाहा लगाकर हवन करना चाहिये। ये दो प्रकार के
भेदयुक्त मन्त्र यहाँ निर्दिष्ट हैं। इन्हीं मन्त्रों से स्वाहान्त बनाकर हवन करना
चाहिये॥२१॥