परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
६. गं गणपतये, ७. वर युगल के साथ द अर्थात्—'वरद वरद सर्वजनं मे
वशमानय', ८. वामलोचना = स्वाहा। यहाँ मन्त्र पूरा हो जाता है। पूरा मन्त्र
इस प्रकार बोलना चाहिये।
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय
स्वाहा'।
महागणापतिविद्या सिद्धविद्या है। इसके प्रयोग से सारे विघ्न नष्ट हो
जाते हैं।।१७।।
द्वितीयमन्त्रमाह
२. प्रणवो नमः शिवायै प्रणवो नमः शिवायेति द्वादशार्णा
शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या।।१८।।
शिवरूपं यत् चरमं तत्त्वं तस्य यो विमर्शः प्रकाशशक्तिः
तत्सम्पादिनी।।१८।।
द्वादशार्णा शिवतत्त्वविमर्शिनी विद्या का अप्रतिम महत्त्व है। शिवैक्य-
संभूतिप्रदायिनी यह विद्या नित्य जपनीय है। अभ्यास से इसका अनवरत उच्चार
होने लगता है। विद्या का मान्त्रिक रूप इस प्रकार है।
'ॐ नमः शिवायै ॐ नमः शिवाय'। इस महाशक्ति का महोच्चार तन,
मन और अस्तित्व को पुलकित कर देता है।।१८।।
तृतीयमाह
३. प्रणवः काष्टमदक्षश्रुतिबिन्दुपिण्डो भृगुषोडशो मां
पालयद्वन्द्वम् इति दशार्णा मृत्योरपि मृत्युरेषा विद्या।।१९।।
ककारादष्टमो जकारः, दक्षश्रुतिरुकारः, मातृकान्यासे तत्स्थानत्वात्।
बिन्दुः प्रसिद्धः। त्रितयपिण्डः समुदायः ‘जुं’ इति। भृगुः सकारः षोडशो
विसर्गः स इति। तदनन्तरं मां पालय पालय इति। मृत्योरपि मृत्युः,
अपमृत्युनाशिनीत्यर्थः।।१९।।
कूट अक्षरार्थ १. प्रणव = ॐ, २. क से आठवाँ वर्ण = 'ज',
३. दक्षश्रुति = उकार, ४. बिन्दु = अनुस्वार। इनका पिण्ड समुदाय—'जुं',