परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० परशुरामकल्पसूत्रम्
रश्मयः पञ्च मूलादिरक्षाऽऽत्मकतया यष्टव्याः ।।२२।।
मूलाधारादि-द्वादशान्तान्तरक्षाकर्त्र्य इमा यष्टव्या भावयितव्या इति
भावः ।।२२।।
ये पाँच रश्मियाँ मूलाधार, हृत् (अनाहत), फाल (ललाट, आज्ञाचक्र),
विधिबिल, ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त में क्रमिक रूप से भावित की जाती हैं। ये
इन चक्रों की रक्षा करती हैं। रक्षिका होने के कारण इनका महत्त्व बढ़ जाता
है। त्रिसन्ध्य इनका भावन करने वाला पुरुष प्रकाश के बोध के रहस्य को जान
लेता है। इसलिये इस मौलिक तथ्य पर विशिष्ट ध्यान देना चाहिये।।२२।।
शिवादि-विद्यादि-चतुर्थरश्मिपञ्चकं तत्र चतुर्थपञ्चके प्रथमं मन्त्रमाह
शिवशक्तिकामक्षितिमायारवीन्दुस्मरहंसपुरन्दरभुवनापरामन्मथ-
वासवभौवनाश्च शिवादिविद्या स्वस्वरूपविमर्शिनी ।।२३।।
इयमेव लोपामुद्रोपास्या। इयम् अग्रिमा कामराजोपास्या च
श्रीगुरुवक्त्रैकलभ्येति द्वयोरतिगोप्यत्वात् तद्विवरणं न करोमि। शिवादिविद्या
हादिविद्या। स्वस्यात्मनः स्वरूपप्रकाशकर्त्री।।२३।।
यह लोपामुद्रा के द्वारा उपास्य विद्या है। यह अग्रिमा कामराज द्वारा
भी उपास्य है। यह विद्या केवल गुरुमुखारविन्द से प्राप्त की जा सकती है।
वृत्तिकार द्वारा भी यही विद्या उपास्य प्रतीत होती है। इसी हेतु इन्होंने इसकी
व्याख्या नहीं की है। शिवादिविद्या ही हादिविद्या कहलाती है। यह स्वात्मस्वरूप
का साक्षात्कार कराने में समर्थ है।।२३।।
(हसकल ह्रीं, हसकहल ह्रीं, सकल ह्रीं)
द्वितीयमाह
क्लशब्दाद्वामेक्षणबिन्दुरेकोऽनन्तयोनिबिन्द्वोऽन्यः शङ्कर-
परत्रिशूलविसृष्ट्योऽपरश्चैत एव खण्डाः प्रतिलोमाः षट्कूटा
सम्पत्करी विद्या ।।२४।।
क्ल इति वर्णादुपरि वामेक्षणम् ईकारः, मातृकान्यासे तत्स्थानत्वात्।
ततो बिन्दुः, क्लीम् इति सम्पन्नम्। अयमेकोऽंशः। अनन्तो हकारः। योनिः