परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २३९
५. भृगु = 'स', ६. षोडश सोलहवाँ अर्थात् विसर्ग = 'सः' उसके बाद मां
पालय पालय दो बार लगाना चाहिये। पूरा मन्त्र 'ॐ जूं सः मां पालय पालय'
यह दशार्ण मन्त्र है। परम्परा के अनुसार अन्त में 'सः जूं ॐ' से सम्पुटित
मन्त्र जपा जाता है।।१९।।
चतुर्थमाह
४. तारः नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्त्वनिराकरणं धारयित्वा
भूयासं कर्णयोः श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ॐ इति श्रुतधारिणी
विद्या।।२०।।
श्रुतस्य अधीतस्य धारिणी दृढसंस्कारजनिका विद्या।।२०।।
यह श्रुतधारिणी विद्या विद्यार्थी को पहले ही वेदारम्भ के समय देनी
चाहिये। पूरा मन्त्र इस प्रकार बनता है—
ॐ नमो ब्रह्मणे धारणं मे अस्तु निराकरणं धारयित्वा भूयासं कर्णयोः
श्रुतं मा च्योढ्वं ममामुष्य ॐ'। इसे ब्रह्मरन्ध्र में धारण करते हैं। इसके धारण
से सारे अधीत की धारणा निश्चित रूप से होती है।।२०।।
पञ्चममाह
५. श्रीकण्ठादिक्षान्ता सर्वे वर्णा बिन्दुसहिताः मातृका
सर्वज्ञताकरी विद्या।।२१।।
श्रीकण्ठः अकारः। तदादिक्षान्ता एकपञ्चाशद्वर्णा बिन्दुसहिता मातृका-
वाच्या सर्वज्ञताकरी।।२१।।
अ से लेकर क्ष पर्यन्त सारे मातृका के वर्ण बिन्दु सहित ५० होते हैं।
'ळं' यह एक अतिरिक्त वर्ण भी परम्परा में है। इसीलिये वृत्तिकार ने इसे
एकपञ्चाशद्वर्णात्मिका लिखा है।
वस्तुतः ५० वर्णों की ही मातृका होती है। २० बार आवृत्ति करने
पर बिन्दु सहित सारे वर्ण १००० होते हैं। निशीथ संध्या में इन्हें सहस्रार
के सहस्रदलों पर न्यस्त करना चाहिये। द्वादशान्त में ध्यान की तन्मयता
होती है।।२१।।