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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पराक्रमः २०१
आसन के लिये सुकुमार ऊनी वस्त्र उचित होता है। 'सौः' वर्ण के साथ
सूर्य अर्थात् विसर्ग लगाकर पराबीज रूप मूलमन्त्र बनता है। इसी बीज से
अभिमन्त्रित जल से आसन को प्रोक्षित कर लेना चाहिये। ऐसे आसन पर बैठने
से उपासक की वैद्युतिक शक्ति उपासक में ही अधिष्ठित रहती है।।६।।
दैशिकयजनम्
उदग्वदनो मौनी भूषितविग्रहो मूलपूर्वेण दैशिकमनुना मस्तके
दैशिकमिष्ट्वा ।।७।।
उदग्वदन इति पराप्रकरणविधिः। भूषितविग्रहो वस्त्रभूषणादिभिः। मूलं
पूर्वं यस्य ईदृशेन दैशिकमनुना ।।७।।
परा प्रकरण के उपासन क्रम में उत्तर मुख बैठने का विधान है। माँ
राजराजेश्वरी के समक्ष उसका उपासक सामान्य परिधान में कैसे उपस्थित हो
सकता है। अपने को पूरी तरह यथाशक्ति सजाकर ही आसन पर बैठना उचित
है। प्रकरण में दैशिक सम्बद्ध गुरुपादुका १ मन्त्र का वर्णन है। उस मन्त्र में मूल
मन्त्र पहले लगाकर शिर के अग्रभाग में दैशिक की पूजा करनी चाहिये। पूरा
मन्त्र इस 'सौः ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं ग्लौं हस्रैं हसक्षमलवरयूँ सहक्षमलवरयीं
हसौः सहौः अमुकानन्दनाथश्रीगुरुपादुकां पूजयामि' इस मन्त्र से शिर पर
अंजलिबद्ध भाव से गुरुदेव का स्मरण करना चाहिये।।७।।
विघ्नोत्सारणम्
वामपाष्णिघातैः छोटिकात्रयेण पातालादिगतान् भेदावभा-
सिनः विघ्नानुत्सार्य ।।८।।
वामपाष्णिघातैर्वामपादपृष्ठभागघातैः (बहुवचनेन त्रित्वमेव) छोटिका-
त्रयेण। पातालादिपदेन अन्तरिक्षस्य दिशः परिग्रहः। पातालादित्रये अभिघात-
छोटिकयोः प्रत्येकमन्वयः। उत्सार्य दूरीकृत्य ।।८।।
१. सर्वसाधारणक्रम-सू. ३२।

२०२ परशुरामकल्पसूत्रम्
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्त्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ।।
इस मन्त्र को पढ़ते हुए बाँयीं एड़ी से भूमि में तीन आघात करना चाहिये।
इसी तरह तीन बार चुटकी बजाकर तीनों लोकों में अवस्थित विघ्नों का उत्सारण
करना चाहिये।।८।।
अङ्गन्यासः
शिरोमुखहृन्मूलसर्वाङ्गेषु मूलं विन्यस्य ।।९।।
अत्र शिरोमुखादिषु प्रत्यवयवं मूलावृत्तिः। सर्वाङ्गे सकृत्। मूले
मूलाधारे। पराप्रकरणे एतावानेव न्यासः। अधिकानुक्तेः ।।९।।
न्यासविधि में सूत्र के सामान्य निर्देश का विशेष अर्थ परम्परा में गृहीत
है। पहले 'सौः नमः' कहकर शिर, मुख, हृदय, मूल और सर्वाङ्ग का स्पर्श
पुनः सौःस् हृदयाय नमः, सौः औ शिरसे स्वाहा, सौः शिखायै वषट्, सौः स्
कवचाय हुम्, सौः औ नेत्रत्रयाय वौषट्, सौः१ अस्त्राय फट्।
विसर्गन्यास में स्वर नहीं लगाना चाहिये। इसमें न्यास की आवृत्ति हो
जाती है।।९।।
चिदग्नौ सर्वतत्त्वविलापनम्
काकचञ्चुपुटाकृतिना मुखेन सञ्चोष्यानिलं सप्तविंशतिशो मूलं
जप्त्वा वेद्यं नाभौ सम्मुद्र्य पुनः सप्तविंशतिशो जप्त्वा अङ्गुष्ठेन
शिखां बध्वा पुनरनिलमापूर्य तेन मूले चिदग्निमुत्थाप्य तत्र वेद्यस्य
विलयं विभाव्य ।।१०।।
काकचञ्चुपुटं काकमुखाग्रं तत्समाकृतिना स्वमुखेन सञ्चोष्यानिलं सम्यग्
बाह्यवायुमन्तर्नीत्वा वेद्यं षट्त्रिंशत्तत्त्वानि२ सम्मुद्र्य एकीकृत्य। अङ्गुष्ठेन
तन्मन्त्रेण नमः इत्यनेनेत्यर्थः। विलयं घनघृतम् अग्निसंयोगेन द्रवीभूतम्।
यद्यपि लयशब्दो नाशः, तथापि 'वि' उपसर्गेण द्रवत्वमर्थः। आज्यं विलाप्य
इति प्रयोगात्।।१०।।
१. अस्त्राय फट्। २. पराक्रम-सूत्र १८।

पराक्रमः २०३
काकचञ्चुपुट के समान मुख और जिह्वाग्र गोलक से बाहरी वायु का
आन्तर आकर्षण हठयोग की प्राणायाम विधि के अन्तर्गत आने वाली क्रिया है।
उस वायु-समाकर्षण के बीच में ही २७ बार मूल-मन्त्र का जप आवश्यक है।
इसके बाद समस्त वेद्य को अर्थात् ३४ तत्त्वों को नाभि में एकत्र मापन
करना चाहिये।
तत्पश्चात् पुनः परामन्त्र का २७ बार जप करना चाहिये। शिखा बँधी
रहनी चाहिये। बँधी न हो, तो बाँधकर पुनः 'पूरक' करके चिदग्नि का उत्थापन
करना चाहिये। इस चिदग्नि में सारे वेद्य ३६ तत्त्वों का विलय कर देना चाहिये।
यहाँ वेद्य के विलय का सन्दर्भ विचारणीय है। वृत्तिकार विलय का अर्थ
पिघलाना कर रहे हैं। यह मेरी दृष्टि से उचित नहीं। यह एक प्रकार का
चिदग्निसात्करण व्यापार है। इस सम्बन्ध में एक श्लोक मैं लिख रहा हूँ। इस
पर विचार उचित है।
अन्तर्निरन्तरनिरिन्धनमेधमाने
कस्याञ्चिदद्भुतमरीचिविकासवेद्याम्।
मायान्धकारपरिपन्थिनि संविदग्नौ
विश्वं जुहोमि वसुधादिशिवावसानम्॥
इस श्लोक में भी संविदग्नि में विश्व अर्थात् वेद्य का चिदग्निसात्करण
है, पर मात्र ३४ वेद्यतत्त्वों का, शिवशक्ति का नहीं। अतः इस सूत्र के अनुसार
भी ३४ वेद्योँ का ही विलापन उद्देश्य है।।१०।।
अथार्घ्यसादनम्
गोमयेनोपलिप्तचतुरस्रभूतले प्रवहत्पार्श्वकरकृतया मत्स्यमुद्रया
दिव्यगन्धाम्बुयुतया भूव्योमवायुवह्निमण्डलानि कृत्वा।।१९१।।
प्रवहत्पार्श्वेति, येन नासापुटेन वायुर्वहति, तत्पार्श्वकरमधः कृत्वा,
रचितमत्स्यमुद्रया दिव्यः श्रेष्ठः। भूमण्डलं चतुरस्रं श्रीयन्त्रलेखने चतुरस्रे
भूबिम्बं क्षोणीपुरमिति भूरिप्रयोगात्। व्योममण्डलं वृत्तं, शून्यात्मकवृत्ते ज्योतिः-

२०४ परशुरामकल्पसूत्रम्
शास्त्रादौ संख्यासङ्केते आकाशशब्दस्य भूरिप्रयोगात् शून्यस्य वृत्तरूपत्वात्।
वायुमण्डलं षट्कोणं, वह्निमण्डलं त्रिकोणम्। इत्थं च चतुरस्र-वृत्तषट्कोण-
त्रिकोणानि इत्यर्थः।।९१।।
पूजा में साँस लेते समय यह ध्यान दीजिये कि, वह किस पुट में बह
रही है। मत्स्य मुद्रा में वही हाथ नीचे रखकर मत्स्यमुद्राबन्ध साधन करना उचित
है। गोबर से लिपे-पुते चतुर्भुज भूतल पर भूमण्डल, व्योममण्डल, वायुमण्डल,
वह्निमण्डल, इस तरह १. भूमण्डल चौकोर, २. व्योममण्डल वृत्ताकार,
३. वायुमण्डल षट्कोण और ४. वह्निमण्डल त्रिकोण बनाना चाहिये। इतनी
प्रक्रिया इस सूत्र के अनुसार पूरी कर लेनी चाहिये। यह क्रिया आवश्यक
होती है।।९१।।
शेषमर्घ्यमानमतिदिशति
श्यामावत् सामान्यविशेषार्घ्ये सादयेत् ।।९२।।
श्यामा क्रम की तरह इस पूजाक्रम में भी सामान्य और विशेष दो प्रकार
के अर्घ्य प्रदान की व्यवस्था करनी चाहिये।।९२।।
परामन्त्रेषु योजनीयबीजविशेषः
सर्वेऽपि पराक्रममनवः ‘सौः'वर्णपूर्वाः कार्याः ।।९३।।
पराक्रम में जितने मन्त्रों के निर्देश हैं, उन सबके पहले पराबीज ‘सौः’
का प्रयोग आवश्यक होता है।।९३।।
विशेषार्घ्ये श्यामातोयोऽधिकांशस्तमाह
भृगुचतुर्दशषोडशद्विरावृत्त्या वर्णषडङ्गं सर्वमूलषडावृत्त्या
मन्त्रषडङ्गं च कृत्वा ।।९४।।
भृगुः सकारः। चतुर्दशः औकारः। षोडशो विसर्गः। एतेषां प्रत्येकं
द्विरावृत्त्या हृदयादि-षडङ्गं कुर्यात्। अथ वर्णषडङ्गन्यासः। बिन्दुयोगश्च
शिष्टसम्प्रदायात्। मन्त्रस्वरूपम्। सं हृदयाय नमः। औं शिरसे स्वाहा। औः
शिखायै वषट्। विसर्गस्य केवलस्यानुच्चार्यत्वात्। एवमग्रेऽपि। इति मूल-
वर्णषडङ्गन्यासः। मूलेष पुनः षडङ्गन्यासमाह—सर्वमूलेति।।९४।।

पराक्रमः २०५
'भृगु' शब्द 'स'वर्ण का द्योतक है। इसी तरह वर्ण सन्दर्भ में प्रयुक्त
'चतुर्दश' संख्या चौदहवें स्वर 'औ'कार की द्योतक है। 'षोडश' संख्या से
सोलहवें वर्ण विसर्ग का बोध होता है। तीनों मिलकर पराबीज 'सौः' का सङ्केत
करते हैं। स का हृदय में, औ का शिर पर, विसर्ग का शिखा में, पुनः स
का कवच में, औ का नेत्रत्रय में और विसर्ग का अस्त्र मन्त्र में प्रयोग करने
पर दो आवृत्ति हो जाती है। यह वर्ण षडङ्गन्यास माना जाता है। इसके उपरान्त
पूरे मूल से अर्थात् पराबीज से छः आवृत्ति होने पर मन्त्रषडङ्ग न्यास पूरा होता
है। इस तरह मन्त्र के वर्ण-वर्ण में जिस दिव्यता का शाश्वत उल्लास होता है,
उसे उपासक अपने शरीर में धारण कर दिव्यातिदिव्य हो जाता है॥१४॥
न्यस्तानां षडङ्गदेवीनां पूजामाह
उभाभ्यामर्चयित्वा ।।१५।।
मूलवर्णमूलाभ्यामित्यर्थः ।।१५।।
न्यस्त षडङ्ग देवियों का भावन कर पुनः मूल के वर्णों से और पुनः
मूल के साथ-साथ षडङ्ग देवियों का स्मरण करते हुए, पूर्ववत् न्यास का निर्देश
इस सूत्र में दिया गया है॥१५॥
अथ सुधादेवीपूजामाह
मूलमुच्चार्य तां चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशित-
हस्तद्वयां प्रसन्नां देवीं पूजयामि नमः स्वाहा इति सुधादेवीमभ्यर्च्य
तया सम्प्रोक्ष्य वरिवस्यावस्तूनि।।१६।।
मूलमुच्चार्येति। तया सुधादेव्या। वरिवस्यावस्तूनि पूजाद्रव्याणि।।१६।।
सुधा देवी की पूजा का निर्देश इस सूत्र में है। मूल का उच्चारण कर
श्रद्धा के चरम स्तरीय आवेश से आविष्ट होकर मूलवर्ण का उच्चारण कर सुधा
देवी का ध्यान करना चाहिये। यह ध्यानात्मक स्मरण बड़ा ही आकर्षक है। देवी
चिन्मयी है। वह आनन्दमयी है। प्रकाश और स्वातन्त्र्य ही चित् और आनन्द
माने जाते हैं। ऐसी प्रकाशानन्दमयी प्रसन्नमुद्रा में अपने दोनों हाथों में अमृत-
कलश और पिशित लिये हुए है। इतना स्मरण कर यह कहना चाहिये कि,

२०६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘सौः चिन्मयीमानन्दलक्षणाममृतकलशपिशितहस्तां प्रसन्नां सुधादेवीं पूजयामि नमः
स्वाहा।’ उसी अमृत-कलश पवित्र जल का भावन करते हुए पूजाद्रव्य का
प्रोक्षण करना चाहिये।।१६।।
तत्त्वकदम्बस्य हृत्पद्मानयनम्
पूर्वं नाभौ सम्मुद्रितं चिदग्निविलीनं तप्तायोद्रववत् षट्त्रिंश-
तत्त्वकदम्बकं हृत्सरोजे समानीय।।१७।।
पूर्वं पात्रासादनात्पूर्वमित्यर्थः। तप्तायोद्रववत् तप्तसुवर्णद्रववत्। वेदे
निघण्टौ सुवर्णपर्याये अयःपदसत्त्वात् प्रकृतायःपदमपि सुवर्णवाचकम्। इत्थं च
पूर्वं नाभौ षट्त्रिंशत्तत्त्वानि एकीकृत्य चिदग्निना द्रवीभावः सम्पादितोऽस्ति।
ताननूद्य हृदये तद्रसस्य समानयनं विधीयते।।१७।।
पात्रासादन के पहले नाभि में सम्मुद्रित अर्थात् एकीकृत रूप से चिदग्नि
में विलीन ३६ तत्त्वों का समूह जो चैतन्य के चमत्कार से इस रूप में परिणत
हो गया है। उसको हृदयकमल में मयूराण्डरस के समान मकरन्दरस की तरह ध्यान
करना चाहिये। इस प्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये, चित् रूप प्रकाश में
३६ तत्त्वों को सोने के पिघले द्रव की तरह रस रूप में परिणत करने का प्रकल्पन,
एक विशेष प्रक्रिया है। फिर उसे हृदय में लाना और उसका अनुभव करना एक
अलग स्थिति है। इस स्थिति में उपासक परा पूजा के योग्य होता है।।१७।।
अथ पराचक्रं वक्तुं प्रक्रमते
मूलजप्तैः कुसुमक्षेपैर्वक्ष्यमाणैश्च मन्त्रैरासनक्लृप्तिं कुर्यात्।
मूलादियोगपीठाय नम इत्यन्तानि तानि च पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाश-
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दोपस्थपायुपादपाणिवाग्घ्राणजिह्वाचक्षुस्त्वक्श्रोत्रा-
हङ्कारबुद्धिमनःप्रकृतिपुरुषनियतिकालरागकलाविद्यामायाशुद्धविद्येश्वर-
सदाशिवशक्तिशिवाः। एवं पराचक्रं कृत्वा।।१८।।
प्रथमं केवलमूलेनैकवारं कुसुमक्षेपः। ततो वक्ष्यमाणैरेकतत्त्वमन्त्रेण,
मूलादिना योगपीठाय नम इत्यन्तेनैकवारं कुसुमाक्षतक्षेपो वक्ष्यमाणैर्मन्त्रैः।
यथा तत्र तत्त्वमन्त्रस्वरूपम्—पृथिवियोगपीठाय नम इति। एवं शिवान्तेषु

पराक्रमः २०७
योज्यम्। एवं हृदये षट्त्रिंशद्वारं मूलेन निरुक्तषट्त्रिंशत्तत्त्वमन्त्रैश्च कुसुमानां
प्रक्षेप एव पराचक्रनिर्मितिरिति भावः। तानि चेत्यत्र लिङ्गव्यत्यय आर्षः।
षट्त्रिंशत्तत्त्वान्याह—पृथिवीति शिव इत्यन्तेन। यद्यपि तन्त्रान्तरे शिवादि-
पृथिव्यन्तक्रमस्तत्त्वानाम्स्ति, तथापि प्रकृतेऽनेनैव क्रमेण मन्त्रैः पुष्प-
क्षेपोऽपूर्वसाधनमिति विपरीतपाठः। तत्स्वरूपं व्याख्यातं प्राक्॥१८॥
परा चक्र का यह निर्माण शिव संकल्प प्रकल्प का अनूठा उदाहरण है।
कुसुमक्षेप द्वारा आराध्य चक्र के निर्माण की योजना अन्यत्र दुर्लभ है। सर्वप्रथम
मूल मन्त्र का एक बार प्रयोग कर कुसुमक्षेप करने के उपरान्त सूत्रोक्त सभी
तत्त्वपीठों के मन्त्रों से कुसुमक्षेप करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार होंगे, जैसे—
१. ‘सौः पृथिवीयोगपीठाय नमः’ मन्त्र बोलकर कुसुमक्षेप करना चाहिये।
२. ‘सौः अप्योगपीठाय नमः’ (कुमुमक्षेप)।
[

२०८ परशुरामकल्पसूत्रम्
अकलङ्कः कलङ्कशून्यो यः शशाङ्कश्चन्द्रस्तत्तुल्याभा। मुद्रा चिन्मुद्रा,
पुस्तं पुस्तकम्। एतेन द्विबाहुत्वं स्पष्टम्। अत्र पुस्तकं वामहस्ते, गणपति-
प्रकरणलिखितयामलवचनात् परिशेषान्मुद्रा दक्षे।।२०।।
'निष्कलङ्क चन्द्रमा के समान सौन्दर्यसुधासामरस्यमयी त्रिनेत्रा चन्द्र-
कलाकलिता मुद्रापुस्तकधारिणी द्विबाहुसुशोभिता परमा कला मेरी रक्षा करे।' इस
विमृष्टि के स्तर पर माँ सदाशिवरूप चन्द्रकलाकलिता परमाम्बा का ध्यान करना
चाहिये।।२०।।
अथ पूजामाह
मूलादिमुच्चार्य प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका, मूलमध्यमुच्चार्य
विमर्शरूपिणी पराभट्टारिका मूलान्तमुच्चार्य प्रकाशविमर्शरूपिणी
पराभट्टारिकेति त्रिभिः देव्या मूलहृन्मुखेष्वभ्यर्च्य समस्तमुच्चार्य,
महाप्रकाशविमर्शरूपिणी पराभट्टारिकेति, दशवारमवमृश्य तामेव
देवीं कालाग्निकोटिदीप्तां ध्यात्वा।।२१।।
मूलादिं सकारम्। तत्र बिन्दुयोगोऽपि। एवं मूलद्वितीयम् औं। तृतीयं
विसर्गः। मन्त्रस्वरूपं तु—'सं प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि
नमः'। एवमन्यत्। देव्या मूलं मूलाधारम्। इदं पूजनं विशेषार्घ्यद्रव्येण
आवरणदेवतावत् स्वहृदये ज्ञेयम्। समस्तं सम्पूर्णं मूलमित्यर्थः।
श्रीपादुकेत्यादियोजनम् अत्रापि अवमृश्य पूजयित्वा।।२१।।
मूल अर्थात् पराबीज को उच्चरित कर उसका आदि अक्षर बिन्दुयुक्त
बोलकर और इसके बाद प्रकाशरूपिणी पराभट्टारिका प्रयोग कर 'श्रीपादुकां
पूजयामि नमः' लगाना चाहिये। इस तरह प्रथम मन्त्र स्वरूप—'सौः सं प्रकाश-
रूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनता है।
इसी तरह मूल के साथ मूलमध्य 'औ' को लगाकर विमर्शरूपिणी
पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः, मन्त्र बनता है। इसी क्रम में मूलान्त्य
अर्थात् विसर्ग (अः) को मूल के बाद बोलकर तीसरा मन्त्र 'सौः अः प्रकाश-
विमर्शरूपिणी पराभट्टारिका श्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनता है, इन तीनों से
क्रमशः मूलाधार, हृदय और मुख में पूजन करना चाहिये। यह पूजन

पराक्रमः २०९
विशेषार्घ्यद्रव्य से होता है। इसे अपने हृदय में ही सम्पन्न करना चाहिये।
तदनन्तर समस्त मन्त्र का उच्चारण कर ‘महाप्रकाशविमर्शरूपिणी पराभट्टारिका
श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ मन्त्र से देवी के मूल हृदय और मुख में दश बार
पूजन करना चाहिये। अवमर्शन का अर्थ पूजन ही होता है। ऐसी पूजित
वात्सल्यमयी करोड़ों कालानल की दीप्ति के समान अनन्त दीप्तिमन्त माँ का
ध्यान करना चाहिये।।२१।।
ततः कृत्यशेषमुपदिशति
तस्यां क्रियासमभिव्याहारेण वेद्यमखिलं हुत्वा ।।२२।।
तस्यां दीप्तौ हुत्वा हुतं भावयित्वा।।२२।।
कालाग्निकोटिदीप्तिरूप चिदग्नि में क्रियासमभिव्याहार क्रम से प्रत्येक वेद्य
का हवन करना चाहिये। प्रथम मन्त्र जैसे—‘सौः पृथिवीं जुहोमि स्वाहा’’ की
तरह सभी वेद्योँ का हवन करना चाहिये।।२२।।
मुखे अर्घ्यनिवेदनम्
मूलमुच्चार्य सामान्यपादुकया स्वमस्तकस्थाय गुरवे अर्घ्यं
निवेद्य ।।२३।।
सामान्यपादुकया दीक्षाप्रकरणे पठितगुरुपादुकामन्त्रेण।।२३।।
गुरुपादुका मन्त्र प्रथम खण्ड के सूत्र ४१ में दिया गया है। खण्ड दश
के सूत्र ३२ में भी श्रीपादुका के विषय में चर्चा है। इन सन्दर्भों के अर्थ को
ध्यान में रखते हुए गुरुदेव के दीक्षा नाम के पहले मूल अर्थात् पराबीज का
उच्चारण करते हुए ‘सौः स्वमस्तकस्थामुकानन्दनाथश्रीपादुकां पूजयामि नमः’ मन्त्र
बोलकर गुरुदेव को अर्घ्य देना चाहिये।।२३।।
चिदग्नेरुद्दीपनम्
पुनश्चिदग्निमुद्दीप्तं विभाव्य ।।२४।।
गुरुदेव के अर्घ्य निवेदन के पश्चात् चिदग्नि के उद्दीप्त होने का विभावन
करना आवश्यक माना जाता है।।२४।।

२१० परशुरामकल्पसूत्रम्
ओघत्रयाभ्यर्चनम्
दिव्यौघं तिस्रः पादुकाः, सिद्धौघं तिस्रः, मानवौघमष्टाव-
भ्यर्च्य ।। २५ ।।
दिव्यौघसिद्धौघमानवौघानामर्चनम् आवरणदेवतावदर्चनम्। विशेषार्घ्य-
द्रव्येण स्वहृदय एव कार्यम् ।। २५ ।।
दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ की पूजा क्रमशः तीन, तीन और आठ
की संख्या के कारण पृथक्-पृथक् इतने ही मन्त्रों से की जाती है। जैसे—
१. दिव्यौघ—इस पूजा में तीन पूज्य परिगणित हैं। अघोरानन्दनाथ,
श्रीकण्ठानन्दनाथ के पहले पराभट्टारिका की पूजा की जाती है। जैसे—
अ. सौः पराभट्टारिका-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
आ. अघोरानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
इ. श्रीकण्ठानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. सिद्धौघ—शक्तिधर, क्रोध, त्र्यम्बक ये तीन नाथ इसमें परिगणित हैं। इनके
मन्त्र भी पूर्ववत् बनाने चाहिये। उदाहरणरूप प्रथम मन्त्र जैसे—
‘सौः शक्तिधरानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः’। इसी प्रकार दोनों शेष
नाथों की पूजा करनी चाहिये।
३. मानवौघ—१. सौः आनन्दानन्दनाथ-श्रीपादुकां पूजयामि नमः। इसी तरह
२. प्रतिभादेव्यम्बानन्द, ३. वीरानन्द, ४. संविदानन्द, ५. मधुरा-
देव्यम्बानन्दनाथ, ६. ज्ञानानन्द, ७. श्रीरामानन्द, ८. योगानन्दनाथ सबके साथ
‘श्रीपादुकां पूजयामि नमः’ लगाकर पूजा करनी चाहिये। यह तीनों ओघों
की पूजा है।। २५ ।।
दिव्यौघादीनाह
पराभट्टारिकाऽघोरश्रीकण्ठ-शक्तिधर-क्रोध-त्र्यम्बकनन्द-
प्रतिभादेव्यम्बा-वीर-संविदानन्द-मधुरादेव्यम्बा-ज्ञान-श्रीराम-योगा
इति परापादुकाः ।। २६ ।।

पराक्रमः २११
१. पराभट्टारिका, अघोरा, श्रीकण्ठ इति दिव्यौघः।
२. शक्तिधरः, क्रोधः, त्र्यम्बक इति सिद्धौघः।
३. आनन्दः, प्रतिभादेव्यम्बा, वीरः, संविदानन्दः, मधुरादेव्यम्बा, ज्ञानः,
श्रीरामः, योग इति मानवौघः।।२६।।
सूत्र २५ के अर्थ के साथ दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के क्रमशः
तीन, तीन, आठ अर्चनीय नाथों के नाम दे दिये गये हैं। मन्त्रों की योजना
भी वहीं द्रष्टव्य है।।२६।।
बलिदानम्
ततः कलामनुना बलिं निवेद्य ।।२७।।
ततः अर्चनानन्तरम्। कलामनुना 'सौः' इत्यनेन 'पातु मां परमा कला'
इत्यत्र परायाः कलापदवाच्यत्वं निर्णीतम्। अतस्तन्मनुरसावेव भवितुमर्हति।
बलिदाने धर्माः श्रीक्रमोक्ता ग्राह्याः, साजात्यात्। अत्र जपस्य उपासनाकालस्य
वाऽनुक्तेरयं प्रयोगः सकृदेव। यद्वा, श्यामावार्त्तालीसाहचर्यात् जपसङ्ख्या
अनुक्ता तत्रत्या ग्राह्या। तावज्जपपर्यन्तोपास्तिः। अत एवाग्रे सूत्रकारो जपकालं
वक्ष्यति।।२७।।
ततः अर्थात् परादेव्यम्बा के अर्चन के उपरान्त ही बलिकर्म करना चाहिये।
इसमें निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये—
१. बलि कलामन्त्र से होनी चाहिये।
२. कला पराम्बा को भी कहते हैं। यही मन्त्र 'सौः' है।
३. 'पातु मां परमाकला' के उद्धरण में पराम्बा को ही परमा कला कहते हैं।
४. बलिदान श्रीक्रम के अनुसार करना चाहिये।
५. जप और उपासना के समय अनुक्त हैं। अतः ये कार्य एक बार ही करणीय हैं।
६. जपसंख्या श्यामावार्त्तालीवत् होनी चाहिये।।२७।।
हविःशेषस्वीकारः
हविःशेषमात्मसात्कुर्यात्। इति शिवम् ।।२८।।

२१२ परशुरामकल्पसूत्रम्
हविःशेषमात्मसात्कारः श्रीक्रमवत्। आत्मसात्कुर्यात् इत्येवोक्त्या अत्र
सामयिकाभावः सूचितः। शिवमिति व्याख्यातमेव।।२८।।
।। इति श्रीपरशुरामकल्पसूत्रे श्रीरामेश्वरनिर्मितायां श्रीपरशुरामकल्पसूत्रवृत्तौ
सौभाग्योदयनाम्न्यां (मुख्यांशमात्रायां) पराक्रमो
नामाष्टमः खण्डः सम्पूर्णः ।।८।।
हविःशेष स्वीकार करने के पहले 'सौः' मन्त्र से आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व
और शिवतत्त्व का शोधन करना चाहिये। परापूजा की हवि स्वयं या
स्वसन्ततिक्रमस्थ व्यक्ति को ही देनी चाहिये, दूसरे को नहीं। इति शिवम्।।२८।।
।। श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश-सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का पराक्रम नामक अष्टम खण्ड परिपूर्ण ।।८।।
।। इति शिवम्।।

होमविधिः
[ नवमः खण्डः ]
अथ गणपतिक्रमे नित्यहोमप्रसक्तौ ललिताऽऽदिपुरश्चरणाङ्गहोमस्य
अन्यत्र काम्यहोमस्य वा प्रसक्तौ तदितिकर्त्तव्यताज्ञानस्यावश्यकतया तदर्थं
होमविधिं वक्तुमारभते—
अथ स्वेष्टमन्त्रस्य होमविधानं व्याख्यास्यामः ।।१।।
अथेति पूर्वक्रान्तविच्छेदाद्योतकः। स्वेष्टमन्त्रस्येत्यनेन, अग्रे
सौरवैष्णवादिसर्वसाधारणोपासनाया वक्ष्यमाणत्वाद् अत्रापि सर्वसाधारणो
होमविधिरिति ज्ञापितः।।१।।
अथ शब्द पूर्व में उपक्रान्त विषय के अन्त और नूतन विषय के उपक्रम
का सूचक माना जाता है। सूत्र में निर्दिष्ट स्वेष्टमन्त्रोपासना के प्रयोग में होम
का विधान सभी सम्प्रदायों में है। जैसे सौर सूर्यमन्त्र-जपान्त में होम करते हैं,
इसी तरह वैष्णवादि सम्प्रदायों में भी यही क्रम अपनाया जाता है। इसे
सर्वसाधारण उपासना क्रम में स्वीकृत विधि कहते हैं। इसी आधार पर इस होम-
विधान को भी सर्वसाधारण होम विधान मानना चाहिये।।१।।
ततस्तद्विधिमाह
चतुरस्रं कुण्डमथवा हस्तायाममङ्गुष्ठोन्नतं स्थण्डिलं कृत्वा।।२।।
कुण्डमित्यनेन तन्त्रान्तरोक्तमेखलायोनिखातादिमतिदिष्टं नाम्ना। चतुरस्रं
नित्यम्। प्रजादिकामनायां योनिकुण्डादिकमपि। सूत्रानुयायिनां न मण्डप-
विचारः। अनुक्तत्वाद् असूचितत्वाच्च। आयामो विस्तारः।।२।।

२१४ परशुरामकल्पसूत्रम्
सूत्र में चतुरस्र शब्द के प्रयोग पर बल दिया गया है। अर्थात् सभी प्रकार
के उपक्रमों में कुण्ड चतुरस्र ही होना चाहिये। नैमित्तिक और काम्य प्रयोगों में
कभी इसका अपवाद भी पाया जाता है, जैसे पुत्रसन्तति परम्परा की कामना
में योनिरूप ही कुण्ड बनाया जा सकता है। सूत्रानुसारी निर्देश के अनुयायी
विद्यावान् विद्वान् यह भी मानते हैं कि, इसमें मण्डप की आवश्यकता नहीं।
क्योंकि सूत्र में मण्डप की चर्चा नहीं है। अन्यत्र भी इसका निर्देश नहीं है,
न सूचना ही है।।२।।
सामान्योदकेनावोक्षणम्
सामान्यार्घ्यमुपशोध्य तेनावोक्ष्य ।।३।।
तत्तत्क्रमोक्तविधिना सामान्योदकं निर्मायेत्यर्थः। यदि पूजाङ्गहोमः, तदा
पूजायां कॢप्तेनैव कार्यसिद्धौ न निर्माणम्, अन्यत्र निर्माणमिति ज्ञेयम् ।।३।।
जिस क्रम की पूजा का विधान हो, उसमें सामान्य जल लेकर उसे शुद्ध
कर उससे पूजा द्रव्य का उच्छन करना चाहिये। किसी पूजा के अङ्गरूप में यदि
होम का विधान किया गया हो, तो जो जल प्रयुक्त हो रहा है, उसी से अवोक्षण
होना चाहिये।।३।।
रेखासु ब्रह्मादिदेवतार्चनम्
प्राचीरुदीचीस्तिस्रस्तिस्रो रेखा लिखित्वा ।।४।।
पूर्व और उत्तर तीन-तीन रेखायें खींचनी चाहिये। प्रथम प्रागग्र रेखा और
प्रथम उदगग्र के क्रम से इन पर देवों का आवाहन करने का विधान शास्त्र
में निर्दिष्ट है।।४।।
तासु रेखासु ब्रह्मयमसोमरुद्रविष्ण्विन्द्रान् षट्‌तारी नमः
सम्पुटितानभ्यर्च्य¹ ।।५।।
षट्‌तारी कुमारी प्रथमं ततो ब्रह्मणे नम इति। एवञ्च षट्‌तारनमः-
सम्पुटिता भवन्ति। एवमेव यमायेत्यादौ योज्यम्। नमःसम्पुटितानित्यनन्तरं
१. श्रीक्रम-सूत्र. ८।

होमविधिः २१५
पठित्वेति शेषः। अभ्यर्च्य इत्यस्य कर्मकाङ्क्षायां मन्त्रलिङ्गाद् देवता
योज्याः ।।५।।
उन रेखाओं पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्रम से ब्रह्मा, यम और सोम
की पूजा करनी चाहिये। इसी तरह उदगग्र रेखाओं पर क्रमशः रुद्र, विष्णु और
इन्द्र की पूजा की जाती है। पूजा के मन्त्र देव नामों को त्रितारी और कुमारी
के बाद नमः से सम्पुटित करके बनाते हैं। जैसे—'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः
ब्रह्मणे नमः' इस मन्त्र से ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिये।।५।।
सहस्रार्चिषे हृदयाय नमः, स्वस्तिपूर्णाय शिरसे स्वाहा, उत्तिष्ठ
पुरुषाय शिखायै वषट्, धूमव्यापिने कवचाय हुम्, सप्तजिह्वाय
नेत्रत्रयाय वौषट्, धनुर्धराय अस्त्राय फट् इति षडङ्गं विधाय तेन
षडङ्गेन कुण्डमभ्यर्च्य ।।६।।
उक्तषण्मन्त्रैः स्वदेहे हृदयादिषडङ्गन्यासानन्तरं कुण्डे तैरेव मन्त्रैः
अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गयुवतीः पूजयेत्।।६।।
सूत्र में छः मन्त्र निर्दिष्ट हैं। इन मन्त्रों से षडङ्गन्यास करना चाहिये। इन्हीं
मन्त्रों से कुण्ड-मध्य और ऊर्ध्वादि चतुर्दिक् कुण्डशक्तियों की अर्चना करनी
चाहिये।।६।।
ततोऽग्निचक्रनिर्माणादिकमाह
तत्राष्टकोणषट्कोणत्रिकोणात्मकम् अग्निचक्रं विलिख्य
पीतायै, श्वेतायै, अरुणायै, कृष्णायै, धूम्रायै, तीव्रायै, स्फुलिङ्गिन्यै,
रुचिरायै, ज्वालिन्यै नम इति त्रिकोणमध्ये वन्हेः पीठशक्तीः
सम्पूज्य—तं तमसे, रं रजसे, सं सत्त्वाय, आम् आत्मने, अम्
अन्तरात्मने, पं परमात्मने, ह्रीं ज्ञानात्मने नम इति तत्रैवा-
भ्यर्चयेत् ।।७।।
कुण्डे स्थण्डिले वा अष्टकोणादिनिर्माणं प्रवेशरीत्या कार्यम्,
त्रिकोणस्याभ्यन्तरे भूरिदर्शनात्। पीतायै इत्यादितो ज्ञानात्मने नम इत्यन्तं
स्पष्टम्। तत्रैव त्रिकोण एव। क्रमस्तु स्वाग्रादिप्रादक्षिण्येन।।७।।

२१६ परशुरामकल्पसूत्रम्
यह होमकुण्ड और स्थण्डिल दोनों स्थानों पर किया जा सकता है। कुण्ड
में होम करना हो, तो उसमें या स्थण्डिल (वेदी) पर करना हो तो उस पर
ही प्रवेश क्रम के अनुसार अष्टकोण, षट्कोण या त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का
निर्माण करना चाहिये। प्रचलन त्रिकोणात्मक अग्निचक्र का ही है। यह आचार्य
पर निर्भर करता है कि, होम के अनुसार अग्निचक्रों का निर्माण करे। कुण्ड
और स्थण्डिल के आकार-प्रकार पर भी यह निर्भर करता है।
त्रिकोण के मध्य में अग्नि देवता की नौ पीठशक्तियों की स्थापना और
पूजा करनी चाहिये। उनके नाम क्रमशः हैं—पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णा,
धूम्रा, तीव्रा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिरा और ज्वालिनी। तत्पश्चात् उसी त्रिकोण में
तमस्, रजस्, सत्त्व, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा की इनके
आदि अक्षरों का बिन्दुयुक्त बीज बनाकर इनके चतुर्थ्यन्त रूप के साथ मन्त्रात्मक
उच्चारण कर पूजा करनी चाहिये। जैसे—
१. तं तमसे नमः अभ्यर्चयामि तर्पयामि नमः।
२. रं रजसे नमः, ३. सं सत्त्वाय नमः, ४. आम् आत्मने नमः, ५. अं
अन्तरात्मने नमः, ६. पं परमात्मने नमः। ७. ज्ञानात्मा के पहले ह्रीं बीजमन्त्र
लगाते हैं। जैसे—ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इन सरल मन्त्रों से ही इन पीठशक्तियों
की पूजा सम्पन्न होती है॥७॥
एवं पीठशक्तिपूजामुक्त्वा ततोऽग्निप्रतिष्ठामुपदिशति
ततो जनयिष्यमाणवह्नेः पितरौ वागीश्वरीवागीश्वरौ पीठेऽभ्यर्च्य
तयोर्मिथुनीभावं भावयित्वा ‘ह्रीं वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः’ इति
ध्यात्वा॥८॥
पीठे त्रिकोणात्मके अभ्यर्चितदेवताविशिष्टे तयोर्वागीश्वरीवागीश्वरयो-
र्मिथुनीभावं मैथुनकर्म मनसा भावयित्वा। ध्यात्वेति ध्यानं कामेश्वरीकामेश्वरवत्
तदभिन्नत्वात्॥८॥
इसी त्रिकोणात्मक पीठ में, जिसमें पहले अग्नि-शक्तियों और शक्तिमन्तों
की पूजा की जा चुकी है, उसी में अग्नि की प्रतिष्ठा करनी होती है। अग्नि

होमविधि: २१७
अभी उत्पन्न नहीं किया गया है। परशुरामकल्पसूत्र के अनुसार अग्नि के माता-
पिता वागीश्वरी और वागीश्वर माने जाते हैं। इन दोनों का मैथुनभाव सम्पन्न होने
पर अग्नि का जन्म स्वाभाविक माना जा सकता है। अतः इनके इसी भाव का
मन ही मन भावन करना चाहिये। इसके पहले उसी पीठ में इन दोनों की पूजा
भी कर लेनी चाहिये। मनसा भावन करने के बाद इनसे सम्बद्ध 'ह्रीं
वागीश्वरीवागीश्वराभ्यां नमः' इस मन्त्र को बोलते हुए दोनों का ध्यान करना
चाहिये।।८।।
संविदग्निपातनम्
अरणेः सूर्यकान्ताद् द्विजगृहाद्वा वह्निमुत्पाद्य मृत्पात्रे ताम्रपात्रे
वा आग्नेय्यामैशान्यां नैर्ऋत्यां वा निधाय, अग्निशकलं क्रव्यादांशं
नैर्ऋत्यां विसार्य निरीक्षणप्रोक्षणताडनावकुण्ठनादिभिर्विशोध्य ॐ
वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय स्वाहा इति
मूलाधारोद्गतं संविदं ललाटनेत्रद्वारा निर्गमय्य तं बाह्याग्नियुक्तं
पातयेत् ।।९।।
अरणिः प्रसिद्धः। द्विजगृहेभ्यः पचनाग्निस्तस्यानयनमेव तदुत्पादनम्।
पात्रनियममाह—मृत्पात्र इति। स्थापनदेशनियममाह—आग्नेय्यामिति।
क्रव्यादांशं अमेध्यांशम् इत्यर्थः, 'य एतान् क्रव्यात् तमपहृत्य मध्येऽग्नौ
कपालमुपदधाति' इति श्रुतेः। विसार्य बहिर्निरस्य। निरीक्षणं स्वनेत्राभ्याम्।
प्रोक्षणं सामान्यार्घ्योदकेन। ताडनम् अभिघाताख्यः संयोगविशेषः। अवकुण्ठनं
पूर्वदर्शितमुद्रा। आदिपदेन धेनुयोनी। स्थलान्तरे अवकुण्ठनसहपाठात्। एतै-
र्विशोध्य संस्कृत्य। तस्मिन् पात्रे चिदग्न्यावाहनप्रकारमाह—ॐ वैश्वानरेति।
ललाटनेत्रद्वारा भ्रूमध्यद्वारा। निर्गमय्य निर्गमनं विभाव्य। तं चिदग्निं बाह्या-
ग्नियुक्तम्। इत्यनेन चिदग्नेः प्राधान्यं सूचितम्, भृत्ययुक्तराजेतिवत्। पातयेद्
इत्यस्मात् पूर्वं पूर्वनिर्मिताग्निचक्रे इति शेषः।।९।।
वागीश्वरी और वागीश्वर की कृपा से ही अग्नि अरणि से उत्पन्न होता
है। अरणि न हो तो सूर्यकान्त मणि से अग्नि उत्पन्न करना चाहिये। यह

२१८ परशुरामकल्पसूत्रम्
भी सम्भव न हो, तो ब्राह्मण के घर से अग्नि ले आना चाहिये। अग्नि
को मृत्पात्र अथवा ताम्रपात्र में लाना चाहिये। अग्नि लाकर अग्नि, ईशान
या नैऋत्य में रखना चाहिये। उसमें से श्रुति-परम्परानुसार अमेध्य अंश को
क्रव्याद कोण में फेंककर कुण्ड में रखने के पहले उसका निरीक्षण, प्रोक्षण,
ताडन, अवकुण्ठन तथा धेनु और योनि मुद्रा विधियों से उसका विशोधन
भी कर लेना चाहिये।
तत्पश्चात् 'ॐ वैश्वानर जातवेद इहावह लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय
स्वाहा' इस मन्त्र से मूलाधार चक्र से उद्गत संवित् रूप चिदग्नि को भ्रूमध्यनेत्र
द्वारा निकाल कर उस बाह्य अग्नि में मिलाकर कुण्ड में उसका संपात करना
चाहिये।।९।।
इन्धनैराच्छादनम्
कवचमन्त्रेण इन्धनैराच्छाद्य ।।१०।।
कवचमन्त्रेण 'हुं' इत्यनेन।।१०।।
कवचमन्त्रेण इस तृतीयान्त प्रयोग से यह प्रतीत होता है कि, इस बीज
मन्त्र में आच्छादन के साधकतमत्व की व्याप्ति है। इसके द्वारा आच्छादित होना
एक रहस्यभरा आध्यात्मिक प्रयोग है।।१०।।
अथोपस्थानमाह
अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम्।
सुवर्णवर्णमनिलं समिद्धं विश्वतोमुखम्।। इत्युपस्थाय ।।११।।
उपस्थानं नाम अग्नेरपरभागे कृताञ्जलेस्तिष्ठतो मन्त्रपाठः ।।११।।
'मैं प्रज्वलित अग्नि की वन्दना कर रहा हूँ। अग्नि जातवेद (जातवेदस्)
है। यह ज्ञानरूप है। यह हुताशन है। दी हुई आहुतियों का प्राशन कर देवताओं
तक पहुँचाता है। यह सोने के समान सुन्दर है। इसे अनल कहते हैं। अच्छी
तरह प्रज्वलित है और चारों ओर से इन्धन को ग्रास बनाकर आत्मसात् करता
है।' इस श्लोकरूप मन्त्र से इस तरह प्रार्थना करते हुए उसके पास अञ्जलिबद्ध
बैठने की मुद्रा का नाम ही उपस्थान है।।११।।

अष्टम से दशम खण्ड: होम, प्रायश्चित्त, कौल-धर्म एवं कल्पसूत्र उपसंहार

होमविधिः २१९
भूमौ मृण्मयपात्रे पूर्वम्, आग्नेयान्यतमदिक्षु स्थापिताग्नेः कुण्डे
प्रक्षेपार्थम् उत्थापने मन्त्रमाह—
'उत्तिष्ठ हरितपिङ्गल लोहिताक्ष सर्वकर्माणि साधय मे देहि
दापय स्वाहा' इति वह्निमुत्थाप्य ।।१२।।
एतेन ॐ वैश्वानरेति, बहिर्निर्गमय्य कुण्डे प्रक्षेपात् प्राग् अर्थक्रमेण
पाठक्रमं बाधित्वा प्रयोगानुष्ठानकाले पाठः, उत्थापनस्य प्रक्षेपपूर्व-
कालिकत्वात्।।१२।।
यह मन्त्र अग्नि के उत्थापन का है। उत्थापन वह क्रिया है, जो प्रक्षेप
के पहले सम्पन्न होती है। शास्त्र में एक नीति ऐसे अवसरों पर अपनायी जाती
है। वह है—'पाठक्रमेण अर्थक्रमो बलीयान्'। इसलिये इस मन्त्र से अग्नि को
उठाकर ॐ वैश्वानर (सूत्र-९) इस मन्त्र से प्रक्षेप करना उचित है। मन्त्र का
अर्थ स्पष्ट है।।१२।।
प्रज्वालनमन्त्रमाह
चित्पिङ्गल हन हन दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा इति
प्रज्वाल्य ।।१३।।
प्रज्वालनं वेणुधमन्या 'मुखेनाग्निं नोपधमेत्' इति श्रुतेः।।१३।।
बाँस की धमनी (फोंफी) अर्थात् पतले बाँस की एक पर्वमयी या गाँठों
के भीतर छेद कर २-३ पर्वमयी भी बनायी जाती है। उसी से आग को प्रज्वलित
किया जाता है। श्रुति कहती है कि, अग्नि को मुह से नहीं फूँकना चाहिये।
इसी परम्परा के अनुसार आग को धमनी से प्रज्वलित करना उचित है। मन्त्रार्थ
स्पष्ट है।।१२।।
उत्पन्नाग्नेः संस्कारानाह
षट्‌तारवाचो नमोमन्त्रेण पुंसवनसीमन्तजातकर्मनामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनगोदानविवाहकर्माण्यमुकाग्नेरमुककर्म कल्पयामि
नम इति विधाय ।।१४।।

२२० परशुरामकल्पसूत्रम्
षट्‌तारवाच उक्ताः। नमोमन्त्रेण नमोऽन्तमन्त्रेण। स्वयमेव नमोऽन्तमन्त्रं
विवृणोति—अमुकेत्यादिना। इत्थं च प्रथमं षट्‌तारी तत ऐं, तत
इष्टदेवतानाम, ततोऽग्निशब्दः, षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम, ततोऽग्निशब्दः
षष्ठ्यन्तः पुंसवनादिकर्मनाम द्वितीयान्तं, ततः कल्पयामीति।।९४।।
कुण्ड में प्रज्वलित अग्नि का संस्कार भी आवश्यक होता है। सूत्र में
पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चौल, उपनयन, गोदान और
विवाह का सनामग्रहण उल्लेख है। इन संस्कारों के लिये मन्त्र का प्रयोग करना
आवश्यक है। सूत्रकार मन्त्र का निर्देश भी कर रहे हैं। उनके अनुसार सर्वप्रथम
षट्‌तारी का प्रयोग करना चाहिये। षट्‌तारी में त्रितारी और कुमारी दोनों आते
हैं। कई अवसरों पर इनके प्रयोग किये गये हैं। वस्तुतः त्रितारी में 'ऐं ह्रीं श्रीं'
ये बीजत्रितय आते हैं। इसी तरह कुमारी में 'ऐं क्लीं सौः' ये तीन बीज आते
हैं। इन दोनों को मिलाकर षट्‌तारी बीज मन्त्र बनते हैं। पहले षट्‌तारी इसके
बाद वाग्भव बीज 'ऐं' और इसके बाद अग्नि में षष्ठी विभक्ति लगाकर पुंसवन
आदि संस्कारों के नाम लेने चाहिये। उसके बाद 'कर्म कल्पयामि नमः' बोलकर
संस्कार सम्पन्न करना चाहिये। इस तरह 'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ऐं हुताशनस्य
पुंसवनकर्म कल्पयामि नमः' यह मन्त्र बनता है। इसी क्रम में सभी संस्कारों
के मन्त्र बनते हैं। इनसे अग्नि का संस्कार होता है।।९४।।
परिषेचनादि
परिषिच्य परिस्तीर्य परिधाय ।।९५।।
परिषिच्य अनुक्तत्वादीशानीमारभ्य प्रदक्षिणं समन्तात् सामान्या-
र्घ्योदकेन। परिस्तीर्य परिस्तरणे एकैकदिशि चत्वारो दर्भाः, 'अग्निं
षोडशभिर्दर्भैः परितस्तु परिस्तरेत्' इति वचनात्। परिधाय श्रौतोक्तधर्मक-
समिद्भिः प्राग्वर्जं त्रिषु। क्रमादिकं काष्ठनियमः श्रौतात् ज्ञेयः।।९५।।
सूत्रकार ने परिषेचन, परिस्तरण और परिधान रूप तीन कार्यों का निर्देश
दिया है। इसमें विधि अनुक्त है। अतः गुरुपरम्परा के ही अनुसार ये तीनों कार्य
सम्पन्न करने चाहिये—
१. परिषेचन—ईशानकोण से सामान्य अर्घ्यजल से करना उचित है। इसमें
प्रदक्षिण क्रम अपनाने का निर्देश वृत्तिकार ने दिया है।