परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोमविधिः २२७
२. ॐ भुवो वायवे चान्तरिक्षाय च महते च स्वाहा।
३. ॐ सुवरादित्याय च दिवे च महते च स्वाहा।
४. ॐ भूर्भुवस्सुवश्चन्द्रमसे च नक्षत्रेभ्यश्च दिग्भ्यश्च महते च
स्वाहा। इति चतुर्भिर्मन्त्रैर्महाव्याहृतिहोमं कृत्वा।।२६।।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः (सुवः) (ॐभूर्भुवस्सुवः) इनको
महाव्याहृतियाँ कहते हैं। ये तीन होती हैं। इनसे सूत्रानुसार हवन करना
चाहिये।।२६।।
ब्रह्मार्पणाहूतिमाह
इतः पूर्वं प्राणबुद्धिदेहधर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नावस्थासु
मनसा, वाचा, कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना यत् स्मृतं,
यदुक्तं, यत्कृतं तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु स्वाहा इति ब्रह्मार्पणाहूतिं
कृत्वा।।२७।।
प्राण, बुद्धि और देह इन तीनों से अणु पुरुष बद्ध है। इसमें जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति की तीन अवस्थाओं का प्रभाव पड़ता है। इससे प्रभावित
पुरुष मन, वाणी और कर्म के संस्कार ग्रहण करता है। मन से स्मरण करता
है। वाणी से बोलता है और तदनुसार हाथ, पैर, उदर, शिश्न इन चारों से
काम करता है। निष्काम भाव से इनका समर्पण ब्रह्म में होना ही चाहिये।
ब्रह्मार्पण सर्वश्रेयस्कर कार्य माना जाता है। अन्त में यह करना ही
चाहिये।।२७।।
अग्निदेवतयोरुद्वासनमाह
चिदग्निं देवतां चात्मन्युद्वासयामि नम इत्युद्वास्य ।।२८।।
उद्वासनं खेचरीमुद्रया।।२८।।
पहले आवाहित चिदग्नि और आवाहित देवता का उद्वासन कर
देना चाहिये। उद्वासन की यह प्रक्रिया खेचरी मुद्रा द्वारा सम्पन्न होती
है।।२८।।