परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २३१
मध्य में बिन्दु, तीन षट्कोणयुक्त भाग के चारों ओर अष्टदल और पुनः
चतुर्दल, दो कमल एक चतुष्कोण (चतुर्भुज सम) के अभ्यन्तर भाग में बनाकर
चक्र पूरा करना चाहिये।।४।।
षडावरणीपूजा
बिन्दौ मुख्यदेवतेच्छाज्ञानक्रियाशक्तयस्त्र्यस्रे। षडरे तत्तत्षडङ्गा-
न्यष्टदले ब्राह्मयाद्याः, चतुर्दले गणपति-दुर्गा-वटुकक्षेत्रेशाश्चतुरस्रे
दिक्पालाः ।।५।।
बिन्दौ मुख्यदेवता। द्वितीयावरणम् इच्छेति। क्रमः स्वाग्रादिप्रादक्षिण्येन।
तृतीयमाह—षडर इति। क्रमः पूर्ववत्। चतुर्दले पञ्चमावरणे। चतुरस्रेऽपि
तथैव प्रागादीशानान्तम् ऊर्ध्वम् अधश्च ज्ञेयम्। एवं षडावरणीपूजा।।५।।
सर्वत्र प्रधान देवता की पूजा अन्त में होती है; किन्तु सूत्र में प्रधान
देवता की बिन्दु में पूजा का निर्देश है। द्वितीय आवरण में इच्छा, ज्ञान और
क्रिया शक्तियों की पूजा करनी चाहिये। तृतीय आवरण में षडर पूजा सम्पन्न
होती है। इसमें अग्नि से ईशानान्त पूजन क्रम में ब्राह्मी आदि आठ देवियों
की पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरण की पूजा चतुर्दल में की जाती है।
छठें आवरण की पूजा दिक्पालों की पूजा होती है। पूर्व से ईशान कोण तक
आठ दिक्पाल ऊर्ध्व और अधस्तात् मिलकर दश दिशाओं के दश दिक्पाल
होते हैं।।५।।
सर्वमन्त्रेषु योज्यानि बीजान्याह
त्रितारीकुमारीभ्यां सर्वे क्रममन्त्राः प्रयोक्तव्याः ।।६।।
त्रितारी श्रीक्रमोक्ता। कुमारी बाला।।६।।
त्रितारी ‘ऐं ह्रीं श्रीं’ और कुमारी ‘ऐं क्लीं सौः’ को कहते हैं। सभी क्रम
मन्त्रों में इनका प्रयोग किया जा सकता है।।६।।
आवाहनादि-मन्त्राः
तत्तन्मूलेनावाहनं, कलामनुना बलिरनेन क्रमेणाहुतीः ।।७।।