परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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इस विद्या का नाम जलापच्छमनी विद्या है। इसके प्रयोग से जल में डूबने
से आदमी बच जाता है। मन्त्र ‘ॐ तारे तुत्तारे तुरे स्वाहा’ तैरते समय इसका
जप करना चाहिये।।१४।।
पञ्चममन्त्रमाह
अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नम इति
महाव्याधिविनाशिनी नामत्रयविद्या पञ्चमा रश्मयो मूलादिपरिकरतया
प्रपञ्च्य ।।१५-१६।।
इमा उक्ता रश्मयः। परिकरतया तदाधारतया प्रपञ्च्या योज्या
इत्यर्थः।।१५-१६।।
‘अच्युताय नमः’ ‘अनन्ताय नमः’ ‘गोविन्दाय नमः’ यह नामत्रयी विद्या
है। इसमें ॐकार का प्रयोग नहीं किया गया है। इसके प्रयोग से महाव्याधियाँ
भी निराकृत हो जाती हैं। व्याधि के स्थान पर पञ्चकोणीय प्रयोग करते रहना
चाहिये। तथा इसे पढ़ते रहना चाहिये।।१५-१६।।
अथ तृतीयपञ्चके प्रथममाह
१. प्रणवः कमला भुवना मदनो ग्लाचतुर्दशपञ्चदशौ गं
गणपतये वरयुगलं द सर्वजनं मे शब्दो वशमानयाग्निवामलोचनेति
महागणपतिविद्या प्रत्यूहशमनी।।१७।।
कमला श्रीं, भुवना ह्रीं, मदनः क्लीं ग्लात् चतुर्दशः औ,
पञ्चदशोऽनुस्वारश्च, मिलित्वा ग्लौं। वरयुगलं वरद्वयम्। ततः शब्दं इति शब्दं
च त्यजेत्। अवशिष्टाः सर्वे वर्णा मन्त्रावयवाः। वह्निवामलोचना स्वाहा इति
चरमं पठेत्। प्रत्यूहशमनी विघ्नविनाशिनी।।१७।।
यह तीसरे पञ्चक का पहला मन्त्र है। इसे महागणपति विद्या कहते हैं।
यह विघ्नों का विनाश करती है। इसके कूट शब्दों में मन्त्र छिपा हुआ है।
जैसे—
१. प्रणव = ॐ, २. कमला = श्रीं, ३. भुवना = ह्रीं, ४. मदन = क्लीं,
५. ‘ग्ल’ से चौदहवाँ स्वर = औ पन्द्रहवाँ = अनुस्वार, कुल मिलाकर ग्लौं,