परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः २३३
उस महत्त्वपूर्ण क्षण में इसके स्मरण से नया आयाम खुलता है। इसके
तुरत बाद ब्रह्मरन्ध्र में गुरु के ध्यान का भी विधान है। यह प्रातःकालीन
कृत्य है॥९॥
अथ रश्मिमालासंज्ञकान् पुंमन्त्रान् दर्शयति
१. प्रणवो भूर्भुवस्सुवस्तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो
नः प्रचोदयात्। इति त्रिंशद्वर्णा गायत्री।
२. यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कुरु मघवञ्छग्धि तव तन्न
ऊतये विद्विषो विमृधो जहि।। स्वस्तिदा विशस्पतिर्वृत्रहा विमृधो
वशी। वृषेन्द्र पुर एतु नः स्वस्तिदा अभयङ्करः। इत्यैन्द्री
सप्तषष्ठ्यर्णा सङ्कटे भयनाशिनी।
३. प्रणवो घृणिः सूर्य आदित्य इत्यष्टाण्णा भयनाशिनी।
४. प्रणवः केवलो ब्रह्मविद्या मुक्तिदा। सौरी तेजोदा।
५. तारः परोरजसे सावदोम् इति नवार्णा तुर्यगायत्री
स्वैक्यविमर्शिनी। रश्मिपञ्चकमेतन्मूलहृत्फालविधिबिल-
द्वादशान्तबीजतया विमृष्टव्यम्॥१०॥
'त्रिंशद्वर्णा गायत्री' इत्यादिभिर्वक्ष्यमाणे रश्मिमालाऽवयवमन्त्रसंज्ञा
दर्शिता। ऐन्द्री इन्द्रदैवत्या। सङ्कटे दावाग्निव्याघ्रादिप्राणसङ्कटे। तेजोदातेजः
स्वदर्शनेन परेषां स्वस्मिन् उत्कर्षप्रतिपादिका शक्तिः, तस्या दायिनी। प्रणवः
केवलः प्रणवोच्चारणमेव। ब्रह्मविद्या ब्रह्मविद्याप्रतिपादिका। तारः प्रणवः।
तदुक्तं विश्वामित्रकल्पे—
गायत्र्यास्तुर्यपादोऽयं त्रिपदाया ह्युदाहृता। इति। स्वैक्यविमर्श आत्मरूपं
ज्ञानम्। तत्रदायिका। एतत्-तत्सवितुरिति गायत्रीमारभ्य गायत्रीतुर्यपादपर्यन्तं
यद् रश्मिपञ्चकं रश्मीनां प्रकाशशक्तिमत्वाद् अमीष्वपि तत्त्वे रश्मिशब्देन
व्यवहारः। क्रमेण मूले मूलाधारे हृदि, ललाटे, विधिबिले ब्रह्मरन्ध्रे, द्वादशान्ते
विमृष्टव्यं भावयितव्यम्॥१०॥