परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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आठ कोणों में कहाँ किसकी पूजा की जाय, इसका स्पष्ट निर्देश नहीं
है। अतः परम्परा के अनुसार आचरण करना चाहिये। पूरब से अग्नि होते हुए
ईशान तक के क्रमिक कोणों में पूजा का प्रचलन है। षट्कोण में भी यही क्रम
अपनाना चाहिये। इसमें षडङ्ग पूजन करना होता है। त्रिकोण में अग्नि मन्त्र से
पूजा की जाती है। पूजन में पञ्चोपचार विधि अपनायी जाती है।।१७।।
सप्तजिह्वाहुतीराह
हिरण्यायै, कनकायै, रक्तायै, कृष्णायै, सुप्रभायै, अतिरक्तायै,
बहुरूपायै नम इत्यग्नेः सप्तजिह्वासु मूलशुद्धेनाज्येन सप्ताहुतीः
कुर्यात् ।।१८।।
नम इति सर्वत्रानुषज्यते। मूलशुद्धेन मूलाभिमन्त्रणेन संस्कृतेन।
अभिमन्त्रणं संख्यानुक्तेः सकृन्मूलेन। नमःपदोत्तरं स्वाहायोगः, होमरूप-त्वात्।
'स्वाहा होमे तर्पणे तु तर्पयामीति योजयेत'। इति योगिनीतन्त्र-
वचनात् ।।१८।।
अग्नि की सात जिह्वायें प्रसिद्ध हैं। इनके नाम क्रमशः हिरण्या, कनका,
रक्ता, कृष्णा, सुप्रभा, अतिरक्ता, बहुरूपा हैं। इन सातों जिह्वाओं में मूलमन्त्र
से अभिमन्त्रित आज्य (शुद्ध घी) से सात आहुतियाँ दी जानी चाहिये।
आहुति देते समय सूत्र में लिखित नमः शब्द के बाद 'स्वाहा' अवश्य
जोड़ना चाहिये। एक नियम है कि, होम में स्वाहा और तर्पण में तर्पयामि क्रिया
का योग करना चाहिये। यह योगिनीतन्त्र का निर्देश है।।१८।।
कर्मशेषमुपदिशति सूत्रान्तरेण
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरग्नेस्त्रिधाहुतिं विधाय ।।१९।।
वैश्वानरोत्तिष्ठ चितिपिङ्गलैरिति पूर्वपठितैस्त्रिभिर्मन्त्रैरित्यर्थः। त्रिधात्रिवारम्।
अनेन कर्माभ्यासः, नाहुतिभेदः। वैश्वानरादिमन्त्रत्रये स्वाहाकारोऽस्ति।
तथाप्यन्यस्वाहाकारो होमकाले योज्यः। तदुक्तं शक्तिसङ्गमतन्त्रे—"मन्त्रान्ते या
वह्निजात्या सा तु मन्त्रस्वरूपिणी। तदन्ते प्रत्युञ्जीत सा होमाङ्गतया
मता"।।१९।।