परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ परशुरामकल्पसूत्रम्
द्वितीयपञ्चके द्वितीयमन्त्रमाह
प्रणवो गन्धर्वराज विश्वावसो मम अभिलषितामुकां कन्यां
प्रयच्छ ततोऽग्निवल्लभेत्युत्तमकन्याविवाहदायिनी विद्या ।।१२।।
अमुकेत्यत्र अभिलषितकन्यानामनिक्षेपः। नात्रोहः सर्वनाम्ना निर्देशात्,
'अदीक्षितायं ब्राह्मणः' इतिवत्। अग्निवल्लभा स्वाहा।।१२।।
द्वितीय रश्मिमाला मन्त्र में सर्वप्रथम चाक्षुषमती विद्या का प्रयोग था।
उसका दूसरा उत्तम कन्याविवाहदायिनी विद्या से सम्बद्ध मन्त्र है। इसका मन्त्र
'ॐ गन्धर्वराज विश्वावसो मम अभिलषितामुकां कन्यां प्रयच्छ स्वाहा' है। इस
मन्त्र में अमुकां की जगह अभीप्सित कन्या का नाम लगाकर बोलना चाहिये।
यह सच्ची विद्या है। इसमें किसी प्रकार का तर्क व्यर्थ है।।१२।।
तृतीयमन्त्रमाह
तारो नमो रुद्राय पथिपदे स्वस्ति मा सम्पारय इति मार्ग-
सङ्कटहारिणी विद्या।।१३।।
मार्गे यत् सङ्कटं चोरादिजनितं तस्य हारिणी।।१३।।
मन्त्र 'ॐ नमो रुद्राय पथिषदे स्वस्ति मा सम्पारय' इस विद्या को
मार्गसङ्कटहारिणी विद्या कहते हैं। अभिघात या चोर आदि को मार्ग-सङ्कट
कहते हैं। आधुनिक सङ्कटों का ओर-छोर नहीं। गाड़ियों की टक्कर, गोली,
लूट, छिनैती और अपहरण आदि तो साधारण हैं। विष पिलाकर मार डालने
की बातें भी सङ्कट में ही आती हैं। इस विद्या के प्रयोग से सारे सङ्कट
नष्ट हो जाते हैं।।१३।।
चतुर्थमन्त्रमाह
तारस्तारे पदमुक्त्वा तुत्तारे तुरे शब्दं च दहनदयितेति
जलापच्छमनी विद्या।।१४।।
पदमुक्त्वेति शब्दं चेति त्यक्त्वा शेषं 'ॐ तारे तुत्तारे तुरे' इति
पठित्वा दहनदयितां पठेत्।।१४।।