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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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होमविधिः २२१
२. परिस्तरण—श्रुति का वचन है कि, चारों ओर मिलकर १६ दर्भों से अग्नि
का परिस्तरण होना चाहिये। इसलिये चार-चार दर्भ चारों ओर परिस्तृत
करना चाहिये। इसके बाद पूजा की जानी चाहिये।
३. परिधाय—इस प्रक्रिया में स्रुक्, स्रुवा इत्यादि का रखना, स्थाली आदि
की प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिये। साथ ही कुण्ड में समिधाओं की किस
प्रकार व्यवस्था हो, इसको ध्यान में रखना चाहिये। यज्ञ में ये विधियाँ
प्रचलित हैं ॥१९५॥
साधिताग्नेर्ध्यानम्
त्रिनयनमरुणाभं बद्धमौलिं सुशुक्लां
शुकमरुणमनेकाकल्पमम्भोजसंस्थम् ।।
अभिमतवरशक्तिस्वस्तिकाभीतिहस्तं
नमत कनकमालालङ्कृतांसं कृशानुम् ।।
इति ध्यात्वा ।।१९६।।
यह अग्नि के ध्यान का मन्त्रात्मक श्लोक स्वयं ग्रन्थकार की स्वोपज्ञ
रचना है। इससे अग्नि का ध्यान करना चाहिये। इसका अर्थ इस प्रकार है—
तीन नेत्रों वाले, ताम्रवर्णी, बद्धमौलि, शुक्ल अंशुकधारी, सुन्दर, अरुण कमल
में अवस्थित, अभीष्टवरमुद्रा, शक्ति, स्वस्तिक और अभय मुद्रा में विराजमान
स्कन्ध पर शोभमान स्वर्णहार समन्वित हुताशन अग्निदेव को सभी प्रणति
निवेदन करें।।१९६।।
पूर्वकल्पिताग्निचक्राष्टकोणादिषु देवतास्थापनमाह
अष्टकोणे जातवेदसे सप्तजिह्वाय, हव्यवाहाय अश्वोदराय
वैश्वानराय कौमारतेजसे विश्वमुखाय देवमुखाय नमः, इति षट्कोणे
षडङ्गं, त्रिकोणे अग्निमन्त्रेण अग्निं पूजयित्वा ।।१९७।।
अष्टकोणे अनुक्तत्वात् प्रागादिप्रादक्षिण्यक्रमः। षट्कोणेऽपि तथैव।
अग्निमन्त्रेण 'अग्निं प्रज्वलितम्' इत्युपस्थापनमन्त्रेण, अग्निलिङ्गस्य
स्पष्टत्वात्। पूजने च पञ्चोपचारैर्मन्त्रावृत्त्या ज्ञेयम् ।।१९७।।