परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वसाधारणक्रमः
[ दशमः खण्डः ]
अथ सामान्यकर्माधिकारः
प्रथमखण्डे दीक्षानन्तरं सर्वमन्त्राधिकारी भवतीत्युक्तत्वात्
श्रीत्रिपुरसुन्दर्युपास्तेर्निष्कामरूपतया यदा सङ्कटे कामनावशात्
सूर्यविष्णुभैरवाद्युपास्तिप्रसक्तिस्तदितिकर्त्तव्यताज्ञानार्थं तन्त्रान्त-
रोपास्तिं सूत्रानुयायी मा करोतु, इति तदुपासनासिद्धये किञ्च
रश्मिमालादिषु प्रत्येकं मन्त्राणां फलश्रवणात् तत्तत्कामनया
तत्तदुपास्तिप्रसक्तौ, अपि च कश्चन उपासनायां श्रद्धावान् ललितो-
पास्तौ च अनधिकारी तस्य शिवविष्ण्वाद्युपासनां प्रवर्त्तयतु इति
परमकृपालुः श्रीपरशुरामः सर्वसाधारणीम् उपासनासरणिं दर्शयति।
अथातः सर्वेषां मन्त्राणां सामान्यपद्धतिं व्याख्यास्यामः॥१॥
अथ त्रिपुरसुन्दर्युपास्तिप्रकारदर्शनानन्तरम्। अतोऽवतरणि-
कायामुक्तहेतोः। सर्वेषां गणपतिललिताश्यामावार्त्तालीभिन्नानां यावतां मन्त्राणाम्।
सामान्यपद्धतिं साधारणसरणिम्॥१॥
अथ अव्यय त्रिपुरसुन्दरी की उपासना के बाद के क्रम का निर्देशक है।
इस सूत्र में सर्वसाधारण-क्रम विषयक उपासना की व्याख्या की प्रतिज्ञा कर रहे
हैं। वास्तव में दीक्षा के बाद सभी मन्त्रों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। यह
भी निश्चित तथ्य है कि, माँ की उपासना निष्काम रूप होती है। ऐसी प्रवृत्ति
काम्य कर्म की ओर ही यदि झुकने लगे, तो उस दशा में साधक क्या करे?
संमर्शी सूत्रकार इसी का संविधान इस खण्ड में दे रहे हैं। इसीलिये इस खण्ड