परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ परशुरामकल्पसूत्रम्
एवमग्निसंस्कारानुक्त्वा प्रधानहोमधर्मानुपदिशति
अथ प्रधानदेवतायै दशाहुतीर्जुहुयात् ॥२२॥
अथेत्यनेन अङ्गदेवताहोमविच्छेदः सूचितः। एतावत्पर्यन्तं सर्वप्रयोग-
साधारणम्। पुरश्चरणाङ्गहोमः काम्यहोमो वा सर्वोऽप्येतदुत्तरं भवति ॥२२॥
अथ अव्यय का प्रयोग पूर्ववर्ण्य के विच्छेद और नव वर्णनीय के आरम्भ
का सूचक है। इस सूत्र में अङ्गदेवताओं से सम्बद्ध होम की समाप्ति की सूचना
और प्रधान देवता को दश आहुति देने का निर्देश है। पुरश्चरणाङ्ग होम या काम्य
होम इसके बाद ही होते हैं॥२२॥
काम्यहोमविधिः
यदि काम्यमीप्सेदभीष्टदेवतायै विज्ञाप्य सङ्कल्पं कृत्वैतावत्कर्म-
सिद्ध्यर्थमेतावदाहुतीः करिष्यामीति ॥२३॥
विज्ञाप्य प्रार्थ्य, एतावत्कार्यसिद्ध्यर्थम् अमुकफलसिद्ध्यर्थम् एता-
वत्कर्मामुकसंख्याकाहुतीः, कार्यतारतम्येन आहुतिसंख्यातारतम्यं ज्ञेयम्॥२३॥
काम्य कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होने पर इसकी सूचना इष्टदेवता को
देनी चाहिये। बिना प्रार्थना के काम्यकर्म नहीं करना चाहिये। आज्ञा लेकर
सर्वप्रथम संकल्प करना उचित है। काम्यकर्मों में फलाकांक्षा स्वाभाविक है।
फलानुसार आहुति की संख्या का निर्धारण करना पड़ता है। इस तारतम्य के
अनुसार काम्यकर्म करे॥२३॥
ससाधनं होमं विधत्ते
तिलाज्यैः शान्त्या, अन्नेनान्नायामृताय, समिच्चूतपल्ल-
वैर्ज्वरशमाय, दूर्वाभिरायुषे, कृतमालैर्धनाय, उत्पलैर्भोगाय,
बिल्वदलैराज्याय, पद्मैः साम्राज्याय, शुद्धलाजैः कन्यायै, नन्द्यावर्त्तैः
कवित्वाय, वञ्जुलैः पुष्ट्यै, मल्लिकाजातीपुन्नागैर्भाग्याय, बन्धूक-
जपाकिंशुकबकुलमधुकैरैश्वर्याय, लवणैराकर्षणाय, कदम्बैः
सर्ववश्याय, शालितण्डुलैर्धान्याय, कुङ्कुमगोरोचनादिसुगन्धैः
सौभाग्याय, पलाशपुष्पैः कपिलाघृतैर्वा तेजसे, धत्तूर-