परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोमविधिः २२५
कुसुमैरुन्मादाय, विषवृक्षैर्निम्बश्लेष्मातकविभीतकसमिद्भिः
शत्रुनाशाय, निम्बतैलाक्तलवणैर्मरणाय, काकोलूकपक्षैर्विद्वेषणाय,
तिलतैलाक्तमरीचैः कासश्वासनाशाय जुहुयात्।।२४।
तिलाज्यैस्तिलसहिताज्यैः। यावत्संख्याज्याहुतयस्तावत्संख्याक-
तिलाहुतयः कार्या इति निष्कर्षः। शान्त्यै शान्तिर्नाम उत्पत्स्यमानानिष्ट-
प्राग्भावसंरक्षणम्। समिधश्च यज्ञीयवृक्षसम्बन्धिन्यो ग्राह्याः। दूर्वाः प्रसिद्धाः।
कृतमालैः आरेवतैः। 'आरेवतव्याधिघातकृतमालसुपर्णकाः' इत्यमरः।
शुद्धलाजैः शुद्धत्वं गृहे निर्मितत्वम्। वञ्जुलैः चित्रकृद्भिः, 'वञ्जुलश्चित्रकृत्तवाथ'
इत्यमरः। बन्धूकः किंशुकः पलाशः। मधुकैरिति योगेन मधुपुष्पाणां ग्रहणम्।
श्लेष्मातकः शेलुः। विभीतकः अक्षः। विषवृक्षसमिधो निम्बादिसमिद्भिः सह
विकल्प्यन्ते। शत्रुनाशकर्मणि द्वयोः तुल्यसाधनत्वम्। विद्वेषः स्वशत्रोर्यः
प्रबलाश्रयभूतस्तेन साकम्।।२४।।
काम्य होम का निर्देश यह सूत्र करता है। इसमें उत्तम, मध्यम और नीच
सभी काम्य कर्म गिनाये गये हैं। साधना की दृष्टि से ये सभी हेय हैं। मात्र
उपासना से सभी सिद्धियाँ समुपलब्ध हो सकती हैं; किन्तु सामान्य जन इनका
भी प्रयोग करते हैं। ये सभी प्रयोग ऐसे ही लोगों के लिये हैं। जैसे—
क्रमसंख्या अभीष्ट काम्यकर्म हवनयोग्य समिधाप्रकार
१. शान्ति तिल और आज्य
२. अमृत अन्न अन्न
३. ज्वरनाश चूतपल्लव
४. आयुष्य दूर्वा
५. धन कृतमाल
६. भोग उत्पल
७. राज्यप्राप्ति बिल्वपत्र
८. साम्राज्य-रक्षा पद्म (रक्तकमल)
९. कन्याप्राप्ति शुद्ध लावा