परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ परशुरामकल्पसूत्रम्
रश्मिमाला के अन्तर्गत आने वाले मन्त्र रश्मिपञ्चक मन्त्र कहलाते हैं।
ये ब्रह्मरूप स्वप्रकाश तत्त्व की वागात्मक रश्मियाँ हैं। इनका साक्षात्कार मन्त्रद्रष्टा
मनीषी ऋषियों ने किया है। ये पाँच हैं—
१. गायत्री मन्त्र—इसमें २४ अक्षर होते हैं। जब ओङ्कार भूः भुवः और सुवः
रूप छः वर्णों को इसके साथ लगाकर बोलते हैं, तो यह तीस वर्णों वाली
हो जाती है। यह मूलाधार की बीजरूप से विमृष्टव्य है।
२. ऐन्द्री रश्मि—यह इन्द्रदैवत्या रश्मि है। इन्द्र एक वैदिक देवता है। यह
सङ्कटों से रक्षा करता है। श्रीपाददामोदर सातवलेकर ने 'इन्द्रशक्ति का
विकास' एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें इन्द्रशक्ति का विशद विवेचन है।
यह रश्मि ६७ वर्णों में पूर्ण होती है। ऋग्वेद का यह मन्त्र है। वहाँ
से इसकी व्याख्या देखनी चाहिये। इसको हृदय बीज के रूप में विमृष्ट
करना चाहिये।
३. सौरी रश्मि—इसके विमर्श से स्वात्म में तैजसिकता का विकास होता है।
इसमें प्रणव, घृणि, सूर्य और आदित्य रूप शब्दों के आठ वर्ण सौरी
दिव्यता के प्रतीक वर्ण हैं। यह आज्ञा बीज रूप से ही विमृश्य है।
४. प्रणवरश्मि—यद्यपि गीता इसे एकाक्षर ब्रह्म ही मानती है। फिर भी
वर्णात्मिका विद्या होने के कारण रश्मि भी है। इसे ब्रह्मरन्ध्र में विमृष्ट करना
चाहिये।
५. तुर्यगायत्री—नवार्णा विद्या है। चिदैक्य-समापत्ति की मूल हेतु है। गायत्री
के चतुर्थ चरण के रूप में इसका जप करना गायत्री साधक के लिये
अनिवार्य माना जाता है। आठ माला गायत्री मन्त्र जप कर एक माला
इस मन्त्र का जप करना विश्वामित्रकल्प का निर्देश है। इसका उच्चारण
नहीं किया जाता। इसे द्वादशान्त बीज रूप से विमृष्ट करते हैं। शरीरस्थ
जिन चक्रों में विमर्श करने का निर्देश है, उनका ज्ञान साधक को होना
चाहिये। विशेष रूप से ब्रह्मरन्ध्र और द्वादशान्त शब्दों का ज्ञान और प्रयोग
रूप से वहाँ तक पहुँचना साधना का विषय है। इसे सद्गुरु से जानना
चाहिये।।१०।।