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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 320 में से

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पृष्ठ 277

सर्वसाधारणक्रमः २३५
चाक्षुष्मतीविद्यादि द्वितीयं रश्मिपञ्चकम्
सूर्याक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय। उष्णो भगवान्
शुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिप्रतिरूपः।
विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं ज्योतिरेकं तपन्तं
सहस्ररश्मिः शतधा वर्त्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः। ॐ नमो
भगवते सूर्याय अहोवाहिनि वाहिन्यहो वाहिनि वाहिनि स्वाहा।।
वयस्सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियं मेधा ऋषयो नाथमानाः।
अपध्वान्तमूर्णहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान्।।
पुण्डरीकाक्षाय नमः। पुष्करेक्षणाय नमः।
अमलेक्षणाय नमः। कमलेक्षणाय नमः।
विश्वरूपाय नमः। श्रीमहाविष्णवे नमः।
इति षोडशमन्त्रसमष्टिरूपिणी दूरदृष्टिप्रदा चाक्षुष्मती
विद्या।।१९।।
सूर्येत्यारभ्य घृणिं जातवेदसम् अप्रतिरूप इति पर्यन्तं सप्तवाक्यानि।
सप्तमन्त्राः। ततो हिरण्मयं विश्वरूपम् इत्यारभ्य एष सूर्य इत्यन्तोऽष्टमः। ॐ
नम इत्यारभ्य स्वाहान्तो नवमः। वयस्सुपर्णा इत्यारभ्य बद्धान् इत्यन्तो
दशमः। तदग्रिमाणि नमोऽन्तानि षट् वाक्यानि प्रत्येकं षण्मन्त्राः। इत्थं
षोडशमन्त्राणां समष्टिः, तद्रूपिणी या प्रकृतविद्या सा उपासकानां दूरदृष्टिप्रदा
द्वीपान्तरस्थं वस्त्वपि करस्थामलकवद् दृष्टिगोचरी करोतीति भावः।।१९।।
वृत्तिकार ने प्रारम्भ के सब वाक्यों के दो विकल्प रूप को स्वीकार किया
है। १. सूर्य से प्रतिरूप पर्यन्त सात वाक्य हैं। २. विश्वरूप से एष सूर्यः तक
आठवाँ वाक्य। ३. ॐ नमः से स्वाहा तक नवाँ वाक्य ४. वयः सुपर्णा से
बद्धान् तक दशवाँ वाक्य। ५. पुण्डरीक से विष्णवे नमः तक छः मन्त्र। इस
तरह १६ मन्त्रों की समष्टि वाली यह विद्या चाक्षुष्मती विद्या है। यह भी माला
मन्त्र है। इसे उपनिषद् में परिगणित किया गया है।।१९।।