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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

होमविधिः २१५
पठित्वेति शेषः। अभ्यर्च्य इत्यस्य कर्मकाङ्क्षायां मन्त्रलिङ्गाद् देवता
योज्याः ।।५।।
उन रेखाओं पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय क्रम से ब्रह्मा, यम और सोम
की पूजा करनी चाहिये। इसी तरह उदगग्र रेखाओं पर क्रमशः रुद्र, विष्णु और
इन्द्र की पूजा की जाती है। पूजा के मन्त्र देव नामों को त्रितारी और कुमारी
के बाद नमः से सम्पुटित करके बनाते हैं। जैसे—'ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः
ब्रह्मणे नमः' इस मन्त्र से ब्रह्मा की पूजा करनी चाहिये।।५।।
सहस्रार्चिषे हृदयाय नमः, स्वस्तिपूर्णाय शिरसे स्वाहा, उत्तिष्ठ
पुरुषाय शिखायै वषट्, धूमव्यापिने कवचाय हुम्, सप्तजिह्वाय
नेत्रत्रयाय वौषट्, धनुर्धराय अस्त्राय फट् इति षडङ्गं विधाय तेन
षडङ्गेन कुण्डमभ्यर्च्य ।।६।।
उक्तषण्मन्त्रैः स्वदेहे हृदयादिषडङ्गन्यासानन्तरं कुण्डे तैरेव मन्त्रैः
अग्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गयुवतीः पूजयेत्।।६।।
सूत्र में छः मन्त्र निर्दिष्ट हैं। इन मन्त्रों से षडङ्गन्यास करना चाहिये। इन्हीं
मन्त्रों से कुण्ड-मध्य और ऊर्ध्वादि चतुर्दिक् कुण्डशक्तियों की अर्चना करनी
चाहिये।।६।।
ततोऽग्निचक्रनिर्माणादिकमाह
तत्राष्टकोणषट्कोणत्रिकोणात्मकम् अग्निचक्रं विलिख्य
पीतायै, श्वेतायै, अरुणायै, कृष्णायै, धूम्रायै, तीव्रायै, स्फुलिङ्गिन्यै,
रुचिरायै, ज्वालिन्यै नम इति त्रिकोणमध्ये वन्हेः पीठशक्तीः
सम्पूज्य—तं तमसे, रं रजसे, सं सत्त्वाय, आम् आत्मने, अम्
अन्तरात्मने, पं परमात्मने, ह्रीं ज्ञानात्मने नम इति तत्रैवा-
भ्यर्चयेत् ।।७।।
कुण्डे स्थण्डिले वा अष्टकोणादिनिर्माणं प्रवेशरीत्या कार्यम्,
त्रिकोणस्याभ्यन्तरे भूरिदर्शनात्। पीतायै इत्यादितो ज्ञानात्मने नम इत्यन्तं
स्पष्टम्। तत्रैव त्रिकोण एव। क्रमस्तु स्वाग्रादिप्रादक्षिण्येन।।७।।